ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਮਿਲਿ ਘਰਿ ਆਏ ਨਿੰਦਕ ਕੇ ਮੁਖ ਹੋਏ ਕਾਲ ॥
सही सलामति मिलि घरि आए निंदक के मुख होए काल ॥
दास सकुशल घर आ गया है और निंदकों का मुँह काला हो गया है।
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥੨੭॥੧੧੩॥
कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा गुर प्रसादि प्रभ भए निहाल ॥२॥२७॥११३॥
हे नानक ! मेरा सतगुरु पूर्ण है और गुरु की कृपा से प्रभु मुझ पर निहाल हो गया है॥ २॥ २७ ॥ ११३॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਮੂ ਲਾਲਨ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਬਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥
मेरी ईश्वर से अटूट प्रीति बनी है॥ रहाउ॥
ਤੋਰੀ ਨ ਤੂਟੈ ਛੋਰੀ ਨ ਛੂਟੈ ਐਸੀ ਮਾਧੋ ਖਿੰਚ ਤਨੀ ॥੧॥
तोरी न तूटै छोरी न छूटै ऐसी माधो खिंच तनी ॥१॥
प्रभु ने प्रेम की डोर ऐसी बनाई है जो तोड़ने से भी नहीं टूटती और न ही छोड़ने से छूटती है॥ १॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਮਨ ਮਾਹਿ ਬਸਤੁ ਹੈ ਤੂ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੀ ॥੨॥
दिनसु रैनि मन माहि बसतु है तू करि किरपा प्रभ अपनी ॥२॥
अब दिन-रात वह मेरे मन में ही बसता है। हे प्रभु! तू अपनी कृपा करता रह॥ २॥
ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਸਿਆਮ ਸੁੰਦਰ ਕਉ ਅਕਥ ਕਥਾ ਜਾ ਕੀ ਬਾਤ ਸੁਨੀ ॥੩॥
बलि बलि जाउ सिआम सुंदर कउ अकथ कथा जा की बात सुनी ॥३॥
मैं तो उस श्याम सुन्दर पर बलिहारी जाती हैं, जिसके बारे में यह बात सुनी है कि उसकी कथा अकथनीय है॥ ३॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੁ ਕਹੀਅਤ ਹੈ ਮੋਹਿ ਕਰਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਠਾਕੁਰ ਅਪੁਨੀ ॥੪॥੨੮॥੧੧੪॥
जन नानक दासनि दासु कहीअत है मोहि करहु क्रिपा ठाकुर अपुनी ॥४॥२८॥११४॥
नानक कहते हैं कि मुझे तो प्रभु के दासों का दास कहा जाता है। हे ठाकुर जी ! मुझ पर अपनी कृपा करो।॥ ४॥ २८ ॥ ११४॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ਜਪਿ ਜਾਂਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥
मैं तो हरि के चरणों को जपकर उस पर ही कुर्बान जाता हूँ।
ਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰੁ ਤਾ ਕਾ ਹਿਰਦੈ ਧਰਿ ਮਨ ਧਿਆਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरु मेरा पारब्रहम परमेसुरु ता का हिरदै धरि मन धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु ही मेरा परब्रह्म-परमेश्वर है और हृदय में बसाकर उसका ही ध्यान करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖਦਾਤਾ ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਗਲ ਜਹਾਨੁ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखदाता जा का कीआ सगल जहानु ॥
जिसने यह सारा संसार बनाया हुआ है, उस सुखदाता ईश्वर का बारंबार सिमरन करते रहो।
ਰਸਨਾ ਰਵਹੁ ਏਕੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਪਾਵਹੁ ਮਾਨੁ ॥੧॥
रसना रवहु एकु नाराइणु साची दरगह पावहु मानु ॥१॥
अपनी जीभ से एक नारायण को जपते रहो और सच्ची दरगाह में सम्मान प्राप्त करो ॥ १ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਪਰਾਪਤਿ ਜਾ ਕਉ ਤਿਨ ਹੀ ਪਾਇਆ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
साधू संगु परापति जा कउ तिन ही पाइआ एहु निधानु ॥
जिसे साधु की संगति प्राप्त हुई है, उसने ही यह नाम रूपी खजाना हासिल किया है।
ਗਾਵਉ ਗੁਣ ਕੀਰਤਨੁ ਨਿਤ ਸੁਆਮੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਨਕ ਦੀਜੈ ਦਾਨੁ ॥੨॥੨੯॥੧੧੫॥
गावउ गुण कीरतनु नित सुआमी करि किरपा नानक दीजै दानु ॥२॥२९॥११५॥
नानक प्रार्थना करते हैं कि हे स्वामी ! कृपा करके यही दान दीजिए कि नित्य तेरा गुणगान एवं कीर्तन करता रहूँ॥ २॥ २६॥ ११५॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
ਰਾਖਿ ਲੀਏ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣ ॥
राखि लीए सतिगुर की सरण ॥
सतगुरु की शरण में परमात्मा ने हमारी रक्षा की है।
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਹੋਆ ਜਗ ਅੰਤਰਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਮੇਰੋ ਤਾਰਣ ਤਰਣ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जै जै कारु होआ जग अंतरि पारब्रहमु मेरो तारण तरण ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा परब्रह्म भवसागर में से पार करवाने वाला है और सारे जग में उसकी जय-जयकार हो रही है॥ १॥ रहाउ ॥
ਬਿਸ੍ਵੰਭਰ ਪੂਰਨ ਸੁਖਦਾਤਾ ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਪੋਖਣ ਭਰਣ ॥
बिस्व्मभर पूरन सुखदाता सगल समग्री पोखण भरण ॥
पूर्ण सुखदाता विश्वंभर सारी सृष्टि का भरण पोषण करने वाला है।
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਂਈ ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ॥੧॥
थान थनंतरि सरब निरंतरि बलि बलि जांई हरि के चरण ॥१॥
वह देश-देशांतर सबमें व्याप्त है और मैं उस हरि के चरणों पर बार बार बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
ਜੀਅ ਜੁਗਤਿ ਵਸਿ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਸਰਬ ਸਿਧਿ ਤੁਮ ਕਾਰਣ ਕਰਣ ॥
जीअ जुगति वसि मेरे सुआमी सरब सिधि तुम कारण करण ॥
हे मेरे स्वामी ! सब जीवों की जीवन-युक्ति तेरे वश में है और तू सर्व सिद्धियों का कर्ता है।
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਪ੍ਰਭੁ ਰਖਦਾ ਆਇਆ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਨਾਨਕ ਨਹੀ ਡਰਣ ॥੨॥੩੦॥੧੧੬॥
आदि जुगादि प्रभु रखदा आइआ हरि सिमरत नानक नही डरण ॥२॥३०॥११६॥
हे नानक ! युगों-युगांतरों से प्रभु अपने भक्तजनों की रक्षा करता आया है तथा उसका सिमरन करने से कोई डर नहीं रहता ॥२॥३०॥११६॥॥
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ ਘਰੁ ੮
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ८
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ८
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਮੈ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰਾ ॥
मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥
हे प्रभु! मैं तो कुछ भी नहीं हूँ और सबकुछ तेरा ही दिया हुआ है।
ਈਘੈ ਨਿਰਗੁਨ ਊਘੈ ਸਰਗੁਨ ਕੇਲ ਕਰਤ ਬਿਚਿ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ईघै निरगुन ऊघै सरगुन केल करत बिचि सुआमी मेरा ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा स्वामी निर्गुण स्वरूप एवं सगुण स्वरूप में स्वयं ही लीला कर रहा है॥ १॥ रहाउ॥
ਨਗਰ ਮਹਿ ਆਪਿ ਬਾਹਰਿ ਫੁਨਿ ਆਪਨ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਕੋ ਸਗਲ ਬਸੇਰਾ ॥
नगर महि आपि बाहरि फुनि आपन प्रभ मेरे को सगल बसेरा ॥
शरीर रूपी नगर में वही मौजूद है और बाहर भी वही बस रहा है। सच तो यही है कि मेरा प्रभु सब में निवास कर रहा है।
ਆਪੇ ਹੀ ਰਾਜਨੁ ਆਪੇ ਹੀ ਰਾਇਆ ਕਹ ਕਹ ਠਾਕੁਰੁ ਕਹ ਕਹ ਚੇਰਾ ॥੧॥
आपे ही राजनु आपे ही राइआ कह कह ठाकुरु कह कह चेरा ॥१॥
वह स्वयं ही राजा है और स्वयं ही प्रजा है।कहीं वह मालिक बना हुआ है और कहीं वह चेला बना हुआ है॥ १॥
ਕਾ ਕਉ ਦੁਰਾਉ ਕਾ ਸਿਉ ਬਲਬੰਚਾ ਜਹ ਜਹ ਪੇਖਉ ਤਹ ਤਹ ਨੇਰਾ ॥
का कउ दुराउ का सिउ बलबंचा जह जह पेखउ तह तह नेरा ॥
मैं कौन-सी वस्तु छिपा कर रखूं और किससे छल-कपट करूँ, मैं जिधर भी देखता हूँ, वह मुझे निकट ही नजर आता है।
ਸਾਧ ਮੂਰਤਿ ਗੁਰੁ ਭੇਟਿਓ ਨਾਨਕ ਮਿਲਿ ਸਾਗਰ ਬੂੰਦ ਨਹੀ ਅਨ ਹੇਰਾ ॥੨॥੧॥੧੧੭॥
साध मूरति गुरु भेटिओ नानक मिलि सागर बूंद नही अन हेरा ॥२॥१॥११७॥
हे नानक ! मुझे साधु स्वरूप गुरु मिल गया है। अब मैंने देखा है कि जैसे सागर से मिली बूंद उससे भिन्न नहीं होती, वैसे ही ज्योति परमज्योति से मिलकर भिन्न नही होती।॥ २ । १ ॥ ११७ ॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिलावलु महला ५ ॥