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ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਦੁਖਦਾਈ ਮੋਹ ਮਾਇ ॥बिनु नावै सभु दुखु है दुखदाई मोह माइ ॥हरिनाम के बिना सब दुख ही हैं और माया-मोह अति दुखदायक है। ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਵਿਛੁੜਿ ਸਭ ਜਾਇ ॥੧੭॥नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥१७॥हे नानक ! जब गुरु की कृपा-दृष्टि होती है

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ਹਉ ਜੀਉ ਕਰੀ ਤਿਸ ਵਿਟਉ ਚਉ ਖੰਨੀਐ ਜੋ ਮੈ ਪਿਰੀ ਦਿਖਾਵਏ ॥हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥मैं अपने प्राण भी उस पर न्यौछावर करने को तैयार हैं, जो मुझे प्रभु के दर्शन करा दे। ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਤਾਂ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਮੇਲਾਵਏ ॥੫॥नानक हरि होइ दइआलु तां गुरु पूरा

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ਨਦਰਿ ਕਰਹਿ ਜੇ ਆਪਣੀ ਤਾਂ ਆਪੇ ਲੈਹਿ ਸਵਾਰਿ ॥नदरि करहि जे आपणी तां आपे लैहि सवारि ॥जब मालिक अपनी कृपा-दृष्टि कर देता है तो स्वतः ही सफल कर देता है। ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੑੀ ਧਿਆਇਆ ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥੬੩॥नानक गुरमुखि जिन्ही धिआइआ आए से परवाणु ॥६३॥गुरु नानक फुरमान करते हैं जिन्होंने गुरु-चरणों में लगकर परमात्मा का

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ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਝੋਕਿ ਵਰਸਦਾ ਬੂੰਦ ਪਵੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥फिर चारों तरफ से कृपा की बारिश हो जाती है और सहज स्वाभाविक नाम-बूंद मुख में पड़ती है। ਜਲ ਹੀ ਤੇ ਸਭ ਊਪਜੈ ਬਿਨੁ ਜਲ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਇ ॥जल ही ते सभ ऊपजै बिनु जल पिआस न जाइ ॥जल

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ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਨ ਚੁਕਈ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥माइआ मोहु न चुकई मरि जमहि वारो वार ॥उसका माया-मोह दूर नहीं होता, जिस कारण वह बार-बार जन्मता मरता है। ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਅਤਿ ਤਿਸਨਾ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ अति तिसना तजि विकार ॥यदि तृष्णा एवं विकारों को छोड़कर सतिगुरु की सेवा की जाए

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ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਬੇਨਤੀ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥੪੧॥नानक की प्रभ बेनती हरि भावै बखसि मिलाइ ॥४१॥नानक की प्रभु से विनती है कि यदि तुझे ठीक लगे तो हमें बख्श कर अपने साथ मिला लो॥४१॥ ਮਨ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਨ ਸੁਝਈ ਨਾ ਸੁਝੈ ਦਰਬਾਰੁ ॥मन आवण जाणु न सुझई ना सुझै दरबारु ॥मन को आवागमन की

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ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਮਨੁ ਮਾਨੀਐ ਸਾਚੇ ਸਾਚੀ ਸੋਇ ॥੩੩॥नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥३३॥हे नानक ! जो शब्द से (विकारों की ओर से) मरता है, उसी का मन संतुष्ट होता है और सच्चा यश पाता है॥३३॥ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਦੁਖੁ ਸਾਗਰੁ ਹੈ ਬਿਖੁ ਦੁਤਰੁ ਤਰਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥माइआ मोहु दुखु सागरु है बिखु

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ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਰਤੇ ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਹੈਨਿ ਨਿਰਧਨੁ ਹੋਰੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੨੬॥नानक नाम रते से धनवंत हैनि निरधनु होरु संसारु ॥२६॥गुरु नानक फुरमान करते हैं कि परमात्मा के नाम में लीन रहने वाले ही धनवान् हैं और बाकी संसार के लोग निर्धन हैं।॥२६॥ ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਠਵਰ ਨ ਠਾਉ ॥जन की टेक

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ਆਤਮਾ ਰਾਮੁ ਨ ਪੂਜਨੀ ਦੂਜੈ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥आतमा रामु न पूजनी दूजै किउ सुखु होइ ॥अन्तरात्मा में प्रभु की पूजा नहीं करता, फिर द्वैतभाव में कैसे सुख मिल सकता है। ਹਉਮੈ ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਹੈ ਸਬਦਿ ਨ ਕਾਢਹਿ ਧੋਇ ॥हउमै अंतरि मैलु है सबदि न काढहि धोइ ॥उसके मन में अहंकार की मैल भरी रहती

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ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਹੈ ਕਿਤੁ ਖਾਧੈ ਤਿਪਤਾਇ ॥हरि प्रभु वेपरवाहु है कितु खाधै तिपताइ ॥प्रभु बे-परवाह है, वह किस तरह तृप्त होता है। ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਤਿਪਤਾਸੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥जो सतिगुरु की रज़ानुसार चलता है, गुणगान करता है तो ही प्रभु तृप्त होता

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