Hindi Page 184
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਏਕ ਗੋਪਾਲ ॥जन की टेक एक गोपाल ॥उस सेवक का सहारा एक गोपाल ही है। ਏਕਾ ਲਿਵ ਏਕੋ ਮਨਿ ਭਾਉ ॥एका लिव एको मनि भाउ ॥वह सेवक एक परमेश्वर में ही अपनी सुरति लगाता है और उसके मन में एक प्रभु का ही प्रेम होता है। ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਜਨ ਕੈ ਹਰਿ ਨਾਉ
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਏਕ ਗੋਪਾਲ ॥जन की टेक एक गोपाल ॥उस सेवक का सहारा एक गोपाल ही है। ਏਕਾ ਲਿਵ ਏਕੋ ਮਨਿ ਭਾਉ ॥एका लिव एको मनि भाउ ॥वह सेवक एक परमेश्वर में ही अपनी सुरति लगाता है और उसके मन में एक प्रभु का ही प्रेम होता है। ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਜਨ ਕੈ ਹਰਿ ਨਾਉ
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਡੂਬਤ ਪਾਹਨ ਤਰੇ ॥੩॥जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥३॥जिसकी आराधना करने से डूबते हुए पत्थर अर्थात् पापी जीव भी भवसागर से पार हो जाते हैं। ३॥ ਸੰਤ ਸਭਾ ਕਉ ਸਦਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥संत सभा कउ सदा जैकारु ॥संतों की सभा को मैं सदैव नमन करता हूँ। ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥हरि हरि
ਬਿਆਪਤ ਹਰਖ ਸੋਗ ਬਿਸਥਾਰ ॥ बिआपत हरख सोग बिसथार ॥ माया का सुख-दुख में प्रसार है। Maya afflicts some through pain and others through the display of pleasure. ਬਿਆਪਤ ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਅਵਤਾਰ ॥ बिआपत सुरग नरक अवतार ॥ वह स्वर्ग में जन्म लेने वाले जीवों को सुख रूप में तथा नरक के जीवों को दुख
ਬਿਆਪਤ ਹਰਖ ਸੋਗ ਬਿਸਥਾਰ ॥बिआपत हरख सोग बिसथार ॥माया का सुख-दुख में प्रसार है। ਬਿਆਪਤ ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਅਵਤਾਰ ॥बिआपत सुरग नरक अवतार ॥वह स्वर्ग में जन्म लेने वाले जीवों को सुख रूप में तथा नरक के जीवों को दुख रूप में प्रभावित करती है। ਬਿਆਪਤ ਧਨ ਨਿਰਧਨ ਪੇਖਿ ਸੋਭਾ ॥बिआपत धन निरधन पेखि सोभा ॥यह
ਇਸ ਹੀ ਮਧੇ ਬਸਤੁ ਅਪਾਰ ॥इस ही मधे बसतु अपार ॥इस मन्दिर में अनन्त प्रभु की नाम-रूपी वस्तु विद्यमान है। ਇਸ ਹੀ ਭੀਤਰਿ ਸੁਨੀਅਤ ਸਾਹੁ ॥इस ही भीतरि सुनीअत साहु ॥संतों से सुनते हैं कि इस मन्दिर में ही नाम देने वाला साहूकार प्रभु निवास करता है | ਕਵਨੁ ਬਾਪਾਰੀ ਜਾ ਕਾ ਊਹਾ ਵਿਸਾਹੁ ॥੧॥कवनु
ਪ੍ਰਾਣੀ ਜਾਣੈ ਇਹੁ ਤਨੁ ਮੇਰਾ ॥प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥प्राणी विचार करता है कि यह शरीर उसका अपना है। ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਉਆਹੂ ਲਪਟੇਰਾ ॥बहुरि बहुरि उआहू लपटेरा ॥वह बार-बार उस शरीर से ही लिपटता है। ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਗਿਰਸਤ ਕਾ ਫਾਸਾ ॥पुत्र कलत्र गिरसत का फासा ॥जितनी देर तक पुत्र, स्त्री एवं गृहस्थ के मोह
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਾ ਓਲਾ ॥मन मेरे गहु हरि नाम का ओला ॥हे मेरे मन ! ईश्वर के नाम का आश्रय लो। ਤੁਝੈ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾਤਾ ਝੋਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥तुझै न लागै ताता झोला ॥१॥ रहाउ ॥तुझे हवा का गर्म झोका भी स्पर्श नहीं करेगा। ॥ १॥ रहाउ ॥ ਜਿਉ ਬੋਹਿਥੁ ਭੈ ਸਾਗਰ
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਚਾਖੁ ॥गुर का सबदु अम्रित रसु चाखु ॥हे प्राणी ! गुरु का शब्द अमृत रस है और इस अमृत रस का पान कर। ਅਵਰਿ ਜਤਨ ਕਹਹੁ ਕਉਨ ਕਾਜ ॥अवरि जतन कहहु कउन काज ॥हे भाई! बताओ, तेरे अन्य प्रयास किस काम के हैं? ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖੈ ਆਪਿ ਲਾਜ ॥੨॥करि किरपा
ਉਕਤਿ ਸਿਆਣਪ ਸਗਲੀ ਤਿਆਗੁ ॥उकति सिआणप सगली तिआगु ॥अपनी युक्तियां एवं समस्त चतुरता त्याग दे ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੨॥संत जना की चरणी लागु ॥२॥और संतजनों के चरणों से लग जा। २॥ ਸਰਬ ਜੀਅ ਹਹਿ ਜਾ ਕੈ ਹਾਥਿ ॥सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥जिस भगवान के वश में समस्त जीव हैं, ਕਦੇ ਨ
ਹਸਤੀ ਘੋੜੇ ਦੇਖਿ ਵਿਗਾਸਾ ॥हसती घोड़े देखि विगासा ॥मनुष्य अपने हाथी और घोड़े देखकर बड़ा प्रसन्न होता है। ਲਸਕਰ ਜੋੜੇ ਨੇਬ ਖਵਾਸਾ ॥लसकर जोड़े नेब खवासा ॥वह भारी भरकम फौज इकट्ठी करता है और मंत्री तथा शाही नौकर रखता है ਗਲਿ ਜੇਵੜੀ ਹਉਮੈ ਕੇ ਫਾਸਾ ॥੨॥गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥२॥लेकिन यह सबकुछ अहंकार की