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ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਅਮਿਉ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ॥
अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥
यह अमृतमय वाणी अमृत रूपी रस है और हरि का नाम ही अमृत है।

ਮਨਿ ਤਨਿ ਹਿਰਦੈ ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥
अपने मन, तन एवं हृदय में हरि को याद करो और आठ प्रहर उसका ही स्तुतिगान करो।

ਉਪਦੇਸੁ ਸੁਣਹੁ ਤੁਮ ਗੁਰਸਿਖਹੁ ਸਚਾ ਇਹੈ ਸੁਆਉ ॥
उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥
हे गुरु के शिष्यो, तुम उपदेश सुनो, जीवन का यही सच्चा मनोरथ है।

ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸਫਲੁ ਹੋਇ ਮਨ ਮਹਿ ਲਾਇਹੁ ਭਾਉ ॥
जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥
मन में श्रद्धा धारण करने से तुम्हारा जन्म सफल हो जाएगा।

ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨਦੁ ਘਣਾ ਪ੍ਰਭ ਜਪਤਿਆ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥
सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥
प्रभु का जाप करने से दुख दूर हो जाता है और मन में सहज सुख एवं बड़ा आनंद प्राप्त होता है।

ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਦਰਗਹ ਪਾਈਐ ਥਾਉ ॥੧॥
नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥१॥
हे नानक ! परमात्मा का नाम जपने से मन में सुख पैदा हो जाता है और सत्य के दरबार में स्थान मिल जाता है॥ १॥

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮਤਿ ਦੇਇ ॥
नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥
हे नानक ! पूर्ण गुरु यही मत देता है कि हरि-नाम का ध्यान करो।

ਭਾਣੈ ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮੋ ਭਾਣੈ ਹੀ ਕਢਿ ਲੇਇ ॥
भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥
ईश्वरेच्छा में ही जीव जप, तप एवं संयम करता है और अपनी इच्छा से ही वह जीव को बन्धन-मुक्त कर देता है।

ਭਾਣੈ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ਭਾਣੈ ਬਖਸ ਕਰੇਇ ॥
भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥
ईश्वरेच्छा से ही जीव योनियों में भटकता है और अपनी इच्छा से ही वह कृपा कर देता है।

ਭਾਣੈ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਭੋਗੀਐ ਭਾਣੈ ਕਰਮ ਕਰੇਇ ॥
भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥
भगवान की रजा से ही दुख-सुख भोगना पड़ता है और उसकी इच्छा से ही हम शुभाशुभ कर्म करते हैं।

ਭਾਣੈ ਮਿਟੀ ਸਾਜਿ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋਤਿ ਧਰੇਇ ॥
भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥
वह अपनी इच्छा से ही शरीर का निर्माण करके उसमें प्राण डाल देता है।

ਭਾਣੈ ਭੋਗ ਭੋਗਾਇਦਾ ਭਾਣੈ ਮਨਹਿ ਕਰੇਇ ॥
भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥
वह अपनी इच्छानुसार ही जीव को भोग विलास करवाता है और अपनी मर्जी से ही उन्हें रोकता भी है।

ਭਾਣੈ ਨਰਕਿ ਸੁਰਗਿ ਅਉਤਾਰੇ ਭਾਣੈ ਧਰਣਿ ਪਰੇਇ ॥
भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥
प्रभु की रज़ा से ही जीव नरक-स्वर्ग में जन्म लेता है और ईश्वरेच्छा से ही धरती में उसका जन्म होता है।

ਭਾਣੈ ਹੀ ਜਿਸੁ ਭਗਤੀ ਲਾਏ ਨਾਨਕ ਵਿਰਲੇ ਹੇ ॥੨॥
भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥२॥
हे नानक ! ऐसे जीव विरले ही हैं, जिसे प्रभु अपनी इच्छा से भक्ति में लगा देता है। २॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਵਡਿਆਈ ਸਚੇ ਨਾਮ ਕੀ ਹਉ ਜੀਵਾ ਸੁਣਿ ਸੁਣੇ ॥
वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥
मैं तो सच्चे-नाम की कीर्ति सुन-सुनकर ही जीवन पा रहा हूँ।

ਪਸੂ ਪਰੇਤ ਅਗਿਆਨ ਉਧਾਰੇ ਇਕ ਖਣੇ ॥
पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥
प्रभु का नाम एक क्षण में ही पशु-प्रेत एवं अज्ञानी जीवों का उद्धार कर देता है।

ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ਸਦਾ ਸਦ ਜਾਪੀਐ ॥
दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥
हे परमेश्वर ! दिन-रात सदैव तेरा नाम जपता रहता हूँ,

ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਵਿਕਰਾਲ ਨਾਇ ਤੇਰੈ ਧ੍ਰਾਪੀਐ ॥
त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥
तेरे नाम से तृष्णा की विकराल भूख भी मिट जाती है।

ਰੋਗੁ ਸੋਗੁ ਦੁਖੁ ਵੰਞੈ ਜਿਸੁ ਨਾਉ ਮਨਿ ਵਸੈ ॥
रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥
जिसके मन में नाम बस जाता है, उसके रोग, शोक एवं दुख दूर हो जाते हैं।

ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਲਾਲੁ ਜੋ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਰਸੈ ॥
तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥
जो गुरु-शब्द में आनंद प्राप्त करता है, उसे प्यारा प्रभु प्राप्त होता है।

ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਬੇਅੰਤ ਉਧਾਰਣਹਾਰਿਆ ॥
खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥
हे उद्धारक ! तेरे खण्ड-ब्रह्माण्ड बेअंत हैं।

ਤੇਰੀ ਸੋਭਾ ਤੁਧੁ ਸਚੇ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ॥੧੨॥
तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥१२॥
हे मेरे प्यारे सच्चे प्रभु ! तेरी शोभा तुझे ही भाती है। १२॥

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਮਿਤ੍ਰੁ ਪਿਆਰਾ ਨਾਨਕ ਜੀ ਮੈ ਛਡਿ ਗਵਾਇਆ ਰੰਗਿ ਕਸੁੰਭੈ ਭੁਲੀ ॥
मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसु्मभै भुली ॥
हे नानक ! कुसुंभ फूल जैसी माया के मोह में फंसकर मैंने अपने प्यारे मित्र प्रभु को गंवा दिया है।

ਤਉ ਸਜਣ ਕੀ ਮੈ ਕੀਮ ਨ ਪਉਦੀ ਹਉ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਅਢੁ ਨ ਲਹਦੀ ॥੧॥
तउ सजण की मै कीम न पउदी हउ तुधु बिनु अढु न लहदी ॥१॥
मुझसे तुझ सज्जन की कीमत नहीं पड़ती और तेरे बिना मैं अपनी आधी दमड़ी का मूल्य भी नहीं पा सकती॥ १॥

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਸਸੁ ਵਿਰਾਇਣਿ ਨਾਨਕ ਜੀਉ ਸਸੁਰਾ ਵਾਦੀ ਜੇਠੋ ਪਉ ਪਉ ਲੂਹੈ ॥
ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥
हे नानक ! माया रूपी सास मेरी वैरी है, शरीर रूपी मेरा ससुर बहुत ही झगड़ालू और यम रूपी जेठ मुझे दुखी करता रहता है।

ਹਭੇ ਭਸੁ ਪੁਣੇਦੇ ਵਤਨੁ ਜਾ ਮੈ ਸਜਣੁ ਤੂਹੈ ॥੨॥
हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥२॥
हे प्रभु! अगर तू मेरा सज्जन है, तो ये सभी धूल फांकते रहें अर्थात् मुझे उनकी कोई चिंता नहीं।॥२॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਜਿਸੁ ਤੂ ਵੁਠਾ ਚਿਤਿ ਤਿਸੁ ਦਰਦੁ ਨਿਵਾਰਣੋ ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥
हे परमेश्वर ! जिसके चित में तू बस गया है, उसके दुख-दर्द का निवारण हो गया है।

ਜਿਸੁ ਤੂ ਵੁਠਾ ਚਿਤਿ ਤਿਸੁ ਕਦੇ ਨ ਹਾਰਣੋ ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु कदे न हारणो ॥
जिसके अन्तर्मन में तू बस जाता है, वह कभी भी पराजित नहीं होता।

ਜਿਸੁ ਮਿਲਿਆ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਸੁ ਸਰਪਰ ਤਾਰਣੋ ॥
जिसु मिलिआ पूरा गुरू सु सरपर तारणो ॥
जिसे पूर्ण गुरु मिल गया है वह भवसागर से तर गया है।

ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਏ ਸਚਿ ਤਿਸੁ ਸਚੁ ਸਮ੍ਹ੍ਹਾਲਣੋ ॥
जिस नो लाए सचि तिसु सचु सम्हालणो ॥
जिस सत्य से लगन लगा देता है वह सत्य का ही चिंतन करता रहता है।

ਜਿਸੁ ਆਇਆ ਹਥਿ ਨਿਧਾਨੁ ਸੁ ਰਹਿਆ ਭਾਲਣੋ ॥
जिसु आइआ हथि निधानु सु रहिआ भालणो ॥
जिस व्यक्ति को नाम निधि की प्राप्ति हो जाती है वह इधर उधर भटकने से हट गया है।

ਜਿਸ ਨੋ ਇਕੋ ਰੰਗੁ ਭਗਤੁ ਸੋ ਜਾਨਣੋ ॥
जिस नो इको रंगु भगतु सो जानणो ॥
जिसे भगवान की लगन लगी रहती है वास्तव में उसे ही सच्चा भक्त जानो

ਓਹੁ ਸਭਨਾ ਕੀ ਰੇਣੁ ਬਿਰਹੀ ਚਾਰਣੋ ॥
ओहु सभना की रेणु बिरही चारणो ॥
वह सब की चरण धूलि बना रहता है जो प्रभु चरणों का प्रेमी होता है

ਸਭਿ ਤੇਰੇ ਚੋਜ ਵਿਡਾਣ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ਕਾਰਣੋ ॥੧੩॥
सभि तेरे चोज विडाण सभु तेरा कारणो ॥१३॥
हे भगवान ! तेरे सभी कौतुक बड़े अद्भुत हैं एवं यह समूचा विश्व तेरी ही उत्पत्ति है।

ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥

ਉਸਤਤਿ ਨਿੰਦਾ ਨਾਨਕ ਜੀ ਮੈ ਹਭ ਵਞਾਈ ਛੋੜਿਆ ਹਭੁ ਕਿਝੁ ਤਿਆਗੀ ॥
उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥
हे नानक ! प्रशंसा और निंदा करना यह सब मैंने छोड़ दिया है और सबकुछ छोड़कर त्यागी बन गई हैं।

ਹਭੇ ਸਾਕ ਕੂੜਾਵੇ ਡਿਠੇ ਤਉ ਪਲੈ ਤੈਡੈ ਲਾਗੀ ॥੧॥
हभे साक कूड़ावे डिठे तउ पलै तैडै लागी ॥१॥
सभी रिश्ते-नाते मुझे झूठे ही नजर आए हैं, इसलिए मैं तेरी शरण में आ गई हूँ॥ १।।

ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥

ਫਿਰਦੀ ਫਿਰਦੀ ਨਾਨਕ ਜੀਉ ਹਉ ਫਾਵੀ ਥੀਈ ਬਹੁਤੁ ਦਿਸਾਵਰ ਪੰਧਾ ॥
फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥
हे नानक ! बहुत सारे परदेसों के रास्तों पर भटकती-भटकती मैं बावली हो गई। थी।

ਤਾ ਹਉ ਸੁਖਿ ਸੁਖਾਲੀ ਸੁਤੀ ਜਾ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਸਜਣੁ ਮੈ ਲਧਾ ॥੨॥
ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥२॥
जब गुरु को मिलकर मैंने सज्जन-प्रभु को पा लिया तो मैं सुखी हो गई॥ २॥

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