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ਪਿੰਧੀ ਉਭਕਲੇ ਸੰਸਾਰਾ ॥पिंधी उभकले संसारा ॥जगत के जीव कुएँ की रहटों की भांति भवसागर में डुबकियाँ लगाते रहते हैं अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में भटकते रहते हैं। ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਆਏ ਤੁਮ ਚੇ ਦੁਆਰਾ ॥भ्रमि भ्रमि आए तुम चे दुआरा ॥हे प्रभु! अनेक योनियों में भटक-भटक कर अब मैं तेरे द्वार पर तेरी शरण में
