ਆਸਾ ਘਰੁ ੫ ਮਹਲਾ ੧
आसा घरु ५ महला १
आसा घरु ५ महला १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਭੀਤਰਿ ਪੰਚ ਗੁਪਤ ਮਨਿ ਵਾਸੇ ॥
भीतरि पंच गुपत मनि वासे ॥
काम, कोध, लोभ, मोह एवं अहंकार ये पाँचों ही विकार मेरे मन में छिपकर रहते हैं और
ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਹਿ ਜੈਸੇ ਭਵਹਿ ਉਦਾਸੇ ॥੧॥
थिरु न रहहि जैसे भवहि उदासे ॥१॥
वे स्थिर शांत नहीं रहते और भगौड़े की तरह उदासीन रहते हैं।॥ १॥
ਮਨੁ ਮੇਰਾ ਦਇਆਲ ਸੇਤੀ ਥਿਰੁ ਨ ਰਹੈ ॥
मनु मेरा दइआल सेती थिरु न रहै ॥
मेरा मन दयालु ईश्वर के स्मरण में नहीं टिकता।
ਲੋਭੀ ਕਪਟੀ ਪਾਪੀ ਪਾਖੰਡੀ ਮਾਇਆ ਅਧਿਕ ਲਗੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
लोभी कपटी पापी पाखंडी माइआ अधिक लगै ॥१॥ रहाउ ॥
यह मन लोभी, कपटी, पापी एवं पाखण्डी बन गया है और माया में लिप्त है॥ १॥ रहाउ ॥
ਫੂਲ ਮਾਲਾ ਗਲਿ ਪਹਿਰਉਗੀ ਹਾਰੋ ॥
फूल माला गलि पहिरउगी हारो ॥
मैं अपने कांत-प्रभु के गले में फूलों की माला पहनाऊँगी।
ਮਿਲੈਗਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਤਬ ਕਰਉਗੀ ਸੀਗਾਰੋ ॥੨॥
मिलैगा प्रीतमु तब करउगी सीगारो ॥२॥
जब मेरा प्रियतम-प्रभु मिलेगा तो मैं हार-श्रृंगार करूँगी॥ २॥
ਪੰਚ ਸਖੀ ਹਮ ਏਕੁ ਭਤਾਰੋ ॥
पंच सखी हम एकु भतारो ॥
मेरी पाँच सहेलियाँ (ज्ञानेन्द्रियाँ) हैं और जीवात्मा इनका पति है।
ਪੇਡਿ ਲਗੀ ਹੈ ਜੀਅੜਾ ਚਾਲਣਹਾਰੋ ॥੩॥
पेडि लगी है जीअड़ा चालणहारो ॥३॥
यह ज्ञानेन्द्रियाँ शरीर रूपी पेड़ पर लगी हुई टहनियाँ हैं। जीवात्मा ने अवश्य ही छोड़कर चले जाना है॥ ३॥
ਪੰਚ ਸਖੀ ਮਿਲਿ ਰੁਦਨੁ ਕਰੇਹਾ ॥
पंच सखी मिलि रुदनु करेहा ॥
(विछोह के समय) पाँचों सहेलियाँ (ज्ञानेन्द्रियॉ) विलाप करती हैं।
ਸਾਹੁ ਪਜੂਤਾ ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕ ਲੇਖਾ ਦੇਹਾ ॥੪॥੧॥੩੪॥
साहु पजूता प्रणवति नानक लेखा देहा ॥४॥१॥३४॥
नानक वन्दना करता है कि जब जीवात्मा पकड़ी जाती है तो उसे कर्मो का लेखा देना पड़ता है। ॥४॥१॥३४॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
ਆਸਾ ਘਰੁ ੬ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा घरु ६ महला १ ॥
आसा घरु ६ महला १ ॥
ਮਨੁ ਮੋਤੀ ਜੇ ਗਹਣਾ ਹੋਵੈ ਪਉਣੁ ਹੋਵੈ ਸੂਤ ਧਾਰੀ ॥
मनु मोती जे गहणा होवै पउणु होवै सूत धारी ॥
यदि जीवात्मा अपने मन को निर्मल मोती समान आभूषण बना ले, यदि प्रत्येक सांस धागा बने,”
ਖਿਮਾ ਸੀਗਾਰੁ ਕਾਮਣਿ ਤਨਿ ਪਹਿਰੈ ਰਾਵੈ ਲਾਲ ਪਿਆਰੀ ॥੧॥
खिमा सीगारु कामणि तनि पहिरै रावै लाल पिआरी ॥१॥
यदि क्षमा अर्थात् सहनशीलता को वह श्रृंगार बनाकर अपनी देहि पर पहन ले तो वह पति-परमेश्वर की प्रियतमा होकर उसे मिल सकती है॥ १॥
ਲਾਲ ਬਹੁ ਗੁਣਿ ਕਾਮਣਿ ਮੋਹੀ ॥
लाल बहु गुणि कामणि मोही ॥
हे प्रियतम ! मैं कामिनी तेरे गुणों पर आसक्त हो गई हूँ।
ਤੇਰੇ ਗੁਣ ਹੋਹਿ ਨ ਅਵਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तेरे गुण होहि न अवरी ॥१॥ रहाउ ॥
हे प्रियतम ! तेरे गुण अन्य किसी में विद्यमान नहीं ॥ १॥ रहाउ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਾਰੁ ਕੰਠਿ ਲੇ ਪਹਿਰੈ ਦਾਮੋਦਰੁ ਦੰਤੁ ਲੇਈ ॥
हरि हरि हारु कंठि ले पहिरै दामोदरु दंतु लेई ॥
यदि जीवात्मा परमेश्वर के नाम की माला अपने गले में डाल ले और प्रभु-स्मरण को अपने दांतों का मंजन बना ले।
ਕਰ ਕਰਿ ਕਰਤਾ ਕੰਗਨ ਪਹਿਰੈ ਇਨ ਬਿਧਿ ਚਿਤੁ ਧਰੇਈ ॥੨॥
कर करि करता कंगन पहिरै इन बिधि चितु धरेई ॥२॥
यदि वह सृजनहार प्रभु की भक्ति-सेवा को अपने हाथों का कगन बना कर धारण कर ले तो इस प्रकार उसका मन प्रभु-चरणों में टिका रहेगा ॥२॥
ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਕਰ ਮੁੰਦਰੀ ਪਹਿਰੈ ਪਰਮੇਸਰੁ ਪਟੁ ਲੇਈ ॥
मधुसूदनु कर मुंदरी पहिरै परमेसरु पटु लेई ॥
यदि जीवात्मा मधुसूदन को अंगूठी बनाकर हाथ की उंगली में पहन ले और परमेश्वर को रेशमी वस्त्र के तौर पर प्राप्त करे,”
ਧੀਰਜੁ ਧੜੀ ਬੰਧਾਵੈ ਕਾਮਣਿ ਸ੍ਰੀਰੰਗੁ ਸੁਰਮਾ ਦੇਈ ॥੩॥
धीरजु धड़ी बंधावै कामणि स्रीरंगु सुरमा देई ॥३॥
कामिनी सहनशीलता की पट्टियाँ सजाने के लिए प्रयोग करे और श्रीरंग के नाम का सुरमा डाले॥ ३॥
ਮਨ ਮੰਦਰਿ ਜੇ ਦੀਪਕੁ ਜਾਲੇ ਕਾਇਆ ਸੇਜ ਕਰੇਈ ॥
मन मंदरि जे दीपकु जाले काइआ सेज करेई ॥
यदि वह मन रूपी मंदिर में ज्ञान के दीपक को प्रज्वलित करे और अपनी काया को सेज बना ले तो
ਗਿਆਨ ਰਾਉ ਜਬ ਸੇਜੈ ਆਵੈ ਤ ਨਾਨਕ ਭੋਗੁ ਕਰੇਈ ॥੪॥੧॥੩੫॥
गिआन राउ जब सेजै आवै त नानक भोगु करेई ॥४॥१॥३५॥
हे नानक ! (इस अवस्था में) जब ज्ञानदाता ईश्वर उसकी हृदय-सेज पर प्रकट होता है तो वह उससे रमण करता है॥ ४॥ १॥ ३५ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा महला १ ॥
आसा महला १ ॥
ਕੀਤਾ ਹੋਵੈ ਕਰੇ ਕਰਾਇਆ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਕਹੀਐ ਭਾਈ ॥
कीता होवै करे कराइआ तिसु किआ कहीऐ भाई ॥
हे भाई ! परमात्मा का पैदा किया हुआ जीव वही कुछ करता है जो कुछ वह उससे करवाता है। उस परमात्मा को क्या कहा जाए ?
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੋ ਕਰਿ ਰਹਿਆ ਕੀਤੇ ਕਿਆ ਚਤੁਰਾਈ ॥੧॥
जो किछु करणा सो करि रहिआ कीते किआ चतुराई ॥१॥
प्राणी की कोई चतुरता काम नहीं आती, जो कुछ परमात्मा करना चाहता है, वही कुछ कर रहा है॥ १॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਭਲਾ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ॥
तेरा हुकमु भला तुधु भावै ॥
हे परमेश्वर ! तेरा यह हुक्म मुझे भला लगता है, जो तुझे उपयुक्त लगता है।
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ਸਾਚੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई साचे नामि समावै ॥१॥ रहाउ ॥
हे नानक ! केवल उस प्राणी को ही आदर-सम्मान मिलता है जो सत्यनाम में लीन रहता है।॥ १॥ रहाउ॥
ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਪਰਵਾਣਾ ਲਿਖਿਆ ਬਾਹੁੜਿ ਹੁਕਮੁ ਨ ਹੋਈ ॥
किरतु पइआ परवाणा लिखिआ बाहुड़ि हुकमु न होई ॥
जैसी किसी जीव की किस्मत होती है, प्रभु ने वैसा ही हुक्म लिखा होता है। परमात्मा पुनः अन्य हुक्म नहीं करता अर्थात् उसके हुक्म को कोई भी टाल नहीं सकता।
ਜੈਸਾ ਲਿਖਿਆ ਤੈਸਾ ਪੜਿਆ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ॥੨॥
जैसा लिखिआ तैसा पड़िआ मेटि न सकै कोई ॥२॥
फिर जैसा जीवन-लेख लिखा होता है उसके अनुसार जीवन चलता है। कोई भी इसे मिटा नहीं सकता॥ २॥
ਜੇ ਕੋ ਦਰਗਹ ਬਹੁਤਾ ਬੋਲੈ ਨਾਉ ਪਵੈ ਬਾਜਾਰੀ ॥
जे को दरगह बहुता बोलै नाउ पवै बाजारी ॥
यदि कोई प्राणी सभा में अत्याधिक बोलता है तो वह बकवादी कहा जाता है।
ਸਤਰੰਜ ਬਾਜੀ ਪਕੈ ਨਾਹੀ ਕਚੀ ਆਵੈ ਸਾਰੀ ॥੩॥
सतरंज बाजी पकै नाही कची आवै सारी ॥३॥
(जीवन की बाजी) शतरंज की बाजी है जो जीती नहीं जा सकेगी सारे कच्चे ही रहते हैं। पक्के होने वाले घर में चली जाती हैं।॥ ३॥
ਨਾ ਕੋ ਪੜਿਆ ਪੰਡਿਤੁ ਬੀਨਾ ਨਾ ਕੋ ਮੂਰਖੁ ਮੰਦਾ ॥
ना को पड़िआ पंडितु बीना ना को मूरखु मंदा ॥
इस मार्ग में न किसी को विद्वान, पण्डित अथवा बुद्धिमान कहा जा सकता है, न कोई (अनपढ़) मूर्ख अथवा दुष्ट स्वीकृत किया जा सकता है।
ਬੰਦੀ ਅੰਦਰਿ ਸਿਫਤਿ ਕਰਾਏ ਤਾ ਕਉ ਕਹੀਐ ਬੰਦਾ ॥੪॥੨॥੩੬॥
बंदी अंदरि सिफति कराए ता कउ कहीऐ बंदा ॥४॥२॥३६॥
जब वह दास भाव से प्रभु की गुणस्तुति करता है केवल तभी वह सही मनुष्य कहा जा सकता है॥ ४॥ २॥ ३६॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
आसा महला १ ॥
आसा महला १ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨੈ ਮਹਿ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਖਿੰਥਾ ਖਿਮਾ ਹਢਾਵਉ ॥
गुर का सबदु मनै महि मुंद्रा खिंथा खिमा हढावउ ॥
गुरु का शब्द मैंने अपने मन में बसाया हुआ है, यही मुद्राएँ हैं। मैं क्षमा का स्वभाव अर्थात् गुदड़ी पहनता हूँ।
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਭਲਾ ਕਰਿ ਮਾਨਉ ਸਹਜ ਜੋਗ ਨਿਧਿ ਪਾਵਉ ॥੧॥
जो किछु करै भला करि मानउ सहज जोग निधि पावउ ॥१॥
परमात्मा जो कुछ करता है उसे मैं भला मानता हूँ। इस तरह मैं योग निधि को सहज ही प्राप्त कर लेता हूँ॥ १॥