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ਜੋ ਮਨਿ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥जो मनि राते हरि रंगु लाइ ॥जिनका मन हरि-रंग में रंग जाता है,” ਤਿਨ ਕਾ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਲਾਥਾ ਤੇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਮਿਲੇ ਸੁਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥तिन का जनम मरण दुखु लाथा ते हरि दरगह मिले सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥उनका जन्म-मरण के चक्र का दुख दूर हो जाता है

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ਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥੧॥गुर का दरसनु अगम अपारा ॥१॥परन्तु गुरु का दर्शन (अर्थात् शास्त्र) अगम्य एवं अपार है॥ १॥ ਗੁਰ ਕੈ ਦਰਸਨਿ ਮੁਕਤਿ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥गुर कै दरसनि मुकति गति होइ ॥गुरु के दर्शन (शास्त्र) से मुक्ति एवं गति हो जाती है। ਸਾਚਾ ਆਪਿ ਵਸੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥साचा आपि वसै मनि

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ਬਾਬਾ ਜੁਗਤਾ ਜੀਉ ਜੁਗਹ ਜੁਗ ਜੋਗੀ ਪਰਮ ਤੰਤ ਮਹਿ ਜੋਗੰ ॥बाबा जुगता जीउ जुगह जुग जोगी परम तंत महि जोगं ॥हे बाबा ! असल में वही योगी है, जो युगों-युगांतर तक परम तत्व परमात्मा के योग में लीन रहता है। ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਪਾਇਆ ਗਿਆਨ ਕਾਇਆ ਰਸ ਭੋਗੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥अम्रितु नामु निरंजन पाइआ गिआन

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ਆਸਾ ਘਰੁ ੫ ਮਹਲਾ ੧आसा घरु ५ महला १आसा घरु ५ महला १ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਭੀਤਰਿ ਪੰਚ ਗੁਪਤ ਮਨਿ ਵਾਸੇ ॥भीतरि पंच गुपत मनि वासे ॥काम, कोध, लोभ, मोह एवं अहंकार ये पाँचों ही विकार मेरे मन में छिपकर

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ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। ਆਸਾ ਘਰੁ ੩ ਮਹਲਾ ੧ ॥आसा घरु ३ महला १ ॥आसा घरु ३ महला १ ॥ ਲਖ ਲਸਕਰ ਲਖ ਵਾਜੇ ਨੇਜੇ ਲਖ ਉਠਿ ਕਰਹਿ ਸਲਾਮੁ ॥लख लसकर लख वाजे नेजे लख उठि करहि सलामु ॥“(हे बन्धु !)

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ਆਸ ਪਿਆਸੀ ਸੇਜੈ ਆਵਾ ॥आस पिआसी सेजै आवा ॥अपने पति से मिलन की इच्छा एवं प्यास लेकर यदि मैं सेज पर आती भी हूँ तो ਆਗੈ ਸਹ ਭਾਵਾ ਕਿ ਨ ਭਾਵਾ ॥੨॥आगै सह भावा कि न भावा ॥२॥मुझे पता नहीं है कि मैं प्रियतम-प्रभु को अच्छी लगती हूँ कि नहीं ॥ २॥ ਕਿਆ ਜਾਨਾ ਕਿਆ

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ਆਪੁ ਬੀਚਾਰਿ ਮਾਰਿ ਮਨੁ ਦੇਖਿਆ ਤੁਮ ਸਾ ਮੀਤੁ ਨ ਅਵਰੁ ਕੋਈ ॥आपु बीचारि मारि मनु देखिआ तुम सा मीतु न अवरु कोई ॥मैंने स्वयं विचार करके एवं अपने मन को नियन्त्रण में करके यह भलीभांति देखा है कि तेरे जैसा मित्र अन्य कोई नहीं। ਜਿਉ ਤੂੰ ਰਾਖਹਿ ਤਿਵ ਹੀ ਰਹਣਾ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਦੇਵਹਿ ਕਰਹਿ ਸੋਈ

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ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥आसा महला १ ॥आसा महला १ ॥ ਕਾਇਆ ਬ੍ਰਹਮਾ ਮਨੁ ਹੈ ਧੋਤੀ ॥काइआ ब्रहमा मनु है धोती ॥यह मानव शरीर ही पूजनीय ब्राह्मण है और मन इस ब्राह्मण की धोती है,” ਗਿਆਨੁ ਜਨੇਊ ਧਿਆਨੁ ਕੁਸਪਾਤੀ ॥गिआनु जनेऊ धिआनु कुसपाती ॥ब्रह्म-ज्ञान इसका जनेऊ है और प्रभु का ध्यान इसकी कुशा है। ਹਰਿ ਨਾਮਾ

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ਐਸਾ ਗੁਰਮਤਿ ਰਮਤੁ ਸਰੀਰਾ ॥ ਹਰਿ ਭਜੁ ਮੇਰੇ ਮਨ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ऐसा गुरमति रमतु सरीरा ॥ हरि भजु मेरे मन गहिर ग्मभीरा ॥१॥ रहाउ ॥हे मेरे मन ! सतिगुरु के उपदेश से ऐसे हरि का भजन कर,”जो समस्त शरीरों में समाया हुआ और बहुत ही गहरा एवं गंभीर है॥ १॥ रहाउ॥ ਅਨਤ ਤਰੰਗ

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ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥गुर परसादी हरि रसु पाइआ नामु पदारथु नउ निधि पाई ॥१॥ रहाउ ॥गुरु की कृपा से मैंने हरि-रस प्राप्त किया है और नवनिधियाँ देने वाले नाम-पदार्थ को पा लिया है॥ १॥ रहाउ॥ ਕਰਮ ਧਰਮ ਸਚੁ ਸਾਚਾ ਨਾਉ ॥करम धरम सचु साचा नाउ ॥जिन

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