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ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥परमेश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह समूची सृष्टि-मानव जाति को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह निडर है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं अर्थात् प्रेम की मूर्ति है),

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ਜਿਚਰੁ ਵਿਚਿ ਦੰਮੁ ਹੈ ਤਿਚਰੁ ਨ ਚੇਤਈ ਕਿ ਕਰੇਗੁ ਅਗੈ ਜਾਇ ॥जिचरु विचि दमु है तिचरु न चेतई कि करेगु अगै जाइ ॥जब तक शरीर में प्राण होते हैं, तब तक मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता। ਗਿਆਨੀ ਹੋਇ ਸੁ ਚੇਤੰਨੁ ਹੋਇ ਅਗਿਆਨੀ ਅੰਧੁ ਕਮਾਇ ॥गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥फिर

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ਜਿ ਤੁਧ ਨੋ ਸਾਲਾਹੇ ਸੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪਾਵੈ ਜਿਸ ਨੋ ਕਿਰਪਾ ਨਿਰੰਜਨ ਕੇਰੀ ॥जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥हे निरंजन परमेश्वर ! जो भी तेरी महिमा-स्तुति करता है एवं जिस पर तू कृपा के घर में आता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। ਸੋਈ ਸਾਹੁ

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ਮਃ ੫ ॥मः ५ ॥महला ५॥ ਘਟਿ ਵਸਹਿ ਚਰਣਾਰਬਿੰਦ ਰਸਨਾ ਜਪੈ ਗੁਪਾਲ ॥घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥जिस मानव के अन्तर में भगवान के सुन्दर चरण कमल बसते हैं और उसकी जीभ गोपाल को जपती है। ਨਾਨਕ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰੀਐ ਤਿਸੁ ਦੇਹੀ ਕਉ ਪਾਲਿ ॥੨॥नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥२॥हे नानक

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ਜਿਨਾ ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਸੇ ਜਨ ਸਚੀ ਦਰਗਹਿ ਜਾਣੇ ॥੧੧॥जिना आपे गुरमुखि दे वडिआई से जन सची दरगहि जाणे ॥११॥जिन लोगों को तुम गुरुमुख की बड़ाई प्रदान करते हो, वे तेरे सच्चे दरबार में विख्यात हो जाते हैं।॥११॥ ਸਲੋਕੁ ਮਰਦਾਨਾ ੧ ॥सलोकु मरदाना १ ॥श्लोक मरदाना १॥ ਕਲਿ ਕਲਵਾਲੀ ਕਾਮੁ ਮਦੁ ਮਨੂਆ ਪੀਵਣਹਾਰੁ ॥कलि

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ਮਨਮੁਖ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੋ ਪਿਆਰੁ ॥मनमुख माइआ मोहु है नामि न लगो पिआरु ॥स्वेच्छाचारी मनुष्य माया के मोह में लीन है, जिसके कारण वह परमात्मा के नाम से प्रेम नहीं लगाता। ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੁ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਕੂੜੁ ਕਰੇ ਆਹਾਰੁ ॥कूड़ु कमावै कूड़ु संग्रहै कूड़ु करे आहारु ॥वह झूठ ही कमाता है और झूठ

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ਆਪੇ ਜਲੁ ਆਪੇ ਦੇ ਛਿੰਗਾ ਆਪੇ ਚੁਲੀ ਭਰਾਵੈ ॥आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥वह आप ही जल है, आप ही दांत कुरेदने वाला तिनका प्रदान करता है और आप ही चुल्ली करने को जान देता है। ਆਪੇ ਸੰਗਤਿ ਸਦਿ ਬਹਾਲੈ ਆਪੇ ਵਿਦਾ ਕਰਾਵੈ ॥आपे संगति सदि बहालै आपे विदा करावै ॥वह आप

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ਅਨਦਿਨੁ ਸਹਸਾ ਕਦੇ ਨ ਚੂਕੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥अनदिनु सहसा कदे न चूकै बिनु सबदै दुखु पाए ॥रात-दिन उसका संदेह कदापि दूर नहीं होता और सतगुरु के शब्द के बिना दुःख पता है। ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਅੰਤਰਿ ਸਬਲਾ ਨਿਤ ਧੰਧਾ ਕਰਤ ਵਿਹਾਏ ॥कामु क्रोधु लोभु अंतरि सबला नित धंधा करत विहाए ॥काम, क्रोध लोभ,

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ਕੀਮਤਿ ਪਾਇ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਇ ॥कीमति पाइ न कहिआ जाइ ॥वास्तव में उस सर्गुण स्वरूप परमात्मा की न तो कोई कीमत आंक सकता है और न ही उसका कोई अंत कह सकता है, क्योंकि वह अनन्त व असीम है। ਕਹਣੈ ਵਾਲੇ ਤੇਰੇ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥੧॥कहणै वाले तेरे रहे समाइ ॥१॥जिन्होंने तेरी महिमा का अंत पाया

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ਰਾਜਨ ਕਿਉ ਸੋਇਆ ਤੂ ਨੀਦ ਭਰੇ ਜਾਗਤ ਕਤ ਨਾਹੀ ਰਾਮ ॥ राजन किउ सोइआ तू नीद भरे जागत कत नाही राम ॥ हे राजन! क्यों गहरी निद्रा में सोया हुआ है और ज्ञान द्वारा क्यों जाग्रत नहीं हो रहा ? O’ dear king, why are you in a state of deep sleep in the love

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