ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਸਭੇ ਦੁਖ ਸੰਤਾਪ ਜਾਂ ਤੁਧਹੁ ਭੁਲੀਐ ॥
सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥
हे परमात्मा ! अगर तुझे भुला दिया जाए तो सब दुख-संताप लग जाते हैं।
ਜੇ ਕੀਚਨਿ ਲਖ ਉਪਾਵ ਤਾਂ ਕਹੀ ਨ ਘੁਲੀਐ ॥
जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥
यदि लाखों उपाय भी किए जाएँ तो भी दुखों से छुटकारा नहीं होता।
ਜਿਸ ਨੋ ਵਿਸਰੈ ਨਾਉ ਸੁ ਨਿਰਧਨੁ ਕਾਂਢੀਐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सु निरधनु कांढीऐ ॥
जिसे प्रभु-नाम विरमृत हो जाता है, उसे ही निर्धन कहा जाता है।
ਜਿਸ ਨੋ ਵਿਸਰੈ ਨਾਉ ਸੁ ਜੋਨੀ ਹਾਂਢੀਐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सु जोनी हांढीऐ ॥
नाम को विस्मृत करने वाला जीव योनियों में ही भटकता रहता है।
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੈ ਚਿਤਿ ਤਿਸੁ ਜਮੁ ਡੰਡੁ ਦੇ ॥
जिसु खसमु न आवै चिति तिसु जमु डंडु दे ॥
जिसे प्रभु याद नहीं आता, उसे यम कठोर दण्ड देता है।
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੀ ਚਿਤਿ ਰੋਗੀ ਸੇ ਗਣੇ ॥
जिसु खसमु न आवी चिति रोगी से गणे ॥
जिसे भगवान स्मरण नहीं होता, वही रोगी माना जाता है।
ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਨ ਆਵੀ ਚਿਤਿ ਸੁ ਖਰੋ ਅਹੰਕਾਰੀਆ ॥
जिसु खसमु न आवी चिति सु खरो अहंकारीआ ॥
जिसे मालिक याद नहीं आता, वही बड़ा अहंकारी है।
ਸੋਈ ਦੁਹੇਲਾ ਜਗਿ ਜਿਨਿ ਨਾਉ ਵਿਸਾਰੀਆ ॥੧੪॥
सोई दुहेला जगि जिनि नाउ विसारीआ ॥१४॥
संसार में वही दुखी है, जिसने नाम को विस्मृत कर दिया है ॥१४॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਤੈਡੀ ਬੰਦਸਿ ਮੈ ਕੋਇ ਨ ਡਿਠਾ ਤੂ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਾਣਾ ॥
तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥
हे परमेश्वर ! तेरे जैसा मैंने कोई नहीं देखा और तू ही नानक के मन को भाया है।
ਘੋਲਿ ਘੁਮਾਈ ਤਿਸੁ ਮਿਤ੍ਰ ਵਿਚੋਲੇ ਜੈ ਮਿਲਿ ਕੰਤੁ ਪਛਾਣਾ ॥੧॥
घोलि घुमाई तिसु मित्र विचोले जै मिलि कंतु पछाणा ॥१॥
उस मध्यस्थ मित्र गुरु पर कोटि-कोटि न्यौछावर हैं, जिसे मिलकर पति-प्रभु को पहचान लिया है। १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਪਾਵ ਸੁਹਾਵੇ ਜਾਂ ਤਉ ਧਿਰਿ ਜੁਲਦੇ ਸੀਸੁ ਸੁਹਾਵਾ ਚਰਣੀ ॥
पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥
वही पाँव सुन्दर हैं, जो तेरी ओर चलते हैं, वहीं शीश सुहावना है, जो तेरे चरणों में झुकता है।
ਮੁਖੁ ਸੁਹਾਵਾ ਜਾਂ ਤਉ ਜਸੁ ਗਾਵੈ ਜੀਉ ਪਇਆ ਤਉ ਸਰਣੀ ॥੨॥
मुखु सुहावा जां तउ जसु गावै जीउ पइआ तउ सरणी ॥२॥
यह मुख तभी उत्तम है, यदि तेरा यशगान करता है और तेरी शरण में पड़ा अन्तर्मन ही भाग्यवान् है ॥२॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਮਿਲਿ ਨਾਰੀ ਸਤਸੰਗਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵੀਆ ॥
मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥
जीव रूपी नारियों ने सत्संग में मिलकर प्रभु का मंगलगान किया है,
ਘਰ ਕਾ ਹੋਆ ਬੰਧਾਨੁ ਬਹੁੜਿ ਨ ਧਾਵੀਆ ॥
घर का होआ बंधानु बहुड़ि न धावीआ ॥
जिससे हृदय-घर स्थिर हो गया है और इन्द्रियाँ विकारों की ओर नहीं दौड़ती।
ਬਿਨਠੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦੁਰਤੁ ਸੋਇ ਕੂੜਾਵੀਆ ॥
बिनठी दुरमति दुरतु सोइ कूड़ावीआ ॥
दुर्मति एवं पाप विनष्ट हो गए हैं और झूठ पास भी नहीं आता।
ਸੀਲਵੰਤਿ ਪਰਧਾਨਿ ਰਿਦੈ ਸਚਾਵੀਆ ॥
सीलवंति परधानि रिदै सचावीआ ॥
ह्रदय में सत्य स्थित होने से जीव रूपी नारी शीलवान एवं प्रधान बन गई है।
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਇਕੁ ਇਕ ਰੀਤਾਵੀਆ ॥
अंतरि बाहरि इकु इक रीतावीआ ॥
अन्तर-बाहर एक ही जीवन-युक्ति बना ली है कि
ਮਨਿ ਦਰਸਨ ਕੀ ਪਿਆਸ ਚਰਣ ਦਾਸਾਵੀਆ ॥
मनि दरसन की पिआस चरण दासावीआ ॥
मन में प्रभु-दर्शनों की ही आकांक्षा है, इसलिए उसके चरणों की दासी बन गई है।
ਸੋਭਾ ਬਣੀ ਸੀਗਾਰੁ ਖਸਮਿ ਜਾਂ ਰਾਵੀਆ ॥
सोभा बणी सीगारु खसमि जां रावीआ ॥
पति-प्रभु के रमण से वह शोभावान बन गई और उसका प्रेम-श्रृंगार बन गया है।
ਮਿਲੀਆ ਆਇ ਸੰਜੋਗਿ ਜਾਂ ਤਿਸੁ ਭਾਵੀਆ ॥੧੫॥
मिलीआ आइ संजोगि जां तिसु भावीआ ॥१५॥
जब प्रभु को भाया तो संयोग बनाकर स्वयं ही मिल गया॥१५॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਹਭਿ ਗੁਣ ਤੈਡੇ ਨਾਨਕ ਜੀਉ ਮੈ ਕੂ ਥੀਏ ਮੈ ਨਿਰਗੁਣ ਤੇ ਕਿਆ ਹੋਵੈ ॥
हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥
नानक कहते हैं कि हे ईश्वर ! सभी गुण तेरे ही मुझे मिले हैं, मुझ से क्या हो सकता है ?”
ਤਉ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾਰੁ ਨ ਕੋਈ ਜਾਚਕੁ ਸਦਾ ਜਾਚੋਵੈ ॥੧॥
तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥१॥
तेरे जैसा दाता अन्य कोई नहीं है, मुझ जैसा याचक सदा तुझ से ही मांगता रहता है॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਦੇਹ ਛਿਜੰਦੜੀ ਊਣ ਮਝੂਣਾ ਗੁਰਿ ਸਜਣਿ ਜੀਉ ਧਰਾਇਆ ॥
देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥
शरीर को क्षीण होता देखकर मैं बहुत निराश हो गया था परन्तु सज्जन गुरु ने मेरे दिल को हौसला दिया है।
ਹਭੇ ਸੁਖ ਸੁਹੇਲੜਾ ਸੁਤਾ ਜਿਤਾ ਜਗੁ ਸਬਾਇਆ ॥੨॥
हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥२॥
मैंने समूचा जगत् जीत लिया है और मुझे जीवन के सभी सुख उपलब्ध हो गए हैं॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਵਡਾ ਤੇਰਾ ਦਰਬਾਰੁ ਸਚਾ ਤੁਧੁ ਤਖਤੁ ॥
वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥
हे परमेश्वर ! तेरा दरबार बहुत बड़ा है और तेरा सिंहासन अटल है।
ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਨਿਹਚਲੁ ਚਉਰੁ ਛਤੁ ॥
सिरि साहा पातिसाहु निहचलु चउरु छतु ॥
तू ही समूचे विश्व का सबसे बड़ा बादशाह है, तेरा चंवर एवं छत्र निश्चल है।
ਜੋ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸੋਈ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ॥
जो भावै पारब्रहम सोई सचु निआउ ॥
जो परब्रह्म को मंजूर होता है, वही सच्चा न्याय है।
ਜੇ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਥਾਵੇ ਮਿਲੈ ਥਾਉ ॥
जे भावै पारब्रहम निथावे मिलै थाउ ॥
यदि परमात्मा को स्वीकार हो तो बेसहारा को भी सहारा मिल जाता है।
ਜੋ ਕੀਨੑੀ ਕਰਤਾਰਿ ਸਾਈ ਭਲੀ ਗਲ ॥
जो कीन्ही करतारि साई भली गल ॥
जो परमेश्वर ने किया है, वही भली बात है।
ਜਿਨੑੀ ਪਛਾਤਾ ਖਸਮੁ ਸੇ ਦਰਗਾਹ ਮਲ ॥
जिन्ही पछाता खसमु से दरगाह मल ॥
जिसने मालिक को पहचान लिया है उसे दरगाह में स्थान मिल गया है।
ਸਹੀ ਤੇਰਾ ਫੁਰਮਾਨੁ ਕਿਨੈ ਨ ਫੇਰੀਐ ॥
सही तेरा फुरमानु किनै न फेरीऐ ॥
तेरा हुक्म हमेशा सही है, जिसे सहर्ष मानना चाहिए।
ਕਾਰਣ ਕਰਣ ਕਰੀਮ ਕੁਦਰਤਿ ਤੇਰੀਐ ॥੧੬॥
कारण करण करीम कुदरति तेरीऐ ॥१६॥
हे कृपानिधि ! तू सबका स्रष्टा है और यह तेरी ही रची हुई कुदरत है। १६॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਸੋਇ ਸੁਣੰਦੜੀ ਮੇਰਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਮਉਲਾ ਨਾਮੁ ਜਪੰਦੜੀ ਲਾਲੀ ॥
सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥
हे प्रभो ! तेरी कीर्ति सुनकर मेरा तन-मन खिल गया है और तेरा नाम जपने से मेरे चेहरे पर लाली आ गई है।
ਪੰਧਿ ਜੁਲੰਦੜੀ ਮੇਰਾ ਅੰਦਰੁ ਠੰਢਾ ਗੁਰ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਨਿਹਾਲੀ ॥੧॥
पंधि जुलंदड़ी मेरा अंदरु ठंढा गुर दरसनु देखि निहाली ॥१॥
तेरे पथ पर चलने से मेरा मन शीतल-शांत हो गया है और गुरु के दर्शन करके आनंदित हो गई हूँ॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਹਠ ਮੰਝਾਹੂ ਮੈ ਮਾਣਕੁ ਲਧਾ ॥
हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥
अपने अंतर्मन में से मैंने नाम रूपी माणिक्य ढूंढ लिया है।
ਮੁਲਿ ਨ ਘਿਧਾ ਮੈ ਕੂ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਿਤਾ ॥
मुलि न घिधा मै कू सतिगुरि दिता ॥
दरअसल यह मैंने मूल्य नहीं लिया, यह तो मुझे सतगुरु ने दिया है।
ਢੂੰਢ ਵਞਾਈ ਥੀਆ ਥਿਤਾ ॥
ढूंढ वञाई थीआ थिता ॥
अब मेरी तलाश समाप्त हो गई है और मैं स्थिर हो गया हूँ।
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕ ਜਿਤਾ ॥੨॥
जनमु पदारथु नानक जिता ॥२॥
हे नानक ! मैंने अपना जन्म रूपी पदार्थ जीत लिया है अर्थात् अपना जन्म सफल कर लिया है॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਿਸ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਕਰਮੁ ਹੋਇ ਸੋ ਸੇਵਾ ਲਾਗਾ ॥
जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥
जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य लिखा हुआ है, वही भगवान की सेवा में लगा है।
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਕਮਲੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਆ ਸੋ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਾ ॥
जिसु गुर मिलि कमलु प्रगासिआ सो अनदिनु जागा ॥
गुरु से भेंट करके जिसका हृदय-कमल खिल गया है, वह रात-दिन मोह-माया से जाग्रत रहता है।
ਲਗਾ ਰੰਗੁ ਚਰਣਾਰਬਿੰਦ ਸਭੁ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥
लगा रंगु चरणारबिंद सभु भ्रमु भउ भागा ॥
जिसकी ईश्वर के चरण-कमल से लगन लग गई है, उसके सभी भ्रम एवं भय दूर हो गए हैं।