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ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਗਤ੍ਰ ਮਹਿ ਲੋਚਹਿ ਸਭਿ ਜੀਆ ॥जै जै कारु जगत्र महि लोचहि सभि जीआ ॥सभी लोग जगत् में अपनी जय-जयकार ही चाहते हैं। ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਭੂ ਕਛੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਥੀਆ ॥੧॥सुप्रसंन भए सतिगुर प्रभू कछु बिघनु न थीआ ॥१॥सतगुरु प्रभु सुप्रसन्न हो गया है, उसकी कृपा से किसी भी कार्य में विघ्न

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ਵਡੀ ਆਰਜਾ ਹਰਿ ਗੋਬਿੰਦ ਕੀ ਸੂਖ ਮੰਗਲ ਕਲਿਆਣ ਬੀਚਾਰਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥वडी आरजा हरि गोबिंद की सूख मंगल कलिआण बीचारिआ ॥१॥ रहाउ ॥उसने सुख, शान्ति एवं कल्याण का विचार करते हुए (बालक) हरिगोविन्द की आयु लंबी कर दी है॥ १॥ रहाउ ॥ ਵਣ ਤ੍ਰਿਣ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਹਰਿਆ ਹੋਏ ਸਗਲੇ ਜੀਅ ਸਾਧਾਰਿਆ ॥वण त्रिण त्रिभवण हरिआ होए

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ਪੂਰੀ ਭਈ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਬਿਧਾਤਾ ॥੩॥पूरी भई सिमरि सिमरि बिधाता ॥३॥उस विधाता का सिमरन कर कर के मेरी साधना पूरी हो गई है ॥३॥ ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕਿ ਰੰਗੁ ਮਾਣਿਆ ॥साधसंगि नानकि रंगु माणिआ ॥नानक ने साधु की संगति में आनंद प्राप्त किया है। ਘਰਿ ਆਇਆ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਆਣਿਆ ॥੪॥੧੨॥੧੭॥घरि आइआ पूरै गुरि आणिआ ॥४॥१२॥१७॥पूर्ण गुरु की

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ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਈਐ ਚੀਤਾ ॥੧॥चरन कमल सिउ लाईऐ चीता ॥१॥जब भगवान के चरणों में चित्त लगाया जाता है ॥१॥ ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਜੋ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਵਤ ॥हउ बलिहारी जो प्रभू धिआवत ॥जो प्रभु का ध्यान करता है, मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ। ਜਲਨਿ ਬੁਝੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥जलनि बुझै हरि हरि गुन

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ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਲੋਭਿ ਮੋਹਿ ਮਨੁ ਲੀਨਾ ॥कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीना ॥मेरा मन काम, क्रोध, लोभ, मोह में लीन रहता था, ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਮੁਕਤਿ ਗੁਰਿ ਕੀਨਾ ॥੨॥बंधन काटि मुकति गुरि कीना ॥२॥मगर गुरु ने मेरे सारे बन्धन काटकर मुझे मुक्त कर दिया है॥ २॥ ਦੁਖ ਸੁਖ ਕਰਤ ਜਨਮਿ ਫੁਨਿ ਮੂਆ ॥दुख सुख करत जनमि

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ਨਾਨਕ ਸੇ ਦਰਿ ਸੋਭਾਵੰਤੇ ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪੁਨੈ ਕੀਓ ॥੧॥नानक से दरि सोभावंते जो प्रभि अपुनै कीओ ॥१॥हे नानक ! प्रभु के द्वार पर वही शोभा के पात्र बनते हैं, जिन्हें उसने अपना बना लिया है॥ १॥ ਹਰਿਚੰਦਉਰੀ ਚਿਤ ਭ੍ਰਮੁ ਸਖੀਏ ਮ੍ਰਿਗ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਦ੍ਰੁਮ ਛਾਇਆ ॥हरिचंदउरी चित भ्रमु सखीए म्रिग त्रिसना द्रुम छाइआ ॥हे सखी !

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ਅਗਨਤ ਗੁਣ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੇ ॥अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥तेरे गुण असंख्य हैं। ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਤੁਮਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥मुझ अनाथ ने तेरी शरण ली है। ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਚਰਨ ਧਿਆਈ ॥੧॥करि किरपा हरि चरन धिआई ॥१॥हे श्री हरि ! ऐसी कृपा करो, ताकि मैं तेरे चरणों का ध्यान करता रहूँ॥ १॥

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ਹਰਿ ਭਰਿਪੁਰੇ ਰਹਿਆ ॥हरि भरिपुरे रहिआ ॥ईश्वर हर जगह भरपूर है। ਜਲਿ ਥਲੇ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ॥जलि थले राम नामु ॥राम का नाम जल एवं पृथ्वी में विद्यमान है। ਨਿਤ ਗਾਈਐ ਹਰਿ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥नित गाईऐ हरि दूख बिसारनो ॥१॥ रहाउ ॥नित्य दुखों का नाश करने वाले हरि का यश गाना चाहिए॥ १ ॥

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ਜਪਿ ਮਨ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਰਸਨਾ ॥जपि मन राम नामु रसना ॥हे मन ! अपनी जीभ से राम-नाम जप। ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਤ ਲਿਖੇ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਹਰਿ ਬਸਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥मसतकि लिखत लिखे गुरु पाइआ हरि हिरदै हरि बसना ॥१॥ रहाउ ॥मस्तक पर लिखे भाग्य लेखानुसार मैंने गुरु को पा लिया है और हृदय में भगवान्

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ਕਹਤ ਨਾਨਕੁ ਸਚੇ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਏ ਚੂਕੈ ਮਨਿ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥कहत नानकु सचे सिउ प्रीति लाए चूकै मनि अभिमाना ॥नानक का कथन है कि जो सत्यस्वरुप परमात्मा से प्रीति लगाता है, उसके मन का अभिमान समाप्त हो जाता है। ਕਹਤ ਸੁਣਤ ਸਭੇ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ਮਾਨਤ ਪਾਹਿ ਨਿਧਾਨਾ ॥੪॥੪॥कहत सुणत सभे सुख पावहि मानत पाहि निधाना ॥४॥४॥नाम

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