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ਗੁਰੂ ਵਿਟਹੁ ਹਉ ਵਾਰਿਆ ਜਿਸੁ ਮਿਲਿ ਸਚੁ ਸੁਆਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥गुरू विटहु हउ वारिआ जिसु मिलि सचु सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥जिन से मिलकर मेरा सच्चा प्रभु मुझे मिल गया है। १॥ रहाउ॥ ਸਗੁਨ ਅਪਸਗੁਨ ਤਿਸ ਕਉ ਲਗਹਿ ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥सगुन अपसगुन तिस कउ लगहि जिसु चीति न आवै ॥जिसे प्रभु याद नहीं आता

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ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਮਹਲੁ ਪਾਈਐ ਜਗੁ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਐ ॥੨॥गुर सेवा महलु पाईऐ जगु दुतरु तरीऐ ॥२॥गुरु की सेवा करने से (प्रभु-चरणों में) निवास मिल जाता है और इस विषम जगत-समुद्र से पार हुआ जाता है॥ २॥ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਤੇਰੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਮਨ ਮਾਹਿ ਨਿਧਾਨਾ ॥द्रिसटि तेरी सुखु पाईऐ मन माहि निधाना ॥हे भगवान् ! तेरी दया-दृष्टि से

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ਸੀਤਲੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਤ ਤਪਤਿ ਜਾਇ ॥੩॥सीतलु हरि हरि नामु सिमरत तपति जाइ ॥३॥हरि-प्रभु का नाम बहुत शीतल है, इसका सुमिरन करने से जलन बुझ जाती है॥ ३॥ ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਣਾ ਨਾਨਕ ਜਨ ਧੂਰਾ ॥सूख सहज आनंद घणा नानक जन धूरा ॥हे नानक ! जो मनुष्य संतजनों की चरण-धूलि हो जाता है, उसे

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ਜਿਸ ਨੋ ਮੰਨੇ ਆਪਿ ਸੋਈ ਮਾਨੀਐ ॥जिस नो मंने आपि सोई मानीऐ ॥हे साहिब ! जिसे तू स्वयं स्वीकार करता है, केवल उसे मान-सम्मान प्राप्त होता है। ਪ੍ਰਗਟ ਪੁਰਖੁ ਪਰਵਾਣੁ ਸਭ ਠਾਈ ਜਾਨੀਐ ॥੩॥प्रगट पुरखु परवाणु सभ ठाई जानीऐ ॥३॥ऐसा स्वीकृत हुआ एवं प्रसिद्ध पुरुष सर्वत्र लोकप्रिय हो जाता है।॥ ३॥ ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਆਰਾਧਿ ਸਮ੍ਹ੍ਹਾਲੇ

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ਸੋ ਛੂਟੈ ਮਹਾ ਜਾਲ ਤੇ ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ॥੨॥सो छूटै महा जाल ते जिसु गुर सबदु निरंतरि ॥२॥जिसके अन्तर्मन में गुरु का शब्द मौजूद होता है केवल वही महाजाल से छूट सकता है॥ २॥ ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਿਆ ਕਹਾ ਗੁਰੁ ਬਿਬੇਕ ਸਤ ਸਰੁ ॥गुर की महिमा किआ कहा गुरु बिबेक सत सरु ॥गुरु की

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ਗੁਰੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਭਇਆ ਦਇਆਲਾ ॥गुरु नानक जा कउ भइआ दइआला ॥हे नानक ! जिस पर गुरु दयालु हो गया है,” ਸੋ ਜਨੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲਾ ॥੪॥੬॥੧੦੦॥सो जनु होआ सदा निहाला ॥४॥६॥१००॥वह मनुष्य सदैव प्रसन्नचित्त हो गया है॥ ४॥ ६ ॥ १०० ॥ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥आसा महला ५ ॥आसा महला ५ ॥ ਸਤਿਗੁਰ

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ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੈ ਨਾਇ ਲਾਏ ਸਰਬ ਸੂਖ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮਰੀ ਰਜਾਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥हे स्वामी ! कृपा करके तुम जीवों को अपने नाम के साथ लगाते हो और जीवों को सर्व सुख तेरी रज़ा में ही प्राप्त होते हैं।॥ रहाउ॥ ਸੰਗਿ ਹੋਵਤ ਕਉ ਜਾਨਤ

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ਲਾਲ ਜਵੇਹਰ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥लाल जवेहर भरे भंडार ॥हीरे-जवाहरातों से मेरे भण्डार भरे हुए हैं। ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਜਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥तोटि न आवै जपि निरंकार ॥निरंकार प्रभु का जाप करने से वह कम नहीं होते। ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦੁ ਪੀਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥अम्रित सबदु पीवै जनु कोइ ॥हे नानक ! कोई भक्तजन ही नाम-अमृत का पान करता

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ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਲਾਗੈ ਪ੍ਰਭ ਰੰਗੁ ॥੧॥जिसु भेटत लागै प्रभ रंगु ॥१॥जिसके मिलन से प्रभु से प्रेम हो जाता है॥ १॥ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਓਇ ਆਨੰਦ ਪਾਵੈ ॥गुर प्रसादि ओइ आनंद पावै ॥गुरु की कृपा से वह सुख पा लेता है। ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸਾ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥जिसु सिमरत

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ਸੰਚਤ ਸੰਚਤ ਥੈਲੀ ਕੀਨੑੀ ॥संचत संचत थैली कीन्ही ॥उसने धन संचय करके खजाना भर लिया परन्तु ਪ੍ਰਭਿ ਉਸ ਤੇ ਡਾਰਿ ਅਵਰ ਕਉ ਦੀਨੑੀ ॥੧॥प्रभि उस ते डारि अवर कउ दीन्ही ॥१॥आखिरकार परमात्मा ने उसकी धन-दौलत उससे छीनकर किसी दूसरे को दे दी है॥ १॥ ਕਾਚ ਗਗਰੀਆ ਅੰਭ ਮਝਰੀਆ ॥काच गगरीआ अंभ मझरीआ ॥यह मानव-शरीर कच्ची

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