Hindi Page 801

ਹਰਿ ਭਰਿਪੁਰੇ ਰਹਿਆ ॥
हरि भरिपुरे रहिआ ॥
ईश्वर हर जगह भरपूर है।

ਜਲਿ ਥਲੇ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ॥
जलि थले राम नामु ॥
राम का नाम जल एवं पृथ्वी में विद्यमान है।

ਨਿਤ ਗਾਈਐ ਹਰਿ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नित गाईऐ हरि दूख बिसारनो ॥१॥ रहाउ ॥
नित्य दुखों का नाश करने वाले हरि का यश गाना चाहिए॥ १ ॥ रहाउ ॥

ਹਰਿ ਕੀਆ ਹੈ ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
हरि कीआ है सफल जनमु हमारा ॥
प्रभु ने हमारा जन्म सफल कर दिया है

ਹਰਿ ਜਪਿਆ ਹਰਿ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਨਹਾਰਾ ॥
हरि जपिआ हरि दूख बिसारनहारा ॥
क्योकि हमने दुखनाशक हरि का जाप किया है

ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਹੈ ਮੁਕਤਿ ਦਾਤਾ ॥
गुरु भेटिआ है मुकति दाता ॥
हमें मुक्तिदाता गुरु मिल गया है।

ਹਰਿ ਕੀਈ ਹਮਾਰੀ ਸਫਲ ਜਾਤਾ ॥
हरि कीई हमारी सफल जाता ॥
हरि ने हमारी जीवन-यात्रा सफल कर दी है,

ਮਿਲਿ ਸੰਗਤੀ ਗੁਨ ਗਾਵਨੋ ॥੧॥
मिलि संगती गुन गावनो ॥१॥
अतः संगत में मिलकर हरि के गुण गाते रहते हैं।॥ १॥

ਮਨ ਰਾਮ ਨਾਮ ਕਰਿ ਆਸਾ ॥
मन राम नाम करि आसा ॥
मेरे मन ! राम-नाम की आशा करो,

ਭਾਉ ਦੂਜਾ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸਾ ॥
भाउ दूजा बिनसि बिनासा ॥
यह द्वैतभाव को नाश कर देगा।

ਵਿਚਿ ਆਸਾ ਹੋਇ ਨਿਰਾਸੀ ॥
विचि आसा होइ निरासी ॥
जो आदमी आशा में निराश अर्थात् निर्लिप्त रहता है,

ਸੋ ਜਨੁ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਪਾਸੀ ॥
सो जनु मिलिआ हरि पासी ॥
वह भगवान् को मिल जाता है।

ਕੋਈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਵਨੋ ॥
कोई राम नाम गुन गावनो ॥
जो राम नाम का गुणगान करता है

ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਤਿਸੁ ਪਗਿ ਲਾਵਨੋ ॥੨॥੧॥੭॥੪॥੬॥੭॥੧੭॥
जनु नानकु तिसु पगि लावनो ॥२॥१॥७॥४॥६॥७॥१७॥
नानक उसके चरण स्पर्श करता है ॥ २॥ १॥ ७॥ ४॥ ६॥ ७॥ १७॥

ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਚਉਪਦੇ ਘਰੁ ੧
रागु बिलावलु महला ५ चउपदे घरु १
रागु बिलावलु महला ५ चउपदे घरु १

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

ਨਦਰੀ ਆਵੈ ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਮੋਹੁ ॥
नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥
जो कुछ नजर आ रहा है, उससे ही मोह लगा हुआ है।

ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਪ੍ਰਭ ਅਬਿਨਾਸੀ ਤੋਹਿ ॥
किउ मिलीऐ प्रभ अबिनासी तोहि ॥
हे अविनाशी प्रभु ! मैं तुझे कैसे मिलूं ?

ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੋਹਿ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵਹੁ ॥
करि किरपा मोहि मारगि पावहु ॥
कृपा करके मुझे मार्गदर्शन कीजिए और

ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਅੰਚਲਿ ਲਾਵਹੁ ॥੧॥
साधसंगति कै अंचलि लावहु ॥१॥
साधु संगति के आंचल से लगा दो॥ १॥

ਕਿਉ ਤਰੀਐ ਬਿਖਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥
किउ तरीऐ बिखिआ संसारु ॥
इस विष रूपी संसार से कैसे पार हुआ जाए ?

ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਪਾਵੈ ਪਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सतिगुरु बोहिथु पावै पारि ॥१॥ रहाउ ॥
हे भाई ! सतगुरु रूपी जहाज इससे पार करवा देता है॥ १॥ रहाउ॥

ਪਵਨ ਝੁਲਾਰੇ ਮਾਇਆ ਦੇਇ ॥
पवन झुलारे माइआ देइ ॥
माया पवन की तरह झुलाती है,

ਹਰਿ ਕੇ ਭਗਤ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਸੇਇ ॥
हरि के भगत सदा थिरु सेइ ॥
लेकिन हरि के भक्त सदैव स्थिर रहते हैं।

ਹਰਖ ਸੋਗ ਤੇ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥
हरख सोग ते रहहि निरारा ॥
जो आदमी हर्ष एवं शोक से निर्लिप्त रहता है,

ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਆਪਿ ਗੁਰੂ ਰਖਵਾਰਾ ॥੨॥
सिर ऊपरि आपि गुरू रखवारा ॥२॥
उसके सिर पर गुरु आप रखवाला बना हुआ है॥ २॥

ਪਾਇਆ ਵੇੜੁ ਮਾਇਆ ਸਰਬ ਭੁਇਅੰਗਾ ॥
पाइआ वेड़ु माइआ सरब भुइअंगा ॥
हे भाई ! माया रूपी नागिन ने सब जीवों को लपेटा हुआ है।

ਹਉਮੈ ਪਚੇ ਦੀਪਕ ਦੇਖਿ ਪਤੰਗਾ ॥
हउमै पचे दीपक देखि पतंगा ॥
इन्सान अभिमान में यूं जल रहे हैं, जिस तरह दीपक को देखकर पतंगा जल जाता है।

ਸਗਲ ਸੀਗਾਰ ਕਰੇ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ॥
सगल सीगार करे नही पावै ॥
चाहे जीव-स्त्री सारे श्रृंगार कर ले किन्तु वह फिर भी अपने पति-प्रभु को नहीं पा सकती।

ਜਾ ਹੋਇ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਵੈ ॥੩॥
जा होइ क्रिपालु ता गुरू मिलावै ॥३॥
जब प्रभु कृपालु हो जाता है तो वह गुरु से मिला देता है॥ ३॥

ਹਉ ਫਿਰਉ ਉਦਾਸੀ ਮੈ ਇਕੁ ਰਤਨੁ ਦਸਾਇਆ ॥
हउ फिरउ उदासी मै इकु रतनु दसाइआ ॥
मैं उदास हुई फिरती थी लेकिन गुरु ने मुझे एक रत्न बता दिया।

ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਹੀਰਾ ਮਿਲੈ ਨ ਉਪਾਇਆ ॥
निरमोलकु हीरा मिलै न उपाइआ ॥
यह अमूल्य हीरा किसी भी उपाय से नहीं मिलता।

ਹਰਿ ਕਾ ਮੰਦਰੁ ਤਿਸੁ ਮਹਿ ਲਾਲੁ ॥
हरि का मंदरु तिसु महि लालु ॥
यह काया ही हरि का मन्दिर है, जिसमें यह लाल मौजूद है।

ਗੁਰਿ ਖੋਲਿਆ ਪੜਦਾ ਦੇਖਿ ਭਈ ਨਿਹਾਲੁ ॥੪॥
गुरि खोलिआ पड़दा देखि भई निहालु ॥४॥
जब गुरु ने अहंत्व रूपी पर्दा खोल दिया तो मैं लाल को देखकर आनंदित हो गई॥ ४॥

ਜਿਨਿ ਚਾਖਿਆ ਤਿਸੁ ਆਇਆ ਸਾਦੁ ॥
जिनि चाखिआ तिसु आइआ सादु ॥
जिसने हरि रस को चखा है, उसे ही स्वाद आया है,

ਜਿਉ ਗੂੰਗਾ ਮਨ ਮਹਿ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥
जिउ गूंगा मन महि बिसमादु ॥
जिस तरह मिठाई खाकर गूंगा मन में आश्चर्यचकित हो जाता है।

ਆਨਦ ਰੂਪੁ ਸਭੁ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ॥
आनद रूपु सभु नदरी आइआ ॥
आनंद रूपी प्रभु मुझे हर जगह नजर आया है।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਣ ਆਖਿ ਸਮਾਇਆ ॥੫॥੧॥
जन नानक हरि गुण आखि समाइआ ॥५॥१॥
हे नानक ! हरि के गुण गाकर उसमें ही समा गया हूँ॥ ५ ॥ १॥

ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥

ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਕੀਏ ਗੁਰਦੇਵ ॥
सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥
गुरुदेव ने सर्व कल्याण कर दिया है और

ਸੇਵਕੁ ਅਪਨੀ ਲਾਇਓ ਸੇਵ ॥
सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥
सेवक को अपनी सेवा में लगा लिया है।

ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਜਪਿ ਅਲਖ ਅਭੇਵ ॥੧॥
बिघनु न लागै जपि अलख अभेव ॥१॥
अदृष्ट एवं अभेद परमात्मा का जाप करने से कोई विघ्न नहीं आता ॥ १॥

ਧਰਤਿ ਪੁਨੀਤ ਭਈ ਗੁਨ ਗਾਏ ॥
धरति पुनीत भई गुन गाए ॥
भगवान् का गुणगान करने से सारी धरती पावन हो गई है।

ਦੁਰਤੁ ਗਇਆ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
दुरतु गइआ हरि नामु धिआए ॥१॥ रहाउ ॥
हरि-नाम का ध्यान करने से सारे पाप विनष्ट हो गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥

ਸਭਨੀ ਥਾਂਈ ਰਵਿਆ ਆਪਿ ॥
सभनी थांई रविआ आपि ॥
भगवान स्वयं ही हर जगह पर विद्यमान है,

ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜਾ ਕਾ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥
आदि जुगादि जा का वड परतापु ॥
सृष्टि के आदि एवं युगों के आरम्भ से उसका बड़ा प्रताप है।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਨ ਹੋਇ ਸੰਤਾਪੁ ॥੨॥
गुर परसादि न होइ संतापु ॥२॥
गुरु की अनुकंपा से कोई संताप प्रभावित नहीं करता ॥ २॥

ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਲਗੇ ਮਨਿ ਮੀਠੇ ॥
गुर के चरन लगे मनि मीठे ॥
गुरु के चरण मन को बड़े मीठे लगे हैं।

ਨਿਰਬਿਘਨ ਹੋਇ ਸਭ ਥਾਂਈ ਵੂਠੇ ॥
निरबिघन होइ सभ थांई वूठे ॥
वह निर्विघ्न हर जगह बस रहा है।

ਸਭਿ ਸੁਖ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਤੂਠੇ ॥੩॥
सभि सुख पाए सतिगुर तूठे ॥३॥
सतगुरु की प्रसन्नता से सभी सुख हासिल हो गए हैं।॥ ३॥

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਰਖਵਾਲੇ ॥
पारब्रहम प्रभ भए रखवाले ॥
परब्रह्म प्रभु मेरा रखवाला बन गया है,

ਜਿਥੈ ਕਿਥੈ ਦੀਸਹਿ ਨਾਲੇ ॥
जिथै किथै दीसहि नाले ॥
जहाँ कहीं भी देखता हूँ, मुझे साथ ही दिखाई देता है।

ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਖਸਮਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੇ ॥੪॥੨॥
नानक दास खसमि प्रतिपाले ॥४॥२॥
हे नानक ! मालिक-प्रभु ही अपने दास का प्रतिपालक है॥ ४॥ २॥

ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥

ਸੁਖ ਨਿਧਾਨ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ॥
सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥
हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तू सुखों का भण्डार है।

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