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ਗੋਬਿੰਦ ਹਮ ਐਸੇ ਅਪਰਾਧੀ ॥गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥हे गोविंद ! हम जीव ऐसे अपराधी हैं, ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਥਾ ਦੀਆ ਤਿਸ ਕੀ ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਨਹੀ ਸਾਧੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥१॥ रहाउ ॥जिस प्रभु ने प्राण, शरीर दिया था, उसकी कभी प्रेम-भक्ति नहीं

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ਪੂਰਬ ਜਨਮ ਹਮ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਰੇ ਸੇਵਕ ਅਬ ਤਉ ਮਿਟਿਆ ਨ ਜਾਈ ॥पूरब जनम हम तुम्हरे सेवक अब तउ मिटिआ न जाई ॥पूर्व जन्म से ही हम तुम्हारे सेवक हैं, इसलिए अब इस जन्म में भी तेरी सेवा किए बिना रहा नहीं जाता। ਤੇਰੇ ਦੁਆਰੈ ਧੁਨਿ ਸਹਜ ਕੀ ਮਾਥੈ ਮੇਰੇ ਦਗਾਈ ॥੨॥तेरे दुआरै धुनि सहज की माथै

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ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਮਦ ਮਤਸਰ ਕਾਟਿ ਕਾਟਿ ਕਸੁ ਦੀਨੁ ਰੇ ॥੧॥त्रिसना कामु क्रोधु मद मतसर काटि काटि कसु दीनु रे ॥१॥तृष्णा, काम, क्रोध एवं इर्षा रूपी छाल को काट-काटकर गुड़ में डाला है॥ १॥ ਕੋਈ ਹੈ ਰੇ ਸੰਤੁ ਸਹਜ ਸੁਖ ਅੰਤਰਿ ਜਾ ਕਉ ਜਪੁ ਤਪੁ ਦੇਉ ਦਲਾਲੀ ਰੇ ॥कोई है रे संतु सहज सुख अंतरि

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ਸੋ ਟਿਕਾ ਸੋ ਬੈਹਣਾ ਸੋਈ ਦੀਬਾਣੁ ॥ ਪਿਯੂ ਦਾਦੇ ਜੇਵਿਹਾ ਪੋਤਾ ਪਰਵਾਣੁ ॥सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥ पियू दादे जेविहा पोता परवाणु ॥“(गुरु अमरदास जी को भी) वही गुरुयाई का तिलक, वही सिंहासन एवं वही दरबार मिला। अपने पिता (गुरु अंगद देव) एवं दादा (गुरु नानक देव) सरीखा होने के कारण पौत्र गुरु

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ਲੰਗਰੁ ਚਲੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੀ ਖਟੀਐ ॥लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटीऐ ॥संगत के लिए गुरु के शब्द द्वारा लंगर चलता रहता है परन्तु उसमें कोई कमी नहीं आती। ਖਰਚੇ ਦਿਤਿ ਖਸੰਮ ਦੀ ਆਪ ਖਹਦੀ ਖੈਰਿ ਦਬਟੀਐ ॥खरचे दिति खसम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ॥अपने मालिक की दी

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ਧੰਨੁ ਸੁ ਤੇਰੇ ਭਗਤ ਜਿਨੑੀ ਸਚੁ ਤੂੰ ਡਿਠਾ ॥धंनु सु तेरे भगत जिन्ही सचु तूं डिठा ॥हे सच्चे मालिक ! तेरे वे भक्त धन्य हैं, जिन्होंने तेरे दर्शन किए हैं। ਜਿਸ ਨੋ ਤੇਰੀ ਦਇਆ ਸਲਾਹੇ ਸੋਇ ਤੁਧੁ ॥जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥जिस पर तेरी दया होती है, वही तेरी स्तुति करता है।

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ਆਤਮੁ ਜਿਤਾ ਗੁਰਮਤੀ ਆਗੰਜਤ ਪਾਗਾ ॥आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥उसने गुरु की मतानुसार अपनी आत्मा को जीतकर अनश्वर प्रभु को पा लिया है। ਜਿਸਹਿ ਧਿਆਇਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੋ ਕਲਿ ਮਹਿ ਤਾਗਾ ॥जिसहि धिआइआ पारब्रहमु सो कलि महि तागा ॥जिसने परमात्मा का मनन किया है, उसका कलियुग में उद्धार हो गया है। ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਨਿਰਮਲਾ ਅਠਸਠਿ

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ਪਉੜੀ ॥पउड़ी ॥पउड़ी ॥ ਸਭੇ ਦੁਖ ਸੰਤਾਪ ਜਾਂ ਤੁਧਹੁ ਭੁਲੀਐ ॥सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥हे परमात्मा ! अगर तुझे भुला दिया जाए तो सब दुख-संताप लग जाते हैं। ਜੇ ਕੀਚਨਿ ਲਖ ਉਪਾਵ ਤਾਂ ਕਹੀ ਨ ਘੁਲੀਐ ॥जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥यदि लाखों उपाय भी किए जाएँ तो भी दुखों

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ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥ सलोक मः ५ ॥ श्लोक महला ५॥ Shalok, Fifth Guru: ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਅਮਿਉ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥ अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥ यह अमृतमय वाणी अमृत रूपी रस है और हरि का नाम ही अमृत है। The Guru’s divine worlds are rejuvenating and relishing like

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ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥सलोक मः ५ ॥श्लोक महला ५॥ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਅਮਿਉ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥यह अमृतमय वाणी अमृत रूपी रस है और हरि का नाम ही अमृत है। ਮਨਿ ਤਨਿ ਹਿਰਦੈ ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर

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