ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੀਐ ਸਾਚੋ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥੫॥
त्रिभवणि सो प्रभु जाणीऐ साचो साचै नाइ ॥५॥
सत्य प्रभु के नाम द्वारा वह उसे पहचान लेते हैं, जो पाताल, धरती एवं आकाश तीनों लोकों में रहता है॥ ५॥
ਸਾ ਧਨ ਖਰੀ ਸੁਹਾਵਣੀ ਜਿਨਿ ਪਿਰੁ ਜਾਤਾ ਸੰਗਿ ॥
सा धन खरी सुहावणी जिनि पिरु जाता संगि ॥
वह जीव-स्त्री बहुत ही सुन्दर है जिसने अपने प्रियतम-प्रभु को समझ लिया है, जो सदैव इसके साथ रहता है।
ਮਹਲੀ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਈਐ ਸੋ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਰੰਗਿ ॥
महली महलि बुलाईऐ सो पिरु रावे रंगि ॥
दसम द्वार रूपी महल में रहने वाला प्रियतम प्रभु जीव-स्त्री को अपने महल में आमंत्रित कर लेता है। पति उसे बड़ी प्रीति से रखता है।
ਸਚਿ ਸੁਹਾਗਣਿ ਸਾ ਭਲੀ ਪਿਰਿ ਮੋਹੀ ਗੁਣ ਸੰਗਿ ॥੬॥
सचि सुहागणि सा भली पिरि मोही गुण संगि ॥६॥
वही नारी सचमुच प्रसन्न तथा गुणवान सुहागिन है, जो अपने प्रियतम पति के गुणों पर मोहित होती है ॥६॥
ਭੂਲੀ ਭੂਲੀ ਥਲਿ ਚੜਾ ਥਲਿ ਚੜਿ ਡੂਗਰਿ ਜਾਉ ॥
भूली भूली थलि चड़ा थलि चड़ि डूगरि जाउ ॥
मुझ नाम से भूली हुई को गुरु के बिना नाम की सूझ नहीं होगी।
ਬਨ ਮਹਿ ਭੂਲੀ ਜੇ ਫਿਰਾ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬੂਝ ਨ ਪਾਉ ॥
बन महि भूली जे फिरा बिनु गुर बूझ न पाउ ॥
मैं सारी धरती पर फिरती रहूँ, धरती पर घूमने के पश्चात पर्वतों पर चढ़ जाऊँ और जंगलों में भटकती रहूँ।
ਨਾਵਹੁ ਭੂਲੀ ਜੇ ਫਿਰਾ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਆਵਉ ਜਾਉ ॥੭॥
नावहु भूली जे फिरा फिरि फिरि आवउ जाउ ॥७॥
यदि हरेि नाम को विस्मृत करके मैं भटकती रहूँ तो मैं पुनः पुनः आवागमन के चक्र में रहूँगी ॥७॥
ਪੁਛਹੁ ਜਾਇ ਪਧਾਊਆ ਚਲੇ ਚਾਕਰ ਹੋਇ ॥
पुछहु जाइ पधाऊआ चले चाकर होइ ॥
हे जीव-स्त्री ! जाकर उन पथिकों से पता कर लो जो प्रभु के भक्त होकर उसके मार्ग पर चलते हैं।
ਰਾਜਨੁ ਜਾਣਹਿ ਆਪਣਾ ਦਰਿ ਘਰਿ ਠਾਕ ਨ ਹੋਇ ॥
राजनु जाणहि आपणा दरि घरि ठाक न होइ ॥
वह ईश्वर को अपना सम्राट मानते हैं और उनको प्रभु के दरबार एवं घर में जाते समय कोई भी रोक नहीं होती।
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੮॥੬॥
नानक एको रवि रहिआ दूजा अवरु न कोइ ॥८॥६॥
हे नानक ! एक परमेश्वर ही सर्वव्यापक है, इसके अलावा अन्य कोई भी अस्तित्व में नहीं ॥८॥६॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
श्रीरागु महला १ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਨਿਰਮਲੁ ਜਾਣੀਐ ਨਿਰਮਲ ਦੇਹ ਸਰੀਰੁ ॥
गुर ते निरमलु जाणीऐ निरमल देह सरीरु ॥
जब गुरु द्वारा मनुष्य का शरीर एवं मन निर्मल हो जाते हैं तो निर्मल प्रभु को जाना जाता है।
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸੋ ਜਾਣੈ ਅਭ ਪੀਰ ॥
निरमलु साचो मनि वसै सो जाणै अभ पीर ॥
सत्य निर्मल प्रभु मन में आ बसता है। वह परमेश्वर जीव के ह्रदय की पीड़ा को अनुभव करता है।
ਸਹਜੈ ਤੇ ਸੁਖੁ ਅਗਲੋ ਨਾ ਲਾਗੈ ਜਮ ਤੀਰੁ ॥੧|
सहजै ते सुखु अगलो ना लागै जम तीरु ॥१॥
सहज अवस्था प्राप्त होने पर मन बहुत सुखी होता है और काल (मृत्यु) का बाण उसे नहीं लगता ॥ १॥
ਭਾਈ ਰੇ ਮੈਲੁ ਨਾਹੀ ਨਿਰਮਲ ਜਲਿ ਨਾਇ ॥
भाई रे मैलु नाही निरमल जलि नाइ ॥
हे भाई ! हरि नाम के निर्मल जल में स्नान करने से तुझे कोई भी मलिनता नहीं लगी रहेगी, अपितु तेरे समस्त अवगुणों की मैल उतर जाएगी।
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚਾ ਏਕੁ ਤੂ ਹੋਰੁ ਮੈਲੁ ਭਰੀ ਸਭ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
निरमलु साचा एकु तू होरु मैलु भरी सभ जाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हे प्रभु ! एकमात्र तू ही सत्य और निर्मल है, अन्य समस्त स्थानों पर मैल विद्यमान है॥ १॥ रहाउ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਮੰਦਰੁ ਸੋਹਣਾ ਕੀਆ ਕਰਣੈਹਾਰਿ ॥
हरि का मंदरु सोहणा कीआ करणैहारि ॥
यह जगत् ईश्वर का अति सुन्दर महल है। सृजनहार प्रभु ने स्वयं इसकी रचना की है।
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੀਪ ਅਨੂਪ ਜੋਤਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥
रवि ससि दीप अनूप जोति त्रिभवणि जोति अपार ॥
सूर्य एवं चंद्रमा की ज्योतियों की चमक अनूप है। ईश्वर का अनन्त प्रकाश तीनों ही लोकों में प्रज्वलित हो रहा है।
ਹਾਟ ਪਟਣ ਗੜ ਕੋਠੜੀ ਸਚੁ ਸਉਦਾ ਵਾਪਾਰ ॥੨॥
हाट पटण गड़ कोठड़ी सचु सउदा वापार ॥२॥
तन के अन्दर दुकानें, नगर तथा किले विद्यमान हैं। जहाँ पर व्यापार करने के लिए सत्य नाम का सौदा है॥ २॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਭੈ ਭੰਜਨਾ ਦੇਖੁ ਨਿਰੰਜਨ ਭਾਇ ॥
गिआन अंजनु भै भंजना देखु निरंजन भाइ ॥
ज्ञान का सुरमा भय को नाश करने वाला है और प्रेम के द्वारा ही पवित्र प्रभु के दर्शन किए जाते हैं।
ਗੁਪਤੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸਭ ਜਾਣੀਐ ਜੇ ਮਨੁ ਰਾਖੈ ਠਾਇ ॥
गुपतु प्रगटु सभ जाणीऐ जे मनु राखै ठाइ ॥
प्राणी अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष समूह को जान लेता है, यदि वह अपने मन को एक स्थान पर केन्द्रित रखे।
ਐਸਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤਾ ਸਹਜੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੩॥
ऐसा सतिगुरु जे मिलै ता सहजे लए मिलाइ ॥३॥
यदि मनुष्य को ऐसा सतिगुरु मिल जाए तो वह सहज ही उसको प्रभु से मिला देता है ॥३॥
ਕਸਿ ਕਸਵਟੀ ਲਾਈਐ ਪਰਖੇ ਹਿਤੁ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
कसि कसवटी लाईऐ परखे हितु चितु लाइ ॥
जैसे सोने को परखने के लिए कसौटी पर परख लिया जाता है, वैसे ही पारब्रह्म अपने उत्पन्न किए हुए प्राणियों के आत्मिक जीवन को बड़े प्रेम से ध्यान लगाकर परखता है।
ਖੋਟੇ ਠਉਰ ਨ ਪਾਇਨੀ ਖਰੇ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇ ॥
खोटे ठउर न पाइनी खरे खजानै पाइ ॥
गुणहीन मंदे जीवों को स्थान नहीं मिलता और गुणवान वास्तविक कोष में डाले जाते हैं।
ਆਸ ਅੰਦੇਸਾ ਦੂਰਿ ਕਰਿ ਇਉ ਮਲੁ ਜਾਇ ਸਮਾਇ ॥੪॥
आस अंदेसा दूरि करि इउ मलु जाइ समाइ ॥४॥
अपनी आशा एवं चिन्ता को निवृत कर दे, इस तरह तेरी मलिनता धुल जाएगी॥ ४॥
ਸੁਖ ਕਉ ਮਾਗੈ ਸਭੁ ਕੋ ਦੁਖੁ ਨ ਮਾਗੈ ਕੋਇ ॥
सुख कउ मागै सभु को दुखु न मागै कोइ ॥
प्रत्येक व्यक्ति सुख की कामना करता है, कोई भी दुख की याचना नहीं करता।
ਸੁਖੈ ਕਉ ਦੁਖੁ ਅਗਲਾ ਮਨਮੁਖਿ ਬੂਝ ਨ ਹੋਇ ॥
सुखै कउ दुखु अगला मनमुखि बूझ न होइ ॥
रसों-स्वादों के पीछे अत्यंत कष्ट प्राप्त होता है परन्तु मनमुखी प्राणी इसको नहीं समझते।
ਸੁਖ ਦੁਖ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੀਅਹਿ ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੫॥
सुख दुख सम करि जाणीअहि सबदि भेदि सुखु होइ ॥५॥
जो सुख और दुख को एक समान जानते हैं और अपनी आत्मा को नाम के साथ अभेद करते हैं, वह ईश्वरीय सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं ॥ ५॥
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੇ ਵਾਚੀਐ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਆਸੁ ॥
बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु ॥
ब्रह्मा के वेद तथा व्यास के शब्दों के पाठ पुकारते हैं कि
ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਵਕ ਸਾਧਿਕਾ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु ॥
मौनधारी ऋषि, प्रभु के भक्त एवं साधक गुणों के भण्डार नाम के साथ रंगे हुए हैं।
ਸਚਿ ਰਤੇ ਸੇ ਜਿਣਿ ਗਏ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਸੁ ॥੬॥
सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु ॥६॥
जो सत्यनाम के साथ रंग जाते हैं, वे सदैव विजय प्राप्त करते हैं। मैं उन पर सदैव ही बलिहारी जाता हूँ ॥६॥
ਚਹੁ ਜੁਗਿ ਮੈਲੇ ਮਲੁ ਭਰੇ ਜਿਨ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨ ਹੋਇ ॥
चहु जुगि मैले मलु भरे जिन मुखि नामु न होइ ॥
जिनके मुख में प्रभु का नाम नहीं, वे मैल से भरे रहते हैं और चारों ही युगों में मैले रहते हैं।
ਭਗਤੀ ਭਾਇ ਵਿਹੂਣਿਆ ਮੁਹੁ ਕਾਲਾ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
भगती भाइ विहूणिआ मुहु काला पति खोइ ॥
जो भगवान से प्रेम नहीं करते उन भक्तिहीनों का भगवान के दरबार में मुँह काला किया जाता है और वे अपना मान-सम्मान गंवा लेते हैं।
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਅਵਗਣ ਮੁਠੀ ਰੋਇ ॥੭॥
जिनी नामु विसारिआ अवगण मुठी रोइ ॥७॥
जिन्होंने भगवान के नाम को विस्मृत कर दिया है, उन्हें उनके अवगुणों ने ठग लिया है, इसलिए वे विलाप करते हैं।॥७॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਪਾਇਆ ਡਰੁ ਕਰਿ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਇ ॥
खोजत खोजत पाइआ डरु करि मिलै मिलाइ ॥
भगवान खोज करने से मिल जाता है। जब मनुष्य के मन में भगवान का भय पैदा हो जाता है फिर गुरु के द्वारा उसे भगवान मिल जाता है।
ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਘਰਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਾਇ ॥
आपु पछाणै घरि वसै हउमै त्रिसना जाइ ॥
जीवात्मा का स्वरूप ज्योति है। जब जीवात्मा को अपने ज्योति स्वरूप की पहचान हो जाती है तो वह अपने दसम द्वार रूपी घर में जाकर बसती है।
ਨਾਨਕ ਨਿਰਮਲ ਊਜਲੇ ਜੋ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥੮॥੭॥
नानक निरमल ऊजले जो राते हरि नाइ ॥८॥७॥
उसकी अहंकार एवं तृष्णा मिट जाती है। हे नानक ! जो व्यक्ति भगवान के नाम में मग्न रहते हैं, वे निर्मल हो जाते हैं और उनके मुख भी उज्ज्वल हो जाते हैं।॥८॥७॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
सिरीरागु महला १ ॥
ਸੁਣਿ ਮਨ ਭੂਲੇ ਬਾਵਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥
सुणि मन भूले बावरे गुर की चरणी लागु ॥
हे मेरे भूले बावले मन ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन। तू गुरु के चरणों में जाकर लग।
ਹਰਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਜਮੁ ਡਰਪੈ ਦੁਖ ਭਾਗੁ ॥
हरि जपि नामु धिआइ तू जमु डरपै दुख भागु ॥
तू ईश्वर का नाम जप और भगवान का ध्यान किया कर, नाम से यमदूत भी भयभीत होता है और समस्त दुख निवृत्त हो जाते हैं।
ਦੂਖੁ ਘਣੋ ਦੋਹਾਗਣੀ ਕਿਉ ਥਿਰੁ ਰਹੈ ਸੁਹਾਗੁ ॥੧॥
दूखु घणो दोहागणी किउ थिरु रहै सुहागु ॥१॥
अभाग्यशाली नारी बहुत कष्ट झेलती है, उसका सुहाग कैसे स्थिर रह सकता है ॥