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ਪਿੰਧੀ ਉਭਕਲੇ ਸੰਸਾਰਾ ॥पिंधी उभकले संसारा ॥जगत के जीव कुएँ की रहटों की भांति भवसागर में डुबकियाँ लगाते रहते हैं अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में भटकते रहते हैं। ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਆਏ ਤੁਮ ਚੇ ਦੁਆਰਾ ॥भ्रमि भ्रमि आए तुम चे दुआरा ॥हे प्रभु! अनेक योनियों में भटक-भटक कर अब मैं तेरे द्वार पर तेरी शरण में

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ਧਨਾਸਰੀ ਬਾਣੀ ਭਗਤਾਂ ਕੀ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨधनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचनधनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਨਾਰਾਇਣ ਨਿੰਦਸਿ ਕਾਇ ਭੂਲੀ ਗਵਾਰੀ ॥नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥हे भूली हुई मूर्ख स्त्री ! तू नारायण की क्यों निन्दा कर रही है

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ਜੈਤਸਰੀ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧ ਚਉਪਦੇजैतसरी महला ४ घरु १ चउपदेजैतसरी महला ४ घरु १ चउपदे ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਮੇਰੈ ਹੀਅਰੈ ਰਤਨੁ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਬਸਿਆ ਗੁਰਿ ਹਾਥੁ ਧਰਿਓ ਮੇਰੈ ਮਾਥਾ ॥मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै

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ਜੈਤਸਰੀ ਮਃ ੪ ॥जैतसरी मः ४ ॥जैतसरी मः ४ ॥ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਕਛੂਅ ਨ ਜਾਨਹ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੇਰੇ ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਇਆਨਾ ॥हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥हे ईश्वर ! हम तेरे मूर्ख, नासमझ एवं नादान बालक हैं और तेरी गति एवं महिमा कुछ भी नहीं जानते। ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ

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ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੀ ਜਗਜੀਵਨਿ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿਓ ਮਨ ਮਾਝਾ ॥जिन कउ क्रिपा करी जगजीवनि हरि उरि धारिओ मन माझा ॥जगत के जीवन परमात्मा ने जिस पर अपनी कृपा की है, उसने अपने मन एवं हृदय में उसे बसा लिया है। ਧਰਮ ਰਾਇ ਦਰਿ ਕਾਗਦ ਫਾਰੇ ਜਨ ਨਾਨਕ ਲੇਖਾ ਸਮਝਾ ॥੪॥੫॥धरम राइ दरि कागद फारे

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ਜੈਤਸਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩जैतसरी महला ५ घरु ३जैतसरी महला ५ घरु ३ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਕੋਈ ਜਾਨੈ ਕਵਨੁ ਈਹਾ ਜਗਿ ਮੀਤੁ ॥कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥कोई विरला ही जानता है कि इस दुनिया में हमारा कौन घनिष्ठ

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ਹਰਿ ਹਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਧਾਰਿ ਗੁਰ ਮੇਲਹੁ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਓੁਮਾਹਾ ਰਾਮ ॥੩॥हरि हरि क्रिपा धारि गुर मेलहु गुरि मिलिऐ हरि ओमाहा राम ॥३॥हे हरि ! कृपा करके मुझे गुरु से मिला दो, क्योंकि गुरु से मिलकर ही तेरे प्रति उमंग पैदा होती है।॥ ३॥ ਕਰਿ ਕੀਰਤਿ ਜਸੁ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ॥करि कीरति जसु अगम अथाहा ॥उस

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ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਆਪੇ ਸਚਿ ਲਾਏ ॥੪॥੭॥नानक आपे वेखै आपे सचि लाए ॥४॥७॥हे नानक ! वह स्वयं सबको देखता रहता है और स्वयं ही मनुष्य को सत्य-नाम में लगाता है॥४॥७॥ ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥धनासरी महला ३ ॥धनासरी महला ३ ॥ ਨਾਵੈ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਮਿਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥परमात्मा

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ਜਪਿ ਮਨ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ॥जपि मन सति नामु सदा सति नामु ॥हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदैव ही सत्य है इसलिए सत्य-नाम का ही जाप करो। ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਮੁਖ ਊਜਲ ਹੋਈ ਹੈ ਨਿਤ ਧਿਆਈਐ ਹਰਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना

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ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜਨ ਭਏ ਖਾਲਸੇ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਜਿਹ ਜਾਨੀ ॥੪॥੩॥कहु कबीर जन भए खालसे प्रेम भगति जिह जानी ॥४॥३॥हे कबीर ! जिन्होंने प्रेमा-भक्ति को समझ लिया है, वे मुक्त हो गए हैं ॥४॥३॥ ਘਰੁ ੨ ॥घरु २ ॥घरु २ ॥ ਦੁਇ ਦੁਇ ਲੋਚਨ ਪੇਖਾ ॥दुइ दुइ लोचन पेखा ॥मैं इन दोनों नयनों से देखता हूँ

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