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ਜੇਹੀ ਸੇਵ ਕਰਾਈਐ ਕਰਣੀ ਭੀ ਸਾਈ ॥जेही सेव कराईऐ करणी भी साई ॥भगवान जैसी सेवा मनुष्य से करवाता है, वह वैसा ही कार्य करता है। भगवान स्वयं ही करता है। ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਵੇਖੈ ਵਡਿਆਈ ॥੭॥आपि करे किसु आखीऐ वेखै वडिआई ॥७॥मैं किसका वर्णन करूँ वह अपनी महानता को आप ही देखता है॥ ७॥

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ਹੁਕਮੀ ਪੈਧਾ ਜਾਇ ਦਰਗਹ ਭਾਣੀਐ ॥हुकमी पैधा जाइ दरगह भाणीऐ ॥यदि विधाता को भला लगे तो मनुष्य प्रतिष्ठा की पोशाक पहन कर उसके दरबार में जाता है। ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ਬੰਦਿ ਰਬਾਣੀਐ ॥੫॥हुकमे ही सिरि मार बंदि रबाणीऐ ॥५॥उसकी आज्ञा से ही यम प्राणी के सिर पर चोट करते हैं और उसे कैद में

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ਜੋਗੀ ਭੋਗੀ ਕਾਪੜੀ ਕਿਆ ਭਵਹਿ ਦਿਸੰਤਰ ॥जोगी भोगी कापड़ी किआ भवहि दिसंतर ॥योगी, भोगी एवं फटे-पुराने वस्त्र पहनने वाले फकीर निरर्थक ही परदेसों में भटकते रहते हैं। ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੑਹੀ ਤਤੁ ਸਾਰੁ ਨਿਰੰਤਰ ॥੩॥गुर का सबदु न चीन्हही ततु सारु निरंतर ॥३॥वह गुरु के शब्द एवं निरन्तर श्रेष्ठ सच्चाई को नहीं खोजते ॥

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ਥਾਨ ਮੁਕਾਮ ਜਲੇ ਬਿਜ ਮੰਦਰ ਮੁਛਿ ਮੁਛਿ ਕੁਇਰ ਰੁਲਾਇਆ ॥थान मुकाम जले बिज मंदर मुछि मुछि कुइर रुलाइआ ॥मुगलों ने पठानों के घर, सुख के निवास एवं मजबूत महल जला दिए और टुकड़े-टुकड़े किए हुए शहजादों को मिट्टी में मिला दिया। ਕੋਈ ਮੁਗਲੁ ਨ ਹੋਆ ਅੰਧਾ ਕਿਨੈ ਨ ਪਰਚਾ ਲਾਇਆ ॥੪॥कोई मुगलु न होआ अंधा

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ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੩रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु ३रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु ३ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਜਿਨ ਸਿਰਿ ਸੋਹਨਿ ਪਟੀਆ ਮਾਂਗੀ ਪਾਇ ਸੰਧੂਰੁ ॥जिन सिरि सोहनि पटीआ मांगी पाइ संधूरु ॥जिन सुन्दर नारियों के

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ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥आसा महला १ ॥आसा महला १ ॥ ਤਨੁ ਬਿਨਸੈ ਧਨੁ ਕਾ ਕੋ ਕਹੀਐ ॥तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥जब इन्सान का तन नाश हो जाता है तो उसके द्वारा संचित धन किसका कहा जा सकता है ? ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਤ ਲਹੀਐ ॥बिनु गुर राम नामु कत लहीऐ ॥गुरु के

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ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਜੋਤਿ ਅਨੂਪੁ ॥कंचन काइआ जोति अनूपु ॥उसकी काया प्रभु की अनूप ज्योति से सोना हो जाती है और ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਦੇਵਾ ਸਗਲ ਸਰੂਪੁ ॥त्रिभवण देवा सगल सरूपु ॥वह सभी तीन लोकों में प्रभु का स्वरूप देख लेता है। ਮੈ ਸੋ ਧਨੁ ਪਲੈ ਸਾਚੁ ਅਖੂਟੁ ॥੪॥मै सो धनु पलै साचु अखूटु ॥४॥मेरे दामन में प्रभु

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ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਰਮ ਕਮਾਉ ॥गुर परसादी करम कमाउ ॥गुरु की दया से शुभ कर्म करो। ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੫॥नामे राता हरि गुण गाउ ॥५॥नाम में अनुरक्त होकर हरि का गुणगान करो।॥ ५॥ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ॥गुर सेवा ते आपु पछाता ॥गुरु की सेवा से मैंने अपने आत्मस्वरूप को समझ लिया है।

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ਸੁਖੁ ਮਾਨੈ ਭੇਟੈ ਗੁਰ ਪੀਰੁ ॥सुखु मानै भेटै गुर पीरु ॥जिसे गुरु-पीर मिल जाता है, वह सदा सुख भोगता है। ਏਕੋ ਸਾਹਿਬੁ ਏਕੁ ਵਜੀਰੁ ॥੫॥एको साहिबु एकु वजीरु ॥५॥एक परमात्मा ही दुनिया का बादशाह है और खुद ही अपना एक वजीर है॥ ५ ॥ ਜਗੁ ਬੰਦੀ ਮੁਕਤੇ ਹਉ ਮਾਰੀ ॥जगु बंदी मुकते हउ मारी ॥यह

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ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਫੁਨਿ ਹੋਇ ॥जो तिसु भावै सो फुनि होइ ॥जो कुछ उसे अच्छा लगता है, संसार में वही होता है। ਸੁਣਿ ਭਰਥਰਿ ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥सुणि भरथरि नानकु कहै बीचारु ॥हे भर्तृहरि योगी ! सुन, नानक तुझे विचार की बात कहता है, ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਮੇਰਾ ਆਧਾਰੁ ॥੮॥੧॥निरमल नामु मेरा आधारु ॥८॥१॥उस प्रभु

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