ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, उसका नाम सत्य है। वह आदिपुरुष देवी-देवताओं, जीवों सहित सम्पूर्ण संसार को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह निर्वेर (प्रेम की मूर्ति) है, वह कालातीत (अतीत, वर्तमान, भविष्य से परे) ब्रह्ममूर्ति शाश्वत-स्वरूप, अमर है, वह जन्म-मरण से मुक्त है, वह स्वजन्मा है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।
ਸਵਈਏ ਸ੍ਰੀ ਮੁਖਬਾਕੵ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਕਰਤਾਰ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਭ ਆਪੇ ॥
आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥
हे दिपुरुष ! केवल तू ही बनानेवाला है, सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है, करण कारण है, सब कुछ करने में परिपूर्ण है।
ਸਰਬ ਰਹਿਓ ਭਰਪੂਰਿ ਸਗਲ ਘਟ ਰਹਿਓ ਬਿਆਪੇ ॥
सरब रहिओ भरपूरि सगल घट रहिओ बिआपे ॥
तू सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान है, तू सब शरीरों में व्याप्त है।
ਬੵਾਪਤੁ ਦੇਖੀਐ ਜਗਤਿ ਜਾਨੈ ਕਉਨੁ ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਸਰਬ ਕੀ ਰਖੵਾ ਕਰੈ ਆਪੇ ਹਰਿ ਪਤਿ ॥
ब्यापतु देखीऐ जगति जानै कउनु तेरी गति सरब की रख्या करै आपे हरि पति ॥
पूरे जगत में फैला हुआ तू ही दृष्टिगत होता है, तेरी महिमा को कौन जानता है, तू सब की रक्षा कर रहा है, पूरे विश्व का मालिक है।
ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਬਿਗਤ ਆਪੇ ਆਪਿ ਉਤਪਤਿ ॥
अबिनासी अबिगत आपे आपि उतपति ॥
तू अनश्वर है, अव्यक्त है, तू अपने आप ही उत्पन्न हुआ है।
ਏਕੈ ਤੂਹੀ ਏਕੈ ਅਨ ਨਾਹੀ ਤੁਮ ਭਤਿ ॥
एकै तूही एकै अन नाही तुम भति ॥
सृष्टि में एकमात्र तू ही बड़ा है, तेरे जैसा बड़ा कोई नहीं।
ਹਰਿ ਅੰਤੁ ਨਾਹੀ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ਕਉਨੁ ਹੈ ਕਰੈ ਬੀਚਾਰੁ ਜਗਤ ਪਿਤਾ ਹੈ ਸ੍ਰਬ ਪ੍ਰਾਨ ਕੋ ਅਧਾਰੁ ॥
हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥
हे परमेश्वर ! तेरा रहस्य एवं आर-पार कोई नहीं पा सकता, कौन विचार कर सकता है। तू जगत पिता है, सबके प्राणों का आसरा है।
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਭਗਤੁ ਦਰਿ ਤੁਲਿ ਬ੍ਰਹਮ ਸਮਸਰਿ ਏਕ ਜੀਹ ਕਿਆ ਬਖਾਨੈ ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
गुरु नानक फुरमाते हैं कि हे प्रभु ! तेरे दर पर मान्य ब्रह्म-रूप हो चुके भक्त का एक जीभ से कैसे बखान कर सकता हूँ।
ਹਾਂ ਕਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਿ ॥੧॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥१॥
हाँ, मैं केवल उस पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥१॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਪ੍ਰਵਾਹ ਸਰਿ ਅਤੁਲ ਭੰਡਾਰ ਭਰਿ ਪਰੈ ਹੀ ਤੇ ਪਰੈ ਅਪਰ ਅਪਾਰ ਪਰਿ ॥
अम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥
तेरे यहाँ अमृत का प्रवाह चल रहा है, जितने तेरे भण्डार भरे हुए हैं, उनकी भी तुलना नहीं की जा सकती। तू परे से परे, बेअंत है।
ਆਪੁਨੋ ਭਾਵਨੁ ਕਰਿ ਮੰਤ੍ਰਿ ਨ ਦੂਸਰੋ ਧਰਿ ਓਪਤਿ ਪਰਲੌ ਏਕੈ ਨਿਮਖ ਤੁ ਘਰਿ ॥
आपुनो भावनु करि मंत्रि न दूसरो धरि ओपति परलौ एकै निमख तु घरि ॥
तू सब अपनी मर्जी से करता है, किसी से सलाह-मशविरा नहीं करता। तेरे हुक्म से एक पल में सृष्टि की उत्पति एवं प्रलय हो जाती है।
ਆਨ ਨਾਹੀ ਸਮਸਰਿ ਉਜੀਆਰੋ ਨਿਰਮਰਿ ਕੋਟਿ ਪਰਾਛਤ ਜਾਹਿ ਨਾਮ ਲੀਏ ਹਰਿ ਹਰਿ ॥
आन नाही समसरि उजीआरो निरमरि कोटि पराछत जाहि नाम लीए हरि हरि ॥
तेरे बराबर कोई नहीं, तू निर्मल है, ज्ञान का उजाला है, तेरा नाम जपने से तो करोड़ों पाप दूर हो जाते हैं।
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਭਗਤੁ ਦਰਿ ਤੁਲਿ ਬ੍ਰਹਮ ਸਮਸਰਿ ਏਕ ਜੀਹ ਕਿਆ ਬਖਾਨੈ ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
गुरु नानक कथन करते हैं कि ईश्वर का भक्त जो उसी का रूप हो गया है, एक जीभ से उसकी क्या महिमा की जाए,
ਹਾਂ ਕਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਿ ॥੨॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥२॥
हाँ, मैं केवल उस पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥२॥
ਸਗਲ ਭਵਨ ਧਾਰੇ ਏਕ ਥੇਂ ਕੀਏ ਬਿਸਥਾਰੇ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸ੍ਰਬ ਮਹਿ ਆਪਿ ਹੈ ਨਿਰਾਰੇ ॥
सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥
ईश्वर ने समूचे लोक धारण किए हुए हैं, एक उसी से जगत का प्रसार हुआ है, वह सर्वव्यापक है और स्वयं ही अलिप्त है।
ਹਰਿ ਗੁਨ ਨਾਹੀ ਅੰਤ ਪਾਰੇ ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਥਾਰੇ ਸਗਲ ਕੋ ਦਾਤਾ ਏਕੈ ਅਲਖ ਮੁਰਾਰੇ ॥
हरि गुन नाही अंत पारे जीअ जंत सभि थारे सगल को दाता एकै अलख मुरारे ॥
ईश्वर की महिमा या कोई अन्त नहीं, संसार के सब जीव उसी के हैं, केवल वही सब को देने वाला है, वह दुष्टदमन है, अदृष्ट है।