ਗੋਬਿੰਦ ਹਮ ਐਸੇ ਅਪਰਾਧੀ ॥
गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥
हे गोविंद ! हम जीव ऐसे अपराधी हैं,
ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਥਾ ਦੀਆ ਤਿਸ ਕੀ ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਨਹੀ ਸਾਧੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥१॥ रहाउ ॥
जिस प्रभु ने प्राण, शरीर दिया था, उसकी कभी प्रेम-भक्ति नहीं की।॥ १॥ रहाउ॥
ਪਰ ਧਨ ਪਰ ਤਨ ਪਰ ਤੀ ਨਿੰਦਾ ਪਰ ਅਪਬਾਦੁ ਨ ਛੂਟੈ ॥
पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै ॥
पराए धन की लालसा, पराई नारी की कामना, पराई निंदा एवं पराए झंझटों से हम छूट नहीं सके,
ਆਵਾ ਗਵਨੁ ਹੋਤੁ ਹੈ ਫੁਨਿ ਫੁਨਿ ਇਹੁ ਪਰਸੰਗੁ ਨ ਤੂਟੈ ॥੨॥
आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै ॥२॥
इसलिए पुनः पुनः हमारा जन्म मरण होता रहता है और यह कहानी कभी समाप्त ही नहीं होती।॥ २॥
ਜਿਹ ਘਰਿ ਕਥਾ ਹੋਤ ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਇਕ ਨਿਮਖ ਨ ਕੀਨੑੋ ਮੈ ਫੇਰਾ ॥
जिह घरि कथा होत हरि संतन इक निमख न कीन्हो मै फेरा ॥
जिस घर में हरि-कथा होती है, वहाँ एक क्षण भर भी फेरा नहीं किया।
ਲੰਪਟ ਚੋਰ ਦੂਤ ਮਤਵਾਰੇ ਤਿਨ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਬਸੇਰਾ ॥੩॥
ल्मपट चोर दूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा ॥३॥
हमारा तो लंपट, चोर, दुष्ट एवं शराबियों के संग ही सदा बसेरा रहा॥ ३॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਮਾਇਆ ਮਦ ਮਤਸਰ ਏ ਸੰਪੈ ਮੋ ਮਾਹੀ ॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर ए स्मपै मो माही ॥
काम, क्रोध, माया, अभिमान एवं ईर्षा इत्यादि यह सपति ही हमारे पास है।
ਦਇਆ ਧਰਮੁ ਅਰੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਏ ਸੁਪਨੰਤਰਿ ਨਾਹੀ ॥੪॥
दइआ धरमु अरु गुर की सेवा ए सुपनंतरि नाही ॥४॥
दया, धर्म और गुरु की सेवा इत्यादि शुभ-कर्म करने का ख्याल कभी सपने में भी नहीं आया॥ ४॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਮੋਦਰ ਭਗਤਿ ਬਛਲ ਭੈ ਹਾਰੀ ॥
दीन दइआल क्रिपाल दमोदर भगति बछल भै हारी ॥
हे परमेश्वर ! तू दीनदयाल, कृपा का भण्डार, भक्तवत्सल एवं भयनाशक है।
ਕਹਤ ਕਬੀਰ ਭੀਰ ਜਨ ਰਾਖਹੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਕਰਉ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੀ ॥੫॥੮॥
कहत कबीर भीर जन राखहु हरि सेवा करउ तुम्हारी ॥५॥८॥
कबीर विनती करते हैं कि हे हरि ! अपने सेवक की विपत्ति से रक्षा करो, मैं हरदम तेरी सेवा करता रहूँगा॥ ५॥ ८॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਹੋਇ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ ॥
जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥
सिमरन से मुक्ति का द्वार मिल जाता है,
ਜਾਹਿ ਬੈਕੁੰਠਿ ਨਹੀ ਸੰਸਾਰਿ ॥
जाहि बैकुंठि नही संसारि ॥
वैकुण्ठ में वास हो जाता है और
ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਬਜਾਵਹਿ ਤੂਰ ॥
निरभउ कै घरि बजावहि तूर ॥
संसार में निर्भय परमेश्वर के घर मंगल-वादन बजाया जाता है और
ਅਨਹਦ ਬਜਹਿ ਸਦਾ ਭਰਪੂਰ ॥੧॥
अनहद बजहि सदा भरपूर ॥१॥
सदा ही मन आनंद से भरपूर हो जाता है। १॥
ਐਸਾ ਸਿਮਰਨੁ ਕਰਿ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ऐसा सिमरनु करि मन माहि ॥
ऐसा सिमरन मन में करो
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਮੁਕਤਿ ਕਤ ਨਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिनु सिमरन मुकति कत नाहि ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरन के बिना जीव की कभी मुक्ति नहीं होती॥ १॥ रहाउ॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਨਾਹੀ ਨਨਕਾਰੁ ॥
जिह सिमरनि नाही ननकारु ॥
जीस ईश्वर के सिमरन से कोई बाधा नहीं आती,
ਮੁਕਤਿ ਕਰੈ ਉਤਰੈ ਬਹੁ ਭਾਰੁ ॥
मुकति करै उतरै बहु भारु ॥
वह बंधन से मुक्त कर देता है और किए पापों का भार उतर जाता है
ਨਮਸਕਾਰੁ ਕਰਿ ਹਿਰਦੈ ਮਾਹਿ ॥
नमसकारु करि हिरदै माहि ॥
अपने हृदय में भगवान को नमन करो,
ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਤੇਰਾ ਆਵਨੁ ਨਾਹਿ ॥੨॥
फिरि फिरि तेरा आवनु नाहि ॥२॥
इससे तेरा जन्म-मरण मिट जाएगा॥ २॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਕਰਹਿ ਤੂ ਕੇਲ ॥
जिह सिमरनि करहि तू केल ॥
जिसके सिमरन से से तू मनोविनोद करता है,”
ਦੀਪਕੁ ਬਾਂਧਿ ਧਰਿਓ ਬਿਨੁ ਤੇਲ ॥
दीपकु बांधि धरिओ बिनु तेल ॥
जिसने बिना तेल के प्रज्वलित कर अपनी ज्योति को तेरे हृदय में बसा रखा है,
ਸੋ ਦੀਪਕੁ ਅਮਰਕੁ ਸੰਸਾਰਿ ॥
सो दीपकु अमरकु संसारि ॥
वह दीपक तुझे दुनिया में अमर कर देगा और
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਬਿਖੁ ਕਾਢੀਲੇ ਮਾਰਿ ॥੩॥
काम क्रोध बिखु काढीले मारि ॥३॥
यह काम, क्रोध अहम् रूपी विष को मार कर निकाल देगा।॥ ३॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
जिह सिमरनि तेरी गति होइ ॥
जिस परमात्मा के स्मरण से तेरी गति होनी हैं,
ਸੋ ਸਿਮਰਨੁ ਰਖੁ ਕੰਠਿ ਪਰੋਇ ॥
सो सिमरनु रखु कंठि परोइ ॥
उस स्मरण को अपने कण्ठ में बसाकर रखो।
ਸੋ ਸਿਮਰਨੁ ਕਰਿ ਨਹੀ ਰਾਖੁ ਉਤਾਰਿ ॥
सो सिमरनु करि नही राखु उतारि ॥
वह स्मरण हमेशा ही करो, इसे कभी मत छोड़ो।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਿ ॥੪॥
गुर परसादी उतरहि पारि ॥४॥
गुरु के आशीर्वाद से तुम्हारा उद्धार हो जाएगा॥ ४॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਨਾਹੀ ਤੁਹਿ ਕਾਨਿ ॥
जिह सिमरनि नाही तुहि कानि ॥
जिस सिमरन द्वारा तू किसी पर निर्भर नहीं ,
ਮੰਦਰਿ ਸੋਵਹਿ ਪਟੰਬਰ ਤਾਨਿ ॥
मंदरि सोवहि पट्मबर तानि ॥
अपने सुन्दर घर में रेशमी चादर तान कर विश्राम करता है,
ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ਬਿਗਸੈ ਜੀਉ ॥
सेज सुखाली बिगसै जीउ ॥
तुझे निद्रा के लिए सुखद सेज तेरा दिल खुश रहता है,
ਸੋ ਸਿਮਰਨੁ ਤੂ ਅਨਦਿਨੁ ਪੀਉ ॥੫॥
सो सिमरनु तू अनदिनु पीउ ॥५॥
वह सिमरन तू रात-दिन किया कर॥ ५॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਤੇਰੀ ਜਾਇ ਬਲਾਇ ॥
जिह सिमरनि तेरी जाइ बलाइ ॥
जिस ईश्वर होने से तेरी सब मुसीबतें दूर हो जाती हैं,
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਤੁਝੁ ਪੋਹੈ ਨ ਮਾਇ ॥
जिह सिमरनि तुझु पोहै न माइ ॥
जिस सिमरन द्वारा तुझे माया भी प्रभावित नहीं करती,
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਗਾਈਐ ॥
सिमरि सिमरि हरि हरि मनि गाईऐ ॥
परमेश्वर का सिमरन करके मन में उसका गुणगान करना चाहिए,
ਇਹੁ ਸਿਮਰਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ॥੬॥
इहु सिमरनु सतिगुर ते पाईऐ ॥६॥
परन्तु यह सिमरन सतगुरु से ही प्राप्त होता है।॥ ६॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਿਮਰਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
सदा सदा सिमरि दिनु राति ॥
दिन-रात सदैव भगवान का स्मरण करो।
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥
ऊठत बैठत सासि गिरासि ॥
उठते-बैठते, श्वास लेते, भोजन करते समय,
ਜਾਗੁ ਸੋਇ ਸਿਮਰਨ ਰਸ ਭੋਗ ॥
जागु सोइ सिमरन रस भोग ॥
जागते-सोते वक्त नाम-स्मरण का आनंद भोगते रहो।
ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਪਾਈਐ ਸੰਜੋਗ ॥੭॥
हरि सिमरनु पाईऐ संजोग ॥७॥
भगवान का सिमरन संयोग से ही मिलता है।॥ ७॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਨਿ ਨਾਹੀ ਤੁਝੁ ਭਾਰ ॥
जिह सिमरनि नाही तुझु भार ॥
जिस सिमरन द्वारा तुझे पापों का भार नहीं उठाना पड़ता,
ਸੋ ਸਿਮਰਨੁ ਰਾਮ ਨਾਮ ਅਧਾਰੁ ॥
सो सिमरनु राम नाम अधारु ॥
उस राम-नाम का सिमरन ही तेरा जीवनाधार है।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਜਾ ਕਾ ਨਹੀ ਅੰਤੁ ॥
कहि कबीर जा का नही अंतु ॥
कबीर जी कहते हैं कि जिस परमात्मा का कोई अन्त नहीं है,
ਤਿਸ ਕੇ ਆਗੇ ਤੰਤੁ ਨ ਮੰਤੁ ॥੮॥੯॥
तिस के आगे तंतु न मंतु ॥८॥९॥
उसके आगे नाम के अलावा किसी प्रकार का कोई तंत्र-मंत्र नहीं चल सकता॥ ८॥ ६॥
ਰਾਮਕਲੀ ਘਰੁ ੨ ਬਾਣੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ਕੀ
रामकली घरु २ बाणी कबीर जी की
रामकली घरु २ बाणी कबीर जी की
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ਬੰਧਚਿ ਬੰਧਨੁ ਪਾਇਆ ॥
बंधचि बंधनु पाइआ ॥
बन्धनों में फँसाने वाली माया ने बन्धन डाल दिया परन्तु
ਮੁਕਤੈ ਗੁਰਿ ਅਨਲੁ ਬੁਝਾਇਆ ॥
मुकतै गुरि अनलु बुझाइआ ॥
मुक्तिदाता गुरु ने तृष्णा की अग्नि बुझा दी है।