Hindi Page 236

ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਏਕੈ ॥
करन करावन सभु किछु एकै ॥
एक परमेश्वर सब कुछ करता और जीवों से करवाता है।

ਆਪੇ ਬੁਧਿ ਬੀਚਾਰਿ ਬਿਬੇਕੈ ॥
आपे बुधि बीचारि बिबेकै ॥
वह स्वयं ही बुद्धि, विचार एवं विवेक है।

ਦੂਰਿ ਨ ਨੇਰੈ ਸਭ ਕੈ ਸੰਗਾ ॥
दूरि न नेरै सभ कै संगा ॥
वह कहीं दूर नहीं अपितु सबके निकट एवं पास ही है।

ਸਚੁ ਸਾਲਾਹਣੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਾ ॥੮॥੧॥
सचु सालाहणु नानक हरि रंगा ॥८॥१॥
हे नानक ! सत्यस्वरूप परमेश्वर की प्रेमपूर्वकं प्रशंसा कर ॥ ८ ॥ १॥

ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥

ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਨਾਮੇ ਲਾਗਾ ॥
गुर सेवा ते नामे लागा ॥
गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करने से ही मनुष्य नाम के साथ लग जाता है।

ਤਿਸ ਕਉ ਮਿਲਿਆ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗਾ ॥
तिस कउ मिलिआ जिसु मसतकि भागा ॥
जिसके मस्तक पर भाग्यरेखाएँ विद्यमान हों केवल वहीं व्यक्ति नाम को प्राप्त करता है।

ਤਿਸ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਰਵਿਆ ਸੋਇ ॥
तिस कै हिरदै रविआ सोइ ॥
वह प्रभु उसके हृदय में निवास करता है।

ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਨਿਹਚਲੁ ਹੋਇ ॥੧॥
मनु तनु सीतलु निहचलु होइ ॥१॥
(प्रभु के निवास से) मनुष्य का मन एवं तन शीतल तथा स्थिर हो जाते हैं।॥ १॥

ਐਸਾ ਕੀਰਤਨੁ ਕਰਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
ऐसा कीरतनु करि मन मेरे ॥
हे मेरे मन ! ईश्वर का ऐसा भजन गायन कर,

ਈਹਾ ਊਹਾ ਜੋ ਕਾਮਿ ਤੇਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ईहा ऊहा जो कामि तेरै ॥१॥ रहाउ ॥
जो लोक तथा परलोक में तेरे काम आएगा ॥ १॥ रहाउ ॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਭਉ ਅਪਦਾ ਜਾਇ ॥
जासु जपत भउ अपदा जाइ ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से भय एवं विपदा दूर हो जाते हैं

ਧਾਵਤ ਮਨੂਆ ਆਵੈ ਠਾਇ ॥
धावत मनूआ आवै ठाइ ॥
और भटकता हुआ मन स्थिर हो जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
जासु जपत फिरि दूखु न लागै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से पीड़ा दोबारा नहीं आती।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਇਹ ਹਉਮੈ ਭਾਗੈ ॥੨॥
जासु जपत इह हउमै भागै ॥२॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह अहंकार भाग जाता है॥ २॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਵਸਿ ਆਵਹਿ ਪੰਚਾ ॥
जासु जपत वसि आवहि पंचा ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से पाँच विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार) वश में आ जाते हैं।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਰਿਦੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੰਚਾ ॥
जासु जपत रिदै अम्रितु संचा ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से हरि-रस हृदय में संचित हो जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਇਹ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ॥
जासु जपत इह त्रिसना बुझै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह तृष्णा मिट जाती है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸਿਝੈ ॥੩॥
जासु जपत हरि दरगह सिझै ॥३॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से प्रभु के दरबार में मनुष्य स्वीकार हो जाता है॥ ३॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਕੋਟਿ ਮਿਟਹਿ ਅਪਰਾਧ ॥
जासु जपत कोटि मिटहि अपराध ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਹਰਿ ਹੋਵਹਿ ਸਾਧ ॥
जासु जपत हरि होवहि साध ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य हरि का संत बन जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਵੈ ॥
जासु जपत मनु सीतलु होवै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से मन शीतल हो जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਮਲੁ ਸਗਲੀ ਖੋਵੈ ॥੪॥
जासु जपत मलु सगली खोवै ॥४॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से तमाम (मोह-माया की) मैल साफ हो जाती है॥ ४ ॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਰਤਨੁ ਹਰਿ ਮਿਲੈ ॥
जासु जपत रतनु हरि मिलै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से हरि रत्न प्राप्त हो जाता है।

ਬਹੁਰਿ ਨ ਛੋਡੈ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਹਿਲੈ ॥
बहुरि न छोडै हरि संगि हिलै ॥
मनुष्य दोबारा प्रभु को नहीं छोड़ता और उसके साथ घुलमिल जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਕਈ ਬੈਕੁੰਠ ਵਾਸੁ ॥
जासु जपत कई बैकुंठ वासु ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से अधिकतर स्वर्ग में निवास पा लेते हैं।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਸੁਖ ਸਹਜਿ ਨਿਵਾਸੁ ॥੫॥
जासु जपत सुख सहजि निवासु ॥५॥
जिसका भजन करने से मनुष्य सहज ही आत्मिक सुख में निवास करता है। ५॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਇਹ ਅਗਨਿ ਨ ਪੋਹਤ ॥
जासु जपत इह अगनि न पोहत ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से यह अग्नि प्रभावित नहीं करती।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਇਹੁ ਕਾਲੁ ਨ ਜੋਹਤ ॥
जासु जपत इहु कालु न जोहत ॥
जिसका भजन करने से यह मृत्यु दृष्टि नहीं करती।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਤੇਰਾ ਨਿਰਮਲ ਮਾਥਾ ॥
जासु जपत तेरा निरमल माथा ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से तेरा मस्तक निर्मल हो जाएगा।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਸਗਲਾ ਦੁਖੁ ਲਾਥਾ ॥੬॥
जासु जपत सगला दुखु लाथा ॥६॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से तमाम दुःख- क्लेश दूर हो जाता है॥ ६॥

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਮੁਸਕਲੁ ਕਛੂ ਨ ਬਨੈ ॥
जासु जपत मुसकलु कछू न बनै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य पर कोई विपदा पेश नहीं आती।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਸੁਣਿ ਅਨਹਤ ਧੁਨੈ ॥
जासु जपत सुणि अनहत धुनै ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से मनुष्य अनहद ध्वनि श्रवण करता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਇਹ ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ॥
जासु जपत इह निरमल सोइ ॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से प्राणी का जीवन पवित्र हो जाता है।

ਜਾਸੁ ਜਪਤ ਕਮਲੁ ਸੀਧਾ ਹੋਇ ॥੭॥
जासु जपत कमलु सीधा होइ ॥७॥
जिसकी महिमा-स्तुति करने से हृदय कमल सीधा (सरल) हो जाता है॥ ७ ॥

ਗੁਰਿ ਸੁਭ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ਊਪਰਿ ਕਰੀ ॥
गुरि सुभ द्रिसटि सभ ऊपरि करी ॥
गुरु जी ने अपनी शुभ दृष्टि उन सब पर की है,”

ਜਿਸ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦੇ ਹਰੀ ॥
जिस कै हिरदै मंत्रु दे हरी ॥
जिनके हृदय में ईश्वर ने अपना नाम (मंत्र) प्रदान किया है।

ਅਖੰਡ ਕੀਰਤਨੁ ਤਿਨਿ ਭੋਜਨੁ ਚੂਰਾ ॥
अखंड कीरतनु तिनि भोजनु चूरा ॥
वह प्रभु के अखंड कीर्तन को अपना आहार व सुन्दर भोजन मानते हैं

ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥੮॥੨॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥८॥२॥
हे नानक ! जिनके पूर्ण सतिगुरु जी मार्गदर्शक हैं। ॥८॥२॥

ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
गउड़ी महला ५ ॥

ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੈ ॥
गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥
जो व्यक्ति गुरु के शब्द को अपने हृदय में धारण कर लेता है,

ਪੰਚ ਜਨਾ ਸਿਉ ਸੰਗੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥
पंच जना सिउ संगु निवारै ॥
वह पाँच विकारों-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार से अपना संबंध तोड़ लेता है

ਦਸ ਇੰਦ੍ਰੀ ਕਰਿ ਰਾਖੈ ਵਾਸਿ ॥
दस इंद्री करि राखै वासि ॥
और दसों इन्द्रियों (पाँच ज्ञान व पाँच कर्म) को अपने वश में कर लेता है।

ਤਾ ਕੈ ਆਤਮੈ ਹੋਇ ਪਰਗਾਸੁ ॥੧॥
ता कै आतमै होइ परगासु ॥१॥
उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है ॥१॥

ਐਸੀ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਤਾ ਕੈ ਹੋਇ ॥
ऐसी द्रिड़ता ता कै होइ ॥
केवल उसे ही ऐसा आत्मबल प्राप्त होता है,

ਜਾ ਕਉ ਦਇਆ ਮਇਆ ਪ੍ਰਭ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जा कउ दइआ मइआ प्रभ सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिस इन्सान पर प्रभु की दया एवं कृपा होती है॥ १॥ रहाउ ॥

ਸਾਜਨੁ ਦੁਸਟੁ ਜਾ ਕੈ ਏਕ ਸਮਾਨੈ ॥
साजनु दुसटु जा कै एक समानै ॥
ऐसे इन्सान के लिए मित्र एवं शत्रु एक समान हैं।

ਜੇਤਾ ਬੋਲਣੁ ਤੇਤਾ ਗਿਆਨੈ ॥
जेता बोलणु तेता गिआनै ॥
जो कुछ वह बोलता है, वह ज्ञान ही कहता है।

ਜੇਤਾ ਸੁਨਣਾ ਤੇਤਾ ਨਾਮੁ ॥
जेता सुनणा तेता नामु ॥
जो कुछ वह सुनता है, वह प्रभु का नाम ही सुनता रहता है।

ਜੇਤਾ ਪੇਖਨੁ ਤੇਤਾ ਧਿਆਨੁ ॥੨॥
जेता पेखनु तेता धिआनु ॥२॥
जो कुछ वह दृष्टिगोचर करता है, उस सब में ईश्वर की अनुभूति है॥ २॥

ਸਹਜੇ ਜਾਗਣੁ ਸਹਜੇ ਸੋਇ ॥
सहजे जागणु सहजे सोइ ॥
वह सुख में जागता है और सुख में ही सोता है।

ਸਹਜੇ ਹੋਤਾ ਜਾਇ ਸੁ ਹੋਇ ॥
सहजे होता जाइ सु होइ ॥
जो कुछ प्राकृतिक होना है, वह उसके होने पर प्रसन्न रहता है।

ਸਹਜਿ ਬੈਰਾਗੁ ਸਹਜੇ ਹੀ ਹਸਨਾ ॥
सहजि बैरागु सहजे ही हसना ॥
सहज ही वह वैराग्यवान होता है और सहज ही मुस्कराता है।

ਸਹਜੇ ਚੂਪ ਸਹਜੇ ਹੀ ਜਪਨਾ ॥੩॥
सहजे चूप सहजे ही जपना ॥३॥
सुख में ही वह खामोश रहता है और सुख में ही प्रभु के नाम का जाप करता है॥ ३॥                           

ਸਹਜੇ ਭੋਜਨੁ ਸਹਜੇ ਭਾਉ ॥
सहजे भोजनु सहजे भाउ ॥
सहज ही वह भोजन करता है और सहज ही वह प्रभु से प्रेम करता है।

ਸਹਜੇ ਮਿਟਿਓ ਸਗਲ ਦੁਰਾਉ ॥
सहजे मिटिओ सगल दुराउ ॥
उसका अज्ञानता का पर्दा सहज ही सब निवृत्त हो जाता है।

ਸਹਜੇ ਹੋਆ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ॥
सहजे होआ साधू संगु ॥
वह सहज ही संतों की संगति में मिल जाता है।

ਸਹਜਿ ਮਿਲਿਓ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਸੰਗੁ ॥੪॥
सहजि मिलिओ पारब्रहमु निसंगु ॥४॥
सहज ही उसे पारब्रह्म प्रभु प्रत्यक्ष रूप से मिल जाता है। ४ ॥

ਸਹਜੇ ਗ੍ਰਿਹ ਮਹਿ ਸਹਜਿ ਉਦਾਸੀ ॥
सहजे ग्रिह महि सहजि उदासी ॥
आत्मिक स्थिरता में वह घर में रहता है और आत्मिक स्थिरता में ही वह निर्लिप्त रहता है।

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