ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਡੂਬਤ ਪਾਹਨ ਤਰੇ ॥੩॥
जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥३॥
जिसकी आराधना करने से डूबते हुए पत्थर अर्थात् पापी जीव भी भवसागर से पार हो जाते हैं। ३॥
ਸੰਤ ਸਭਾ ਕਉ ਸਦਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥
संत सभा कउ सदा जैकारु ॥
संतों की सभा को मैं सदैव नमन करता हूँ।
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥
हरि-परमेश्वर का नाम संतजनों के प्राणों का आधार है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਸੁਣੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥
हे नानक ! प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुन ली है।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮੋ ਕਉ ਨਾਮ ਨਿਵਾਸਿ ॥੪॥੨੧॥੯੦॥
संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥
संतों की कृपा से मुझे ईश्वर के नाम में निवास मिल गया है ॥४॥२१॥९०॥
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਦਰਸਨਿ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥
सतिगुरु के दर्शनों से तृष्णा की अग्नि बुझ गई है।
ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟਤ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
सतिगुर भेटत हउमै मारी ॥
सतिगुरु को मिलने से अहंकार मिट गया है।
ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਡੋਲੈ ॥
सतिगुर संगि नाही मनु डोलै ॥
सतिगुरु की संगति में मन डाँवाडोल नहीं होता।
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ॥੧॥
अम्रित बाणी गुरमुखि बोलै ॥१॥
गुरु के माध्यम से प्राणी अमृत वाणी का उच्चारण करता है॥ १॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਸਾਚਾ ਜਾ ਸਚ ਮਹਿ ਰਾਤੇ ॥
सभु जगु साचा जा सच महि राते ॥
जब से मेरा मन सत्य के प्रेम में मग्न हुआ है, तब से मुझे वह सत्य-प्रभु सारी दुनिया में निवास करता दिखाई देता है।
ਸੀਤਲ ਸਾਤਿ ਗੁਰ ਤੇ ਪ੍ਰਭ ਜਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सीतल साति गुर ते प्रभ जाते ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु के माध्यम से प्रभु को जानकर मेरा मन शीतल एवं शांत-स्थिर हो गया है। १॥ रहाउ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਪੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
संत प्रसादि जपै हरि नाउ ॥
संतों की कृपा से मनुष्य हरि का नाम स्मरण करता है।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਉ ॥
संत प्रसादि हरि कीरतनु गाउ ॥
संतों के प्रसाद से मनुष्य हरि का यश कीर्तन करता है।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਗਲ ਦੁਖ ਮਿਟੇ ॥
संत प्रसादि सगल दुख मिटे ॥
संतों की दया से मनुष्य की समस्त पीड़ा दूर हो जाती है।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬੰਧਨ ਤੇ ਛੁਟੇ ॥੨॥
संत प्रसादि बंधन ते छुटे ॥२॥
संतों की कृपा से प्राणी (मोह-माया के) बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। ॥२॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਮਿਟੇ ਮੋਹ ਭਰਮ ॥
संत क्रिपा ते मिटे मोह भरम ॥
संतों की कृपा से मोह एवं भ्रम मिट गए हैं।
ਸਾਧ ਰੇਣ ਮਜਨ ਸਭਿ ਧਰਮ ॥
साध रेण मजन सभि धरम ॥
संतों की चरण-धूलि में स्नान करने से सभी धर्म कर्मों का फल मिल जाता है।
ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
साध क्रिपाल दइआल गोविंदु ॥
जब संत कृपालु हैं तो गोविन्द दयालु हो जाता है।
ਸਾਧਾ ਮਹਿ ਇਹ ਹਮਰੀ ਜਿੰਦੁ ॥੩॥
साधा महि इह हमरी जिंदु ॥३॥
मेरे यह प्राण संतों में निवास करते हैं। ॥३॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਕਿਰਪਾਲ ਧਿਆਵਉ ॥
किरपा निधि किरपाल धिआवउ ॥
यदि मैं कृपा के भण्डार दयालु परमात्मा का चिन्तन करूं,
ਸਾਧਸੰਗਿ ਤਾ ਬੈਠਣੁ ਪਾਵਉ ॥
साधसंगि ता बैठणु पावउ ॥
तो ही मैं संतों की संगति में बैठ सकता हूँ।
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਣ ਕਉ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੀ ਦਇਆ ॥
मोहि निरगुण कउ प्रभि कीनी दइआ ॥
हे नानक ! जब प्रभु ने मुझ गुणहीन पर दया की
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥੪॥੨੨॥੯੧॥
साधसंगि नानक नामु लइआ ॥४॥२२॥९१॥
तो मैंने संतो की सभा में नाम सिमरन किया है ॥४॥२२॥९१॥
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਪਿਓ ਭਗਵੰਤੁ ॥
साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥
मैं संतों की सभा में मिलकर भगवान का सिमरन करता हूँ।
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਗੁਰਿ ਮੰਤੁ ॥
केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥
गुरु ने मुझे केवल नाम का ही मंत्र प्रदान किया है।
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨ ਭਏ ਨਿਰਵੈਰ ॥
तजि अभिमान भए निरवैर ॥
अपना अहंकार त्याग कर मैं निर्वैर हो गया हूँ।
ਆਠ ਪਹਰ ਪੂਜਹੁ ਗੁਰ ਪੈਰ ॥੧॥
आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥१॥
दिन के आठ प्रहर गुरु के चरणों की पूजा करो ॥ १॥
ਅਬ ਮਤਿ ਬਿਨਸੀ ਦੁਸਟ ਬਿਗਾਨੀ ॥
अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥
मेरी पराई दुष्ट बुद्धि तब नष्ट हो गई,”
ਜਬ ਤੇ ਸੁਣਿਆ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥१॥ रहाउ ॥
जब से मैंने हरि का यश अपने कानों से सुना है ॥ १॥ रहाउ॥
ਸਹਜ ਸੂਖ ਆਨੰਦ ਨਿਧਾਨ ॥
सहज सूख आनंद निधान ॥
रक्षक प्रभु जो सहज सुख एवं आनन्द का भण्डार है,
ਰਾਖਨਹਾਰ ਰਖਿ ਲੇਇ ਨਿਦਾਨ ॥
राखनहार रखि लेइ निदान ॥
अन्ततः मेरी रक्षा करेगा।
ਦੂਖ ਦਰਦ ਬਿਨਸੇ ਭੈ ਭਰਮ ॥
दूख दरद बिनसे भै भरम ॥
मेरे दुख-दर्द एवं भय-भ्रम नाश हो गए हैं।
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਖੇ ਕਰਿ ਕਰਮ ॥੨॥
आवण जाण रखे करि करम ॥२॥
प्रभु ने कृपा करके जन्म-मृत्यु के आवागमन से मेरी रक्षा की है। ॥२॥
ਪੇਖੈ ਬੋਲੈ ਸੁਣੈ ਸਭੁ ਆਪਿ ॥
पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥
प्रभु स्वयं ही सब कुछ देखता, बोलता एवं सुनता है।
ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਤਾ ਕਉ ਮਨ ਜਾਪਿ ॥
सदा संगि ता कउ मन जापि ॥
हे मेरे मन ! उस प्रभु का सदैव ही सिमरन कर, जो सदैव तेरे साथ रहता है।
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਇਓ ਪਰਗਾਸੁ ॥
संत प्रसादि भइओ परगासु ॥
संतों की कृपा से मेरे मन में प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो गया है।
ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਏਕੈ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥੩॥
पूरि रहे एकै गुणतासु ॥३॥
गुणों का भण्डार एक ईश्वर सर्वत्र व्यापक हो रहा है। ॥३ ॥
ਕਹਤ ਪਵਿਤ੍ਰ ਸੁਣਤ ਪੁਨੀਤ ॥
कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥
वे सभी पवित्र-पावन हो जाते हैं, जो मुख से उसकी महिमा करते एवं सुनते रहते हैं,
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਗਾਵਹਿ ਨਿਤ ਨੀਤ ॥
गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥
और सदैव ही गोविन्द की महिमा-स्तुति करते रहते हैं,
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥
हे नानक ! जिस पर ईश्वर कृपालु हो जाता है,
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਸਭ ਪੂਰਨ ਘਾਲ ॥੪॥੨੩॥੯੨॥
तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥४॥२३॥९२॥
उस प्राणी की नाम-साधना सम्पूर्ण हो जाती है ॥४॥२३॥९२॥
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਬੋਲਾਵੈ ਰਾਮੁ ॥
बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥
सतिगुरु मोह-माया के बन्धन तोड़कर मनुष्य से राम का सिमरन करवाता है।
ਮਨ ਮਹਿ ਲਾਗੈ ਸਾਚੁ ਧਿਆਨੁ ॥
मन महि लागै साचु धिआनु ॥
उस व्यक्ति के मन में सत्य-परमेश्वर का ध्यान लग जाता है।
ਮਿਟਹਿ ਕਲੇਸ ਸੁਖੀ ਹੋਇ ਰਹੀਐ ॥
मिटहि कलेस सुखी होइ रहीऐ ॥
उसके क्लेश मिट जाते हैं और वह मनुष्य सुखपूर्वक रहता है।
ਐਸਾ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਕਹੀਐ ॥੧॥
ऐसा दाता सतिगुरु कहीऐ ॥१॥
ऐसे दाता को ही सतिगुरु कहा जाता है। १॥
ਸੋ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥
सो सुखदाता जि नामु जपावै ॥
केवल वही सुखदाता है, जो प्राणी से प्रभु के नाम का जाप करवाता है
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਤਿਸੁ ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
करि किरपा तिसु संगि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥
और कृपा करके उसके साथ मिला देता है॥ १॥ रहाउ॥
ਜਿਸੁ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਤਿਸੁ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥
जिसु होइ दइआलु तिसु आपि मिलावै ॥
जिस व्यक्ति पर परमात्मा दयालु हो जाता है, उसको वह गुरु से मिला देता है।
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
सरब निधान गुरू ते पावै ॥
समस्त भण्डार सर्वनिधि वह गुरु द्वारा प्राप्त कर लेता है।
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਮਿਟੈ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ॥
आपु तिआगि मिटै आवण जाणा ॥
जो व्यक्ति अपना अहंकार त्याग देता है, उसका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है।
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਣਾ ॥੨॥
साध कै संगि पारब्रहमु पछाणा ॥२॥
वह संतों की संगति करके पारब्रह्म को पहचान लेता है॥ २॥
ਜਨ ਊਪਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਦਇਆਲ ॥
जन ऊपरि प्रभ भए दइआल ॥
अपने सेवक पर प्रभु दयालु हो गया है।