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ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ॥प्रभु की कृपा से प्रकाश होता है। ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆ ਤੇ ਕਮਲ ਬਿਗਾਸੁ ॥प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥प्रभु की कृपा से हृदय-कमल प्रफुल्लित होता है। ਪ੍ਰਭ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਬਸੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ॥जब प्रभु सुप्रसन्न होता है, तो वह मनुष्य के हृदय

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ਮੁਖਿ ਤਾ ਕੋ ਜਸੁ ਰਸਨ ਬਖਾਨੈ ॥मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥अपने मुँह एवं जिव्हा से उसका यश सदैव बखान कर। ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੇਰੋ ਰਹਤਾ ਧਰਮੁ ॥जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ॥जिसकी कृपा से तेरा धर्म कायम रहता है, ਮਨ ਸਦਾ ਧਿਆਇ ਕੇਵਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥हे मेरे मन ! तू

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ਮਿਥਿਆ ਨੇਤ੍ਰ ਪੇਖਤ ਪਰ ਤ੍ਰਿਅ ਰੂਪਾਦ ॥मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥वे नेत्र मिथ्या हैं, जो पराई नारी का सौंदर्य रूप देखते हैं। ਮਿਥਿਆ ਰਸਨਾ ਭੋਜਨ ਅਨ ਸ੍ਵਾਦ ॥मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥वह जिव्हा भी मिथ्या है, जो पकवान एवं दूसरे स्वाद भोगती है। ਮਿਥਿਆ ਚਰਨ ਪਰ ਬਿਕਾਰ ਕਉ ਧਾਵਹਿ ॥मिथिआ चरन पर

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ਇਆਹੂ ਜੁਗਤਿ ਬਿਹਾਨੇ ਕਈ ਜਨਮ ॥इआहू जुगति बिहाने कई जनम ॥युक्तियों में मनुष्य ने अनेकों जन्म व्यतीत कर दिए हैं। ਨਾਨਕ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਆਪਨ ਕਰਿ ਕਰਮ ॥੭॥नानक राखि लेहु आपन करि करम ॥७॥नानक की विनती है कि हे प्रभु ! अपनी कृपा धारण करके जीव को भवसागर से बचाले॥ ७॥ ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ

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ਮੁਖਿ ਅਪਿਆਉ ਬੈਠ ਕਉ ਦੈਨ ॥मुखि अपिआउ बैठ कउ दैन ॥बैठे ही मुँह में भोजन डालने के लिए -तेरी सेवा के लिए दिए हैं। ਇਹੁ ਨਿਰਗੁਨੁ ਗੁਨੁ ਕਛੂ ਨ ਬੂਝੈ ॥इहु निरगुनु गुनु कछू न बूझै ॥यह गुणविहीन मनुष्य किए हुए उपकारों की कुछ भी कद्र नहीं करता। ਬਖਸਿ ਲੇਹੁ ਤਉ ਨਾਨਕ ਸੀਝੈ ॥੧॥बखसि लेहु

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ਅਨਿਕ ਜਤਨ ਕਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨ ਨਾ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥अनिक जतन करि त्रिसन ना ध्रापै ॥अनेक यत्न करने से भी तृष्णा नहीं बुझती। ਭੇਖ ਅਨੇਕ ਅਗਨਿ ਨਹੀ ਬੁਝੈ ॥भेख अनेक अगनि नही बुझै ॥अनेकों धार्मिक वेष बदलने से (तृष्णा की) अग्नि नहीं बुझती। ਕੋਟਿ ਉਪਾਵ ਦਰਗਹ ਨਹੀ ਸਿਝੈ ॥कोटि उपाव दरगह नही सिझै ॥(ऐसे) करोड़ों ही उपायों द्वारा

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ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਨ ਕਉ ਭੋਗ ਜੋਗ ॥हरि का नामु जन कउ भोग जोग ॥भगवान का नाम ही भक्त के लिए योग (साधन) एवं गृहस्थी का माया-भोग है। ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਕਛੁ ਨਾਹਿ ਬਿਓਗੁ ॥हरि नामु जपत कछु नाहि बिओगु ॥भगवान के नाम का जाप करने से उसे कोई दुःख-क्लेश नहीं होता। ਜਨੁ ਰਾਤਾ ਹਰਿ

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ਅਸਟਪਦੀ ॥असटपदी ॥अष्टपदी। ਜਹ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਮੀਤ ਨ ਭਾਈ ॥जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥जहाँ माता, पिता, पुत्र, मित्र एवं भाई, कोई (सहायक) नहीं, ਮਨ ਊਹਾ ਨਾਮੁ ਤੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ॥मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई ॥वहाँ हे मेरे मन ! ईश्वर का नाम तेरे साथ सहायक होगा। ਜਹ ਮਹਾ ਭਇਆਨ ਦੂਤ

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ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਲਾਗਉ ਪਾਏ ॥੩॥नानक ता कै लागउ पाए ॥३॥हे नानक ! मैं उन सिमरन करने वाले महापुरुषों के चरण-स्पर्श करता हूँ॥ ३॥ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ॥प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥प्रभु का सिमरन सबसे ऊँचा है। ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਉਧਰੇ ਮੂਚਾ ॥प्रभ कै सिमरनि उधरे मूचा ॥प्रभु का सिमरन

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ਨਾਨਕ ਦੀਜੈ ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਰਾਖਉ ਹੀਐ ਪਰੋਇ ॥੫੫॥नानक दीजै नाम दानु राखउ हीऐ परोइ ॥५५॥मुझे अपने नाम का दान प्रदान कीजिए चूंकि जो मैं इसे अपने हृदय में पिरोकर रखूं ॥५५॥ ਸਲੋਕੁ ॥सलोकु ॥श्लोक॥ ਗੁਰਦੇਵ ਮਾਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਪਿਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਸੁਆਮੀ ਪਰਮੇਸੁਰਾ ॥गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥गुरु ही माता है, गुरु ही पिता

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