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ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਜੀਅਨ ਕੋ ਭਾਗਹੀਨ ਨਹੀ ਭਾਵੈਗੋ ॥सतिगुरु दाता जीअ जीअन को भागहीन नही भावैगो ॥सतगुरु सब जीवों का दाता है, परन्तु दुर्भाग्यशाली लोगों को अच्छा नहीं लगता। ਫਿਰਿ ਏਹ ਵੇਲਾ ਹਾਥਿ ਨ ਆਵੈ ਪਰਤਾਪੈ ਪਛੁਤਾਵੈਗੋ ॥੭॥फिरि एह वेला हाथि न आवै परतापै पछुतावैगो ॥७॥मनुष्य जीवन का यह सुनहरी अवसर पुनः हाथ नहीं आता

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ਕ੍ਰਿਪਾ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮਿ ਲਗਾਵੈਗੋ ॥क्रिपा क्रिपा क्रिपा करि हरि जीउ करि किरपा नामि लगावैगो ॥हे श्रीहरि ! कृपा करो, कृपा करके हमारी नाम स्मरण में लगन लगाओ। ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲਾਵਹੁ ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈਗੋ ॥੧॥करि किरपा सतिगुरू मिलावहु मिलि सतिगुर नामु धिआवैगो ॥१॥अपनी कृपा करके सच्चे गुरु से

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ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭੁ ਭਗਤੀ ਲਾਵਹੁ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਏ ਜੀਉ ॥੪॥੨੮॥੩੫॥ करि किरपा प्रभु भगती लावहु सचु नानक अम्रितु पीए जीउ ॥४॥२८॥३५॥ हे प्रभु ! कृपा करके मुझे अपनी भक्ति में लगा लो जिससे हे नानक ! वह प्रभु के सत्य नाम रूपी अमृत का पान करता रहे॥ ४ ॥ २८ ॥ ३५ ॥ O’

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ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥ माझ महला ५ ॥ माझ महला ५ ॥ Raag Maajh, by the Fifth Guru: ਸਫਲ ਸੁ ਬਾਣੀ ਜਿਤੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੀ ॥ सफल सु बाणी जितु नामु वखाणी ॥ वहीं वाणी शुभ फलदायक है, जिससे हरि के नाम का जाप किया जाता है। Blessed are those words, by which the Naam is

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ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, उसका नाम सत्य है। वह आदिपुरुष देवी-देवताओं, जीवों सहित सम्पूर्ण संसार को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह

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ਆਪ ਹੀ ਧਾਰਨ ਧਾਰੇ ਕੁਦਰਤਿ ਹੈ ਦੇਖਾਰੇ ਬਰਨੁ ਚਿਹਨੁ ਨਾਹੀ ਮੁਖ ਨ ਮਸਾਰੇ ॥आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥वह स्वयं ही पूरे जगत को आसरा दे रहा है, अपनी कुदरत को दिखा रहा है, फिर भी रंग, रूप, वर्ण, चित्र, मुँह से इतर है। ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਭਗਤੁ

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ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਮਨਿ ਚਾਉ ਭਗਤਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਠਹਰਾਵੈ ॥देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥मन में यह चाव है कि अपने दर्शन प्रदान करो, तेरी भक्ति से यह मन स्थिर होता है। ਬਲਿਓ ਚਰਾਗੁ ਅੰਧੵਾਰ ਮਹਿ ਸਭ ਕਲਿ ਉਧਰੀ ਇਕ ਨਾਮ ਧਰਮ ॥बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥अंधेरे

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ਦੇਹ ਨ ਗੇਹ ਨ ਨੇਹ ਨ ਨੀਤਾ ਮਾਇਆ ਮਤ ਕਹਾ ਲਉ ਗਾਰਹੁ ॥देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥यह शरीर, घर, प्रेम इत्यादि कोई सदा रहने वाले नहीं। हे जीव ! माया में मरत होकर कब तक अभिमान कर सकते हो। ਛਤ੍ਰ ਨ ਪਤ੍ਰ ਨ ਚਉਰ ਨ ਚਾਵਰ ਬਹਤੀ

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ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮਦ ਮਤਸਰ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬਿਨਸਿ ਜਾਹਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਚਾਰੀ ॥काम क्रोध मद मतसर त्रिसना बिनसि जाहि हरि नामु उचारी ॥हरिनाम का उच्चारण करने से काम, क्रोध, अभिमान एवं तृष्णा सब नष्ट हो जाते हैं। ਇਸਨਾਨ ਦਾਨ ਤਾਪਨ ਸੁਚਿ ਕਿਰਿਆ ਚਰਣ ਕਮਲ ਹਿਰਦੈ ਪ੍ਰਭ ਧਾਰੀ ॥इसनान दान तापन सुचि किरिआ चरण कमल हिरदै प्रभ धारी

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ਸਦਾ ਅਕਲ ਲਿਵ ਰਹੈ ਕਰਨ ਸਿਉ ਇਛਾ ਚਾਰਹ ॥सदा अकल लिव रहै करन सिउ इछा चारह ॥हे गुरु ! तेरा ध्यान सदैव परमात्मा में लगा रहता है और अपनी इच्छानुसार कार्य करने में तुम स्वतंत्र हो। ਦ੍ਰੁਮ ਸਪੂਰ ਜਿਉ ਨਿਵੈ ਖਵੈ ਕਸੁ ਬਿਮਲ ਬੀਚਾਰਹ ॥द्रुम सपूर जिउ निवै खवै कसु बिमल बीचारह ॥जैसे फलों से

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