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ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੈ ਤਿਸੁ ਆਪਨ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ॥जिस नो क्रिपा करै तिसु आपन नामु देइ ॥परमात्मा जिस पर अपनी कृपा करता है, उसे ही अपना नाम दे देता है। ਬਡਭਾਗੀ ਨਾਨਕ ਜਨ ਸੇਇ ॥੮॥੧੩॥बडभागी नानक जन सेइ ॥८॥१३॥हे नानक ! ऐसा व्यक्ति बड़ा भाग्यशाली है॥ ८ ॥ १३॥ ਸਲੋਕੁ ॥सलोकु ॥श्लोक ॥ ਤਜਹੁ ਸਿਆਨਪ

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ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਓਇ ਭੀ ਗਤਿ ਪਾਹਿ ॥੨॥नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि ॥२॥हे नानक ! यदि संत को भला लगे तो निंदक भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ २ ॥ ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਮਹਾ ਅਤਤਾਈ ॥संत का निंदकु महा अतताई ॥संत की निन्दा करने वाला सबसे बुरे कर्म करने वाला महानीच

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ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਆਵੈ ਮਾਇਆ ਪਾਛੈ ਪਾਵੈ ॥त्रिपति न आवै माइआ पाछै पावै ॥धन-दौलत की तलाश में उसकी तृप्ति नहीं होती। ਅਨਿਕ ਭੋਗ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਕਰੈ ॥अनिक भोग बिखिआ के करै ॥इन्सान अधिकतर विषय-विकारों के भोग में लगा रहता है, ਨਹ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮਰੈ ॥नह त्रिपतावै खपि खपि मरै ॥परन्तु वह तृप्त नहीं होता और

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ਨਾਨਾ ਰੂਪ ਜਿਉ ਸ੍ਵਾਗੀ ਦਿਖਾਵੈ ॥नाना रूप जिउ स्वागी दिखावै ॥बहुरूपिए की भाँति वह अत्याधिक रूप धारण करता हुआ भी दिखाई देता है। ਜਿਉ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਨਚਾਵੈ ॥जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥जिस तरह प्रभु को उपयुक्त लगता है, वैसे ही नचाता है ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਹੋਇ ॥जो तिसु भावै सोई होइ ॥जैसे

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ਅੰਤੁ ਨਹੀ ਕਿਛੁ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥अंतु नही किछु पारावारा ॥उसकी ताकत का कोई ओर-छोर नहीं। ਹੁਕਮੇ ਧਾਰਿ ਅਧਰ ਰਹਾਵੈ ॥हुकमे धारि अधर रहावै ॥अपने हुक्म द्वारा उसने धरती की स्थापना की है और बिना किसी सहारे के उसने (टिकाया) रखा हुआ है। ਹੁਕਮੇ ਉਪਜੈ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥हुकमे उपजै हुकमि समावै ॥जो कुछ उसके हुक्म द्वारा उत्पन्न

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ਕਈ ਕੋਟਿ ਦੇਵ ਦਾਨਵ ਇੰਦ੍ਰ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰ ॥कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥कई करोड़ देवते, राक्षस एवं इन्द्र हैं, जिनके सिर पर छत्र हैं। ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਅਪਨੈ ਸੂਤਿ ਧਾਰੈ ॥सगल समग्री अपनै सूति धारै ॥ईश्वर ने सारी सृष्टि को अपने (हुक्म के) धागे में पिरोया हुआ है। ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਤਿਸੁ

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ਤਿਸ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸਤਿ ਰਾਮਦਾਸੁ ॥तिस का नामु सति रामदासु ॥उसका नाम सत्य ही रामदास है। ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਤਿਸੁ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ॥आतम रामु तिसु नदरी आइआ ॥उसे अपने अन्तर में ही राम दिखाई दे गया है। ਦਾਸ ਦਸੰਤਣ ਭਾਇ ਤਿਨਿ ਪਾਇਆ ॥दास दसंतण भाइ तिनि पाइआ ॥सेवकों का सेवक होने के स्वभाव से उसने ईश्वर

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ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਆਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥ब्रह्मज्ञानी स्वयं ही निरंकार है। ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਸੋਭਾ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਬਨੀ ॥ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी ॥ब्रह्मज्ञानी की शोभा केवल ब्रह्मज्ञानी को ही बनती है। ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਰਬ ਕਾ ਧਨੀ ॥੮॥੮॥नानक ब्रहम गिआनी सरब का धनी ॥८॥८॥हे नानक ! ब्रह्मज्ञानी सबका मालिक है॥

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ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬਰਸੀ ॥ब्रहम गिआनी की द्रिसटि अम्रितु बरसी ॥ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि से अमृत बरसता है। ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਬੰਧਨ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ॥ब्रहम गिआनी बंधन ते मुकता ॥ब्रह्मज्ञानी बन्धनों से मुक्त रहता है। ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਜੁਗਤਾ ॥ब्रहम गिआनी की निरमल जुगता ॥ब्रह्मज्ञानी का जीवन-आचरण बड़ा पवित्र है। ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਭੋਜਨੁ

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ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਫਲ ਜਨੰਮ ॥੫॥नानक साध कै संगि सफल जनम ॥५॥हे नानक ! साधुओं की संगति में रहने से मनुष्य-जन्म सफल हो जाता है॥ ५॥ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨਹੀ ਕਛੁ ਘਾਲ ॥साध कै संगि नही कछु घाल ॥साधुओं की संगति करने से मनुष्य को मेहनत नहीं करनी पड़ती। ਦਰਸਨੁ ਭੇਟਤ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲ ॥दरसनु

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