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ਜਿਤੁ ਕੋ ਲਾਇਆ ਤਿਤ ਹੀ ਲਾਗਾ ॥जितु को लाइआ तित ही लागा ॥जिसके साथ प्रभु प्राणी को लगाता है, उसके साथ वह लग जाता है। ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਭਾਗਾ ॥੮॥੬॥सो सेवकु नानक जिसु भागा ॥८॥६॥हे नानक ! प्रभु का सेवक केवल वही व्यक्ति बनता है जो भाग्यशाली है ॥८॥६॥ ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥गउड़ी महला

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ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਤਿਸ ਕਉ ਭਉ ਨਾਹਿ ॥जो इसु मारे तिस कउ भउ नाहि ॥जो इस दुविधा का नाश कर देता है, उसको कोई भय नहीं रहता। ਜੋ ਇਸੁ ਮਾਰੇ ਸੁ ਨਾਮਿ ਸਮਾਹਿ ॥जो इसु मारे सु नामि समाहि ॥जो इस दुविधा का संहार कर देता है, वह नाम में लीन हो जाता है। ਜੋ

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ਸਹਜੇ ਦੁਬਿਧਾ ਤਨ ਕੀ ਨਾਸੀ ॥सहजे दुबिधा तन की नासी ॥सहज ही उसके शरीर की दुविधा नाश हो जाती है। ਜਾ ਕੈ ਸਹਜਿ ਮਨਿ ਭਇਆ ਅਨੰਦੁ ॥जा कै सहजि मनि भइआ अनंदु ॥जिसके पास सहज है, प्रसन्नता उसके हृदय में उदय हो जाती है। ਤਾ ਕਉ ਭੇਟਿਆ ਪਰਮਾਨੰਦੁ ॥੫॥ता कउ भेटिआ परमानंदु ॥५॥उसको परमानन्द प्रभु

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ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਏਕੈ ॥करन करावन सभु किछु एकै ॥एक परमेश्वर सब कुछ करता और जीवों से करवाता है। ਆਪੇ ਬੁਧਿ ਬੀਚਾਰਿ ਬਿਬੇਕੈ ॥आपे बुधि बीचारि बिबेकै ॥वह स्वयं ही बुद्धि, विचार एवं विवेक है। ਦੂਰਿ ਨ ਨੇਰੈ ਸਭ ਕੈ ਸੰਗਾ ॥दूरि न नेरै सभ कै संगा ॥वह कहीं दूर नहीं अपितु सबके निकट

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ਆਪਿ ਛਡਾਏ ਛੁਟੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਣ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥आपि छडाए छुटीऐ सतिगुर चरण समालि ॥४॥यदि ईश्वर तुझे स्वयं मुक्त करे, तुम मुक्त हो जाओगे। सतिगुरु के चरणों की तू उपासना कर॥ ४॥ ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਵਿਚਿ ਦੇਹੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਲਿ ॥मन करहला मेरे पिआरिआ विचि देही जोति समालि ॥हे मेरे प्रिय मन ! देहि में मौजूद ज्योति

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ਤਤੁ ਨ ਚੀਨਹਿ ਬੰਨਹਿ ਪੰਡ ਪਰਾਲਾ ॥੨॥ततु न चीनहि बंनहि पंड पराला ॥२॥वह वास्तविकता को नहीं समझते और घास-फूस की गठरी सिर पर बांधते हैं।॥ २॥ ਮਨਮੁਖ ਅਗਿਆਨਿ ਕੁਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥मनमुख अगिआनि कुमारगि पाए ॥अज्ञानी स्वेच्छाचारी जीव कुमार्ग ही पड़ा रहता है। ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿਆ ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥हरि नामु बिसारिआ बहु करम द्रिड़ाए ॥वह

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ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥गुरमुखि विचहु हउमै जाइ ॥गुरमुख के मन से अहंकार निकल जाता है ।                                                             ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥गुरमुखि मैलु न लागै आइ ॥गुरमुख के मन को विकारों की मैल नहीं लगती।                                       ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੨॥गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥२॥गुरमुख के मन में भगवान का नाम आकर बस

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ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥गउड़ी महला १ ॥गउड़ी महला १ ॥ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੂਝਿ ਲੇ ਤਉ ਹੋਇ ਨਿਬੇਰਾ ॥गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥हे जिज्ञासु ! यदि गुरु की कृपा से प्राणी ईश्वर की महिमा को समझ ले तो उसे आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। ਘਰਿ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨਾ ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ

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ਹਉਮੈ ਬੰਧਨ ਬੰਧਿ ਭਵਾਵੈ ॥हउमै बंधन बंधि भवावै ॥अहंकार मनुष्य को बंधनों में जकड़ लेता है और उसको (जन्म-मरण के चक्र) आवागमन में भटकाता है। ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੮॥੧੩॥नानक राम भगति सुखु पावै ॥८॥१३॥हे नानक ! राम की भक्ति करने से ही सुख उपलब्ध होता है॥ ८॥ १३ ॥ ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥गउड़ी

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ਪ੍ਰਭ ਪਾਏ ਹਮ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਰਿਆ ॥੭॥प्रभ पाए हम अवरु न भारिआ ॥७॥एक ईश्वर को मैंने पा लिया है और अब मैं किसी दूसरे को नहीं ढूंढता॥ ७॥                                                                       ਸਾਚ ਮਹਲਿ ਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥साच महलि गुरि अलखु लखाइआ ॥गुरु जी ने मुझे अदृश्य प्रभु के सत्य मन्दिर में दर्शन करवा दिए हैं। ਨਿਹਚਲ ਮਹਲੁ ਨਹੀ

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