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ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਖਾਈ ॥कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥तूने किस विधि द्वारा अपनी आशा एवं अभिलाषाओं को समाप्त कर लिया है और ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥कितु बिधि जोति निरंतरि पाई ॥किस विधि द्वारा परम-ज्योति प्राप्त कर ली है? ਬਿਨੁ ਦੰਤਾ ਕਿਉ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥बिनु दंता किउ खाईऐ सारु ॥दाँतों के बिना

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ਤੀਰਥਿ ਨਾਈਐ ਸੁਖੁ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕਾਈ ॥तीरथि नाईऐ सुखु फलु पाईऐ मैलु न लागै काई ॥हम तीर्थों में स्नान करते हैं और इसका सुख रूपी फल प्राप्त करते हैं और मन को जरा भी अहम् की मैल नहीं लगती। ਗੋਰਖ ਪੂਤੁ ਲੋਹਾਰੀਪਾ ਬੋਲੈ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥੭॥गोरख पूतु लोहारीपा बोलै जोग

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ਬਿਦਿਆ ਸੋਧੈ ਤਤੁ ਲਹੈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥वह इस विद्या की भलीभांति पड़ताल करके ज्ञान प्राप्त करता हैं और राम नाम में ध्यान लगाकर रखता है। ਮਨਮੁਖੁ ਬਿਦਿਆ ਬਿਕ੍ਰਦਾ ਬਿਖੁ ਖਟੇ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥मनमुख जीव विद्या का विक्रय करता

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ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਮੁਏ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਭਾਲਿ ॥मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥कितने ही जीव यह माया मेरी है, कहते हुए प्रभु नाम के बिना दुख भोगते हुए जीवन त्याग गए हैं। ਗੜ ਮੰਦਰ ਮਹਲਾ ਕਹਾ ਜਿਉ ਬਾਜੀ ਦੀਬਾਣੁ ॥गड़ मंदर महला कहा जिउ बाजी दीबाणु ॥बाजीगर की खेल की तरह

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ਨਾ ਤਿਸੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਧਿਆਨੁ ਹੈ ਨਾ ਤਿਸੁ ਧਰਮੁ ਧਿਆਨੁ ॥ना तिसु गिआनु न धिआनु है ना तिसु धरमु धिआनु ॥न उसके पास कोई ज्ञान-ध्यान हैं और न ही कोई धर्म का ध्यान हैं। ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਿਰਭਉ ਕਹਾ ਕਿਆ ਜਾਣਾ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥विणु नावै निरभउ कहा किआ जाणा अभिमानु ॥नाम के बिना कोई निडर नहीं हो

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ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਦੀਆ ਤਿਸੁ ਸੇਵਸਾ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥जिनि नामु दीआ तिसु सेवसा तिसु बलिहारै जाउ ॥जिसने मुझे नाम दिया है, उसकी ही सेवा करती हैं और उस पर ही बलिहारी जाती हैं। ਜੋ ਉਸਾਰੇ ਸੋ ਢਾਹਸੀ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥जो उसारे सो ढाहसी तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥जो दुनिया को बनाता

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ਜਾਪੈ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੂ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥जापै आपि प्रभू तिहु लोइ ॥तीनों लोकों में प्रभु ही व्यापक मालूम होता है। ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਦਾਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥जुगि जुगि दाता अवरु न कोइ ॥युग-युगान्तर केवल वही दाता है और उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹਿ ਰਾਖੁ ॥जिउ भावै तिउ राखहि राखु ॥हे जगत्

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ਤਾ ਮਿਲੀਐ ਜਾ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥ता मिलीऐ जा लए मिलाइ ॥प्रभु से तभी मिलाप होता है, जब वह स्वयं जीव को विलीन कर लेता है। ਗੁਣਵੰਤੀ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ਨੀਤ ॥गुणवंती गुण सारे नीत ॥गुणवान जीव-स्त्री नित्य परमात्मा के गुणों का चिंतन करती है। ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲੀਐ ਮੀਤ ॥੧੭॥नानक गुरमति मिलीऐ मीत ॥१७॥हे नानक ! मित्र-प्रभु

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ਓਹੁ ਬਿਧਾਤਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਦੇਇ ॥ओहु बिधाता मनु तनु देइ ॥वही विधाता है और वही मन-तन प्रदान करता है। ਓਹੁ ਬਿਧਾਤਾ ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸੋਇ ॥ओहु बिधाता मनि मुखि सोइ ॥मन एवं मुख में वह विधाता ही विद्यमान है। ਪ੍ਰਭੁ ਜਗਜੀਵਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥प्रभु जगजीवनु अवरु न कोइ ॥प्रभु ही जगत् का जीवन है और

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ਓਅੰਕਾਰਿ ਸਬਦਿ ਉਧਰੇ ॥ओअंकारि सबदि उधरे ॥ऑकार शब्द से ही सबका उद्धार हुआ है और ਓਅੰਕਾਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੇ ॥ओअंकारि गुरमुखि तरे ॥ऑकार से गुरुमुख संसार-सागर से तैर गए हैं। ਓਨਮ ਅਖਰ ਸੁਣਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥ओनम अखर सुणहु बीचारु ॥‘ओम्’ अक्षर का विचार सुनो; ਓਨਮ ਅਖਰੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸਾਰੁ ॥੧॥ओनम अखरु त्रिभवण सारु ॥१॥ओम् अक्षर पृथ्वी, आकाश, पाताल

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