Hindi Page 332

ਆਂਧੀ ਪਾਛੇ ਜੋ ਜਲੁ ਬਰਖੈ ਤਿਹਿ ਤੇਰਾ ਜਨੁ ਭੀਨਾਂ ॥
आंधी पाछे जो जलु बरखै तिहि तेरा जनु भीनां ॥
ज्ञान की अन्धेरी के पश्चात जो (नाम की) वर्षा होती है, उसमें तेरा भक्त भीग जाता है।

ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਮਨਿ ਭਇਆ ਪ੍ਰਗਾਸਾ ਉਦੈ ਭਾਨੁ ਜਬ ਚੀਨਾ ॥੨॥੪੩॥
कहि कबीर मनि भइआ प्रगासा उदै भानु जब चीना ॥२॥४३॥
कबीर जी कहते हैं- जब मैं सूर्य को उदय होता देखता हूँ तो मेरे हृदय में उजाला ही उजाला हो जाता है॥ २॥ ४३ ॥

ਗਉੜੀ ਚੇਤੀ
गउड़ी चेती
गउड़ी चेती

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੁਨਹਿ ਨ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵਹਿ ॥
हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥
कुछ लोग न कभी भगवान का यश सुनते हैं और न ही कभी भगवान के गुण गाते हैं,

ਬਾਤਨ ਹੀ ਅਸਮਾਨੁ ਗਿਰਾਵਹਿ ॥੧॥
बातन ही असमानु गिरावहि ॥१॥
परन्तु अपनी व्यर्थ बातों से ही (मानो) आसमान को गिरा लेते हैं। १ ॥

ਐਸੇ ਲੋਗਨ ਸਿਉ ਕਿਆ ਕਹੀਐ ॥
ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥
ऐसे लोगों को उपदेश देने का कोई अभिप्राय नहीं,

ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੀਏ ਭਗਤਿ ਤੇ ਬਾਹਜ ਤਿਨ ਤੇ ਸਦਾ ਡਰਾਨੇ ਰਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जो प्रभ कीए भगति ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जिन्हें भगवान ने अपनी भक्ति से वंचित रखा हुआ है, उनसे सदैव ही डरना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

ਆਪਿ ਨ ਦੇਹਿ ਚੁਰੂ ਭਰਿ ਪਾਨੀ ॥
आपि न देहि चुरू भरि पानी ॥
वे लोग स्वयं तो अंजुलि भर जल भी नहीं देते परन्तु

ਤਿਹ ਨਿੰਦਹਿ ਜਿਹ ਗੰਗਾ ਆਨੀ ॥੨॥
तिह निंदहि जिह गंगा आनी ॥२॥
उनकी निंदा करते हैं, जिन्होंने गंगा बहा दी है॥ २॥

ਬੈਠਤ ਉਠਤ ਕੁਟਿਲਤਾ ਚਾਲਹਿ ॥
बैठत उठत कुटिलता चालहि ॥
उठते-बैठते वे कुटिल चालें चलते हैं,

ਆਪੁ ਗਏ ਅਉਰਨ ਹੂ ਘਾਲਹਿ ॥੩॥
आपु गए अउरन हू घालहि ॥३॥
वे तो स्वयं नष्ट हो गए हैं और दूसरों को भी नष्ट करते हैं।॥ ३॥

ਛਾਡਿ ਕੁਚਰਚਾ ਆਨ ਨ ਜਾਨਹਿ ॥
छाडि कुचरचा आन न जानहि ॥
व्यर्थ वाद-विवाद के बिना वह अन्य कुछ नहीं जानते।

ਬ੍ਰਹਮਾ ਹੂ ਕੋ ਕਹਿਓ ਨ ਮਾਨਹਿ ॥੪॥
ब्रहमा हू को कहिओ न मानहि ॥४॥
वह ब्रह्मा जी की बात भी नहीं मानते॥ ४॥

ਆਪੁ ਗਏ ਅਉਰਨ ਹੂ ਖੋਵਹਿ ॥
आपु गए अउरन हू खोवहि ॥
ऐसे लोग आप कुमार्गगामी हुए हैं और दूसरों को भी गुमराह ही करते हैं,

ਆਗਿ ਲਗਾਇ ਮੰਦਰ ਮੈ ਸੋਵਹਿ ॥੫॥
आगि लगाइ मंदर मै सोवहि ॥५॥
वे मानो मन्दिर में आग लगाकर सो रहे हैं।॥ ५॥

ਅਵਰਨ ਹਸਤ ਆਪ ਹਹਿ ਕਾਂਨੇ ॥
अवरन हसत आप हहि कांने ॥
वे स्वयं तो एक ऑख वाले काने हैं लेकिन दूसरों की हँसी उड़ाते हैं।

ਤਿਨ ਕਉ ਦੇਖਿ ਕਬੀਰ ਲਜਾਨੇ ॥੬॥੧॥੪੪॥
तिन कउ देखि कबीर लजाने ॥६॥१॥४४॥
हे कबीर ! ऐसे लोगों को देखकर मुझे लज्जा आती है॥ ६॥ १॥ ४४॥

ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਬੈਰਾਗਣਿ ਕਬੀਰ ਜੀ
रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी
रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਜੀਵਤ ਪਿਤਰ ਨ ਮਾਨੈ ਕੋਊ ਮੂਏਂ ਸਿਰਾਧ ਕਰਾਹੀ ॥
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥
मनुष्य अपने पूर्वजों (माता-पिता) की उनके जीवित रहने तक तो सेवा नहीं करते परन्तु (उनके) मरणोपरांत पितरों का श्राद्ध करवाते हैं।

ਪਿਤਰ ਭੀ ਬਪੁਰੇ ਕਹੁ ਕਿਉ ਪਾਵਹਿ ਕਊਆ ਕੂਕਰ ਖਾਹੀ ॥੧॥
पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही ॥१॥
बताओ, बेचारे पितर भला श्राद्धों का भोजन कैसे पाएँगे ? इसे तो कौए-कुते खा जाते हैं।॥ १॥

ਮੋ ਕਉ ਕੁਸਲੁ ਬਤਾਵਹੁ ਕੋਈ ॥
मो कउ कुसलु बतावहु कोई ॥
कोई मुझे बताओ कि सुख-खुशी क्या है?

ਕੁਸਲੁ ਕੁਸਲੁ ਕਰਤੇ ਜਗੁ ਬਿਨਸੈ ਕੁਸਲੁ ਭੀ ਕੈਸੇ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कुसलु कुसलु करते जगु बिनसै कुसलु भी कैसे होई ॥१॥ रहाउ ॥
सारी दुनिया (इसी दुविधा में) सुख-मंगल कहती मरती जा रही है (कि श्राद्ध कराने से घर में सुख मिलता है) आत्मिक सुख किस प्रकार प्राप्त हो सकता है? ॥ १॥ रहाउ॥

ਮਾਟੀ ਕੇ ਕਰਿ ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਜੀਉ ਦੇਹੀ ॥
माटी के करि देवी देवा तिसु आगै जीउ देही ॥
लोग मिट्टी के देवी-देवता बनाकर उस देवी या देवता के समक्ष जीवों की बलि देते हैं।

ਐਸੇ ਪਿਤਰ ਤੁਮਾਰੇ ਕਹੀਅਹਿ ਆਪਨ ਕਹਿਆ ਨ ਲੇਹੀ ॥੨॥
ऐसे पितर तुमारे कहीअहि आपन कहिआ न लेही ॥२॥
“(हे भाई !) इसी प्रकार तुम्हारे मृत पितर कहे जाते हैं, जो कुछ वह लेना चाहते हैं, कह कर नहीं ले सकते॥ २॥

ਸਰਜੀਉ ਕਾਟਹਿ ਨਿਰਜੀਉ ਪੂਜਹਿ ਅੰਤ ਕਾਲ ਕਉ ਭਾਰੀ ॥
सरजीउ काटहि निरजीउ पूजहि अंत काल कउ भारी ॥
लोग जीवित जीवों को मारते हैं और निर्जीव (मिट्टी के बनाए हुए) देवताओं की पूजा करते हैं। अंतकाल (मृत्यु के समय) तुम्हें बहुत मुश्किल होगा।

ਰਾਮ ਨਾਮ ਕੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਨੀ ਭੈ ਡੂਬੇ ਸੰਸਾਰੀ ॥੩॥
राम नाम की गति नही जानी भै डूबे संसारी ॥३॥
आप राम के नाम की गति नहीं जानते, (इससे) आप भयानक संसार सागर में डूब जाओगे ॥ ३॥

ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ਪੂਜਹਿ ਡੋਲਹਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਹੀ ਜਾਨਾ ॥
देवी देवा पूजहि डोलहि पारब्रहमु नही जाना ॥
हे नश्वर प्राणी ! तुम लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हो। अपने भरोसे में डावांडोल होते रहते हो और पारब्रह्म को नहीं समझते।

ਕਹਤ ਕਬੀਰ ਅਕੁਲੁ ਨਹੀ ਚੇਤਿਆ ਬਿਖਿਆ ਸਿਉ ਲਪਟਾਨਾ ॥੪॥੧॥੪੫॥
कहत कबीर अकुलु नही चेतिआ बिखिआ सिउ लपटाना ॥४॥१॥४५॥
कबीर जी कहते हैं-आप लोग कुलरहित भगवान को याद नहीं करते और माया के विकारों में फंसे रहते हो ॥ ४ ॥ १॥ ४५ ॥

ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥

ਜੀਵਤ ਮਰੈ ਮਰੈ ਫੁਨਿ ਜੀਵੈ ਐਸੇ ਸੁੰਨਿ ਸਮਾਇਆ ॥
जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुंनि समाइआ ॥
मनुष्य को विकारों की ओर से जीवित ही मरे रहना चाहिए और विकारों की ओर से मरकर प्रभु-नाम के द्वारा दोबारा जीना चाहिए। इस प्रकार वह निर्गुण प्रभु में लीन हो जाता है।

ਅੰਜਨ ਮਾਹਿ ਨਿਰੰਜਨਿ ਰਹੀਐ ਬਹੁੜਿ ਨ ਭਵਜਲਿ ਪਾਇਆ ॥੧॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ बहुड़ि न भवजलि पाइआ ॥१॥
वह माया में रहता हुआ भी माया-रहित परमात्मा में रहकर दोबारा भयानक संसार-सागर में नहीं पड़ता॥ १॥

ਮੇਰੇ ਰਾਮ ਐਸਾ ਖੀਰੁ ਬਿਲੋਈਐ ॥
मेरे राम ऐसा खीरु बिलोईऐ ॥
हे मेरे राम ! ऐसे दूध मंथन किया जा सकता है।

ਗੁਰਮਤਿ ਮਨੂਆ ਅਸਥਿਰੁ ਰਾਖਹੁ ਇਨ ਬਿਧਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਓਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरमति मनूआ असथिरु राखहु इन बिधि अम्रितु पीओईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु का उपदेश लेकर मन को स्थिर रख। इस विधि से प्रभु नाम का अमृत पान किया जा सकता है॥ १॥ रहाउ ॥

ਗੁਰ ਕੈ ਬਾਣਿ ਬਜਰ ਕਲ ਛੇਦੀ ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਪਦੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥
गुर कै बाणि बजर कल छेदी प्रगटिआ पदु परगासा ॥
गुरु के बाण ने वज़ कलियुग को छेद दिया है और प्रकाश की अवस्था मुझ पर प्रकाशमान हुई है।

ਸਕਤਿ ਅਧੇਰ ਜੇਵੜੀ ਭ੍ਰਮੁ ਚੂਕਾ ਨਿਹਚਲੁ ਸਿਵ ਘਰਿ ਬਾਸਾ ॥੨॥
सकति अधेर जेवड़ी भ्रमु चूका निहचलु सिव घरि बासा ॥२॥
शक्ति के अंधेरे के कारण रस्सी को सॉप समझने की मेरी दुविधा दूर हो गई है और मैं अब प्रभु के निहचल मन्दिर में निवास करता हूँ॥ २॥

ਤਿਨਿ ਬਿਨੁ ਬਾਣੈ ਧਨਖੁ ਚਢਾਈਐ ਇਹੁ ਜਗੁ ਬੇਧਿਆ ਭਾਈ ॥
तिनि बिनु बाणै धनखु चढाईऐ इहु जगु बेधिआ भाई ॥
हे मेरे भाई ! उस माया ने तीर के बिना ही धनुष खींचा है और इस संसार को छेद दिया है।

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