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ਪਰ ਘਰਿ ਚੀਤੁ ਮਨਮੁਖਿ ਡੋਲਾਇ ॥पर घरि चीतु मनमुखि डोलाइ ॥स्वेच्छाचारी इन्सान का मन पराई नारी की लालसा करता है। ਗਲਿ ਜੇਵਰੀ ਧੰਧੈ ਲਪਟਾਇ ॥गलि जेवरी धंधै लपटाइ ॥उसकी गर्दन पर मृत्यु का फँदा होता है और वह सांसारिक विवादों में फंसा रहता है। ਗੁਰਮੁਖਿ ਛੂਟਸਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੫॥गुरमुखि छूटसि हरि गुण गाइ ॥५॥गुरमुख

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ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੈਤ ਸੰਘਾਰੇ ॥दूजै भाइ दैत संघारे ॥ईश्वर ने द्वैतभाव के कारण मोह-माया में फँसे राक्षसों का विनाश कर दिया। ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਭਗਤਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੮॥गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥८॥उनकी सच्ची सेवा-भक्ति के कारण प्रभु ने गुरु के समक्ष आई पवित्र आत्माओं का कल्याण कर दिया ॥ ८॥ ਬੂਡਾ ਦੁਰਜੋਧਨੁ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥बूडा दुरजोधनु पति

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ਨਰ ਨਿਹਕੇਵਲ ਨਿਰਭਉ ਨਾਉ ॥नर निहकेवल निरभउ नाउ ॥प्राणी निर्भय प्रभु का नाम स्मरण करके पवित्र एवं निडर हो जाता है। ਅਨਾਥਹ ਨਾਥ ਕਰੇ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥अनाथह नाथ करे बलि जाउ ॥प्रभु निराश्रितों को आश्रयवान बना देता है। मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ। ਪੁਨਰਪਿ ਜਨਮੁ ਨਾਹੀ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੫॥पुनरपि जनमु नाही गुण गाउ ॥५॥उसकी

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ਤਨਿ ਮਨਿ ਸੂਚੈ ਸਾਚੁ ਸੁ ਚੀਤਿ ॥तनि मनि सूचै साचु सु चीति ॥उस सत्यनाम को हृदय में बसाने से उनका तन-मन पवित्र हो जाता है। ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਭਜੁ ਨੀਤਾ ਨੀਤਿ ॥੮॥੨॥नानक हरि भजु नीता नीति ॥८॥२॥हे नानक ! तू नित्य परमेश्वर का भजन करता रह॥ ८॥ २॥ ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥गउड़ी गुआरेरी महला १

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ਗੁਰੁ ਪੁਛਿ ਦੇਖਿਆ ਨਾਹੀ ਦਰੁ ਹੋਰੁ ॥गुरु पुछि देखिआ नाही दरु होरु ॥मैंने गुरु से पूछ कर देख लिया है कि भगवान के बिना दूसरा सुख का द्वार नहीं। ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਭਾਣੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥दुखु सुखु भाणै तिसै रजाइ ॥दुःख एवं सुख उसके हुक्म एवं इच्छा में है। ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੮॥੪॥नानकु नीचु

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ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਜੀਇ ਆਈ ਕਾਰਿ ॥੧॥गुर की मति जीइ आई कारि ॥१॥गुरु जी का उपदेश ही मेरे मन के लिए लाभदायक (सिद्धियों) हैं।॥ १॥ ਇਨ ਬਿਧਿ ਰਾਮ ਰਮਤ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥इन बिधि राम रमत मनु मानिआ ॥इस विधि से राम के नाम का जाप करने से मेरा मन संतुष्ट हो गया है। ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ

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 ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਾਧ ਮਗ ਸੁਨਿ ਕਰਿ ਨਿਮਖ ਨ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥मनुष्य वेद-पुराण एवं संतों-महापुरुषों के उपदेश को सुनता रहता है, परन्तु फिर भी वह एक क्षण भर के लिए भी प्रभु का गुणानुवाद नहीं करता॥ १॥ रहाउ॥ ਦੁਰਲਭ ਦੇਹ

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 ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥रागु गउड़ी महला ९ ॥रागु गउड़ी महला ९ ॥ ਸਾਧੋ ਮਨ ਕਾ ਮਾਨੁ ਤਿਆਗਉ ॥साधो मन का मानु तिआगउ ॥हे संतजनो ! अपने मन का अभिमान त्याग दो। ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਸੰਗਤਿ ਦੁਰਜਨ ਕੀ

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ਕੋਈ ਜਿ ਮੂਰਖੁ ਲੋਭੀਆ ਮੂਲਿ ਨ ਸੁਣੀ ਕਹਿਆ ॥੨॥कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥२॥परन्तु मूर्ख एवं लोभी मनुष्य इस कथन को बिल्कुल ही नहीं सुनता ॥ २॥ ਇਕਸੁ ਦੁਹੁ ਚਹੁ ਕਿਆ ਗਣੀ ਸਭ ਇਕਤੁ ਸਾਦਿ ਮੁਠੀ ॥इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥हे भाई ! किसी एक, दो अथवा

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ਭਰਮ ਮੋਹ ਕਛੁ ਸੂਝਸਿ ਨਾਹੀ ਇਹ ਪੈਖਰ ਪਏ ਪੈਰਾ ॥੨॥भरम मोह कछु सूझसि नाही इह पैखर पए पैरा ॥२॥भ्रम एवं मोहवश उसको कुछ भी दिखाई नहीं देता। मोह-माया की जंजीर उसके पैरों को पड़ी हुई है॥ २॥ ਤਬ ਇਹੁ ਕਹਾ ਕਮਾਵਨ ਪਰਿਆ ਜਬ ਇਹੁ ਕਛੂ ਨ ਹੋਤਾ ॥तब इहु कहा कमावन परिआ जब इहु कछू

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