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ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩आसावरी महला ५ घरु ३आसावरी महला ५ घरु ३ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਾਗੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥मेरे मन का प्रेम हरि के साथ लग गया है। ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ

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ਭਗਤਿ ਨਿਰਾਲੀ ਅਲਾਹ ਦੀ ਜਾਪੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਿ ॥भगति निराली अलाह दी जापै गुर वीचारि ॥अल्लाह की भक्ति बड़ी निराली है जो गुरु के उपदेश द्वारा ही समझी जाती है। ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਵਸੈ ਭੈ ਭਗਤੀ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰਿ ॥੯॥੧੪॥੩੬॥नानक नामु हिरदै वसै भै भगती नामि सवारि ॥९॥१४॥३६॥हे नानक ! जिसके हृदय में परमात्मा का नाम बस

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ਸਹਜੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਗਿਆਨੁ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੧॥सहजे नामु धिआईऐ गिआनु परगटु होइ ॥१॥सहजता से प्रभु नाम का ध्यान करने से ज्ञान प्रगट हो जाता है। १ । ਏ ਮਨ ਮਤ ਜਾਣਹਿ ਹਰਿ ਦੂਰਿ ਹੈ ਸਦਾ ਵੇਖੁ ਹਦੂਰਿ ॥ए मन मत जाणहि हरि दूरि है सदा वेखु हदूरि ॥हे मेरे मन ! हरि की दूर मत

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ਘਰ ਹੀ ਸੋ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥੧॥घर ही सो पिरु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥१॥सच्चे शब्द का चिंतन करने से उन्हें अपने हृदय घर में प्रभु मिल गया है। १॥ ਅਵਗਣ ਗੁਣੀ ਬਖਸਾਇਆ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥अवगण गुणी बखसाइआ हरि सिउ लिव लाई ॥उन्होंने अपने गुणों द्वारा अपने अवगुणों को क्षमा करवा

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ਏ ਮਨ ਰੂੜ੍ਹ੍ਹੇ ਰੰਗੁਲੇ ਤੂੰ ਸਚਾ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇ ॥ए मन रूड़्हे रंगुले तूं सचा रंगु चड़ाइ ॥हे मेरे सुन्दर, रंगीले मन ! तू सच्चा रंग अपने ऊपर चढ़ा। ਰੂੜੀ ਬਾਣੀ ਜੇ ਰਪੈ ਨਾ ਇਹੁ ਰੰਗੁ ਲਹੈ ਨ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥रूड़ी बाणी जे रपै ना इहु रंगु लहै न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥यदि तुम सुन्दर

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ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥आसा महला ३ ॥आसा महला ३ ॥ ਆਪੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਾਦੁ ਮੀਠਾ ਭਾਈ ॥आपै आपु पछाणिआ सादु मीठा भाई ॥हे भाई ! जो मनुष्य अपने आप को पहचान लेता है, उसे मीठा हरि रस अच्छा लगता है। ਹਰਿ ਰਸਿ ਚਾਖਿਐ ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਜਿਨੑਾ ਸਾਚੋ ਭਾਈ ॥੧॥हरि रसि चाखिऐ मुकतु भए जिन्हा साचो

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ਆਪਣੈ ਹਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਦੇ ਨਾਮੇ ਲਾਏ ॥आपणै हथि वडिआईआ दे नामे लाए ॥सब उपलब्धियाँ भगवान के हाथ हैं, वह स्वयं ही (सम्मान) देकर अपने नाम के साथ मिला लेता है। ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਵਡਿਆਈ ਪਾਏ ॥੮॥੪॥੨੬॥नानक नामु निधानु मनि वसिआ वडिआई पाए ॥८॥४॥२६॥हे नानक ! जिसके मन में नाम-निधान बस जाता है, वह

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ਨਾਮੇ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝੈ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥नामे त्रिसना अगनि बुझै नामु मिलै तिसै रजाई ॥१॥ रहाउ ॥नाम के माध्यम से तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है। परमात्मा की रज़ा से ही नाम प्राप्त होता है। १॥ रहाउ॥ ਕਲਿ ਕੀਰਤਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਨੁ ॥कलि कीरति सबदु पछानु ॥कलियुग में प्रभु की कीर्ति करो

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ਤਾ ਕੇ ਰੂਪ ਨ ਜਾਹੀ ਲਖਣੇ ਕਿਆ ਕਰਿ ਆਖਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥੨॥ता के रूप न जाही लखणे किआ करि आखि वीचारी ॥२॥उसके रूप जाने नहीं जा सकते, वर्णन करने एवं सोचने से मनुष्य क्या कर सकते हैं ? ॥ २॥ ਤੀਨਿ ਗੁਣਾ ਤੇਰੇ ਜੁਗ ਹੀ ਅੰਤਰਿ ਚਾਰੇ ਤੇਰੀਆ ਖਾਣੀ ॥तीनि गुणा तेरे जुग ही अंतरि चारे

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ਜਉ ਲਗੁ ਜੀਉ ਪਰਾਣ ਸਚੁ ਧਿਆਈਐ ॥जउ लगु जीउ पराण सचु धिआईऐ ॥जब तक जीवन एवं प्राण हैं तब तक सत्य का ध्यान करते रहना चाहिए। ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥लाहा हरि गुण गाइ मिलै सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥हरि का गुणानुवाद करने से लाभ प्राप्त होता है और सुख

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