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ਆਪਨ ਖੇਲੁ ਆਪਿ ਵਰਤੀਜਾ ॥आपन खेलु आपि वरतीजा ॥हे नानक ! (सृष्टि रूपी) अपनी लीला अकाल पुरुष ने स्वयं ही रची है, ਨਾਨਕ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ॥੧॥नानक करनैहारु न दूजा ॥१॥इसके अलावा दूसरा कोई रचयिता नहीं ॥ १॥ ਜਬ ਹੋਵਤ ਪ੍ਰਭ ਕੇਵਲ ਧਨੀ ॥जब होवत प्रभ केवल धनी ॥जब जगत् का स्वामी परमात्मा केवल स्वयं

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ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਦੀਆ ॥सो किउ बिसरै जिनि सभु किछु दीआ ॥वह ईश्वर क्यों विस्मृत हो, जिसने हमें सब कुछ दिया है। ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਜੀਵਨ ਜੀਆ ॥सो किउ बिसरै जि जीवन जीआ ॥यह परमात्मा क्यों विस्मृत हो, जो जीवों के जीवन का आधार है। ਸੋ ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਜਿ ਅਗਨਿ ਮਹਿ

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ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਜਾਹਿ ॥जनम जनम के किलबिख जाहि ॥तेरे जन्म-जन्मांतर के पाप दूर हो जाएँगे। ਆਪਿ ਜਪਹੁ ਅਵਰਾ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵਹੁ ॥आपि जपहु अवरा नामु जपावहु ॥स्वयं ईश्वर के नाम का जाप कर और दूसरों से भी नाम का जाप करवा। ਸੁਨਤ ਕਹਤ ਰਹਤ ਗਤਿ ਪਾਵਹੁ ॥सुनत कहत रहत गति पावहु ॥सुनने, कहने एवं

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ਰਚਿ ਰਚਨਾ ਅਪਨੀ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥रचि रचना अपनी कल धारी ॥सृष्टि की रचना करके प्रभु ने अपनी सत्ता टिकाई है। ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥੮॥੧੮॥अनिक बार नानक बलिहारी ॥८॥१८॥हे नानक ! मैं अनेक बार उस (प्रभु) पर कुर्बान जाता हूँ ॥८॥१८॥ ਸਲੋਕੁ ॥सलोकु ॥श्लोक ॥ ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਬਿਨੁ ਭਜਨ ਬਿਖਿਆ ਸਗਲੀ ਛਾਰੁ ॥साथि न

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ਅਪਨੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਕਰੇਇ ॥अपनी क्रिपा जिसु आपि करेइ ॥हे नानक ! जिस पर गुरु जी स्वयं कृपा करते हैं, ਨਾਨਕ ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਲੇਇ ॥੨॥नानक सो सेवकु गुर की मति लेइ ॥२॥वह सेवक गुरु की शिक्षा प्राप्त करता है॥ २॥ ਬੀਸ ਬਿਸਵੇ ਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥बीस बिसवे गुर का मनु

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ਤਾ ਕਉ ਰਾਖਤ ਦੇ ਕਰਿ ਹਾਥ ॥ता कउ राखत दे करि हाथ ॥उसको वह अपना हाथ देकर बचा लेता है। ਮਾਨਸ ਜਤਨ ਕਰਤ ਬਹੁ ਭਾਤਿ ॥मानस जतन करत बहु भाति ॥मनुष्य अनेक विधियों से यत्न करता है, ਤਿਸ ਕੇ ਕਰਤਬ ਬਿਰਥੇ ਜਾਤਿ ॥तिस के करतब बिरथे जाति ॥परन्तु उसके काम असफल हो जाते हैं। ਮਾਰੈ

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ਜਿਸ ਕੀ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸੁ ਕਰਣੈਹਾਰੁ ॥जिस की स्रिसटि सु करणैहारु ॥जिसकी यह सृष्टि है, वही उसका सृजनहार है। ਅਵਰ ਨ ਬੂਝਿ ਕਰਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥अवर न बूझि करत बीचारु ॥कोई दूसरा उसको नहीं समझता, चाहे वह कैसे विचार करे। ਕਰਤੇ ਕੀ ਮਿਤਿ ਨ ਜਾਨੈ ਕੀਆ ॥करते की मिति न जानै कीआ ॥करतार का विस्तार, उसका उत्पन्न

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ਨਾਨਕ ਕੈ ਮਨਿ ਇਹੁ ਅਨਰਾਉ ॥੧॥नानक कै मनि इहु अनराउ ॥१॥नानक के मन में यही अभिलाषा है ॥ १॥ ਮਨਸਾ ਪੂਰਨ ਸਰਨਾ ਜੋਗ ॥मनसा पूरन सरना जोग ॥भगवान मनोकामना पूर्ण करने वाला एवं शरण देने योग्य है। ਜੋ ਕਰਿ ਪਾਇਆ ਸੋਈ ਹੋਗੁ ॥जो करि पाइआ सोई होगु ॥जो कुछ ईश्वर ने अपने हाथ से लिख

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ਪੁਰਬ ਲਿਖੇ ਕਾ ਲਿਖਿਆ ਪਾਈਐ ॥पुरब लिखे का लिखिआ पाईऐ ॥तुझे वह कुछ मिलेगा, जो तेरे पूर्व जन्म के कर्मों द्वारा लिखा हुआ है। ਦੂਖ ਸੂਖ ਪ੍ਰਭ ਦੇਵਨਹਾਰੁ ॥दूख सूख प्रभ देवनहारु ॥प्रभु दुःख एवं सुख देने वाला है। ਅਵਰ ਤਿਆਗਿ ਤੂ ਤਿਸਹਿ ਚਿਤਾਰੁ ॥अवर तिआगि तू तिसहि चितारु ॥अन्य सब कुछ छोड़कर तू उसकी

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ਆਪੇ ਆਪਿ ਸਗਲ ਮਹਿ ਆਪਿ ॥आपे आपि सगल महि आपि ॥सब कुछ वह अपने आप से ही है। वह स्वयं ही सब (जीव-जन्तुओं) में विद्यमान है। ਅਨਿਕ ਜੁਗਤਿ ਰਚਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ॥अनिक जुगति रचि थापि उथापि ॥अनेक युक्तियों द्वारा वह सृष्टि की रचना करता एवं उसका नाश भी करता है। ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਖੰਡ ॥अबिनासी

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