ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਧੰਨੁ ਗੁਪਾਲ ਧੰਨੁ ਗੁਰਦੇਵ ॥
धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥
हे ईश्वर, हे गुरुदेव ! तू धन्य है।
ਧੰਨੁ ਅਨਾਦਿ ਭੂਖੇ ਕਵਲੁ ਟਹਕੇਵ ॥
धंनु अनादि भूखे कवलु टहकेव ॥
यह अन्नादि भी धन्य है, जिसे खाकर भूखे आदमी का हृदय कमल खिल जाता है
ਧਨੁ ਓਇ ਸੰਤ ਜਿਨ ਐਸੀ ਜਾਨੀ ॥
धनु ओइ संत जिन ऐसी जानी ॥
वे संतजन धन्य है जिन्होंने यह बात समझ ली है और
ਤਿਨ ਕਉ ਮਿਲਿਬੋ ਸਾਰਿੰਗਪਾਨੀ ॥੧॥
तिन कउ मिलिबो सारिंगपानी ॥१॥
उन्हें परमात्मा मिल गया है।१॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਤੇ ਹੋਇ ਅਨਾਦਿ ॥
आदि पुरख ते होइ अनादि ॥
यह अन्न इत्यादि पदार्थ आदिपुरुष परमेश्वर से ही पैदा हुआ है।
ਜਪੀਐ ਨਾਮੁ ਅੰਨ ਕੈ ਸਾਦਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जपीऐ नामु अंन कै सादि ॥१॥ रहाउ ॥
अन्न के स्वाद की तरह ही भगवान का नाम जपना चाहिए।॥ १॥ रहाउ॥
ਜਪੀਐ ਨਾਮੁ ਜਪੀਐ ਅੰਨੁ ॥
जपीऐ नामु जपीऐ अंनु ॥
परमात्मा का नाम जपना और अन्न को भी जपना वैसे ही है,
ਅੰਭੈ ਕੈ ਸੰਗਿ ਨੀਕਾ ਵੰਨੁ ॥
अ्मभै कै संगि नीका वंनु ॥
जिस तरह जल के साथ मिलकर भोजन और भी स्वादिष्ट बन जाता है।
ਅੰਨੈ ਬਾਹਰਿ ਜੋ ਨਰ ਹੋਵਹਿ ॥
अंनै बाहरि जो नर होवहि ॥
जो व्यक्ति अन्न को त्याग देता है,
ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਮਹਿ ਅਪਨੀ ਖੋਵਹਿ ॥੨॥
तीनि भवन महि अपनी खोवहि ॥२॥
वह तीनों लोकों में अपनी प्रतिष्ठा गंवा देता है॥ २ ॥
ਛੋਡਹਿ ਅੰਨੁ ਕਰਹਿ ਪਾਖੰਡ ॥
छोडहि अंनु करहि पाखंड ॥
जो व्यक्ति भोजन खाना छोड़ देते हैं, वे पाखण्ड ही करते हैं।
ਨਾ ਸੋਹਾਗਨਿ ਨਾ ਓਹਿ ਰੰਡ ॥
ना सोहागनि ना ओहि रंड ॥
न ही वे सुहागिन हैं और न ही ये विधवा कहलाने के हकदार हैं।
ਜਗ ਮਹਿ ਬਕਤੇ ਦੂਧਾਧਾਰੀ ॥
जग महि बकते दूधाधारी ॥
जग में जो लोग दुग्धाहारी कहे जाते हैं,
ਗੁਪਤੀ ਖਾਵਹਿ ਵਟਿਕਾ ਸਾਰੀ ॥੩॥
गुपती खावहि वटिका सारी ॥३॥
वे पंजीरी बना कर लोगों से चोरी-चोरी खाते रहते हैं।॥ ३॥
ਅੰਨੈ ਬਿਨਾ ਨ ਹੋਇ ਸੁਕਾਲੁ ॥
अंनै बिना न होइ सुकालु ॥
दुनिया में अन्न के बिना सुख-समृद्धि नहीं होती और
ਤਜਿਐ ਅੰਨਿ ਨ ਮਿਲੈ ਗੁਪਾਲੁ ॥
तजिऐ अंनि न मिलै गुपालु ॥
अन्न का त्याग करने से भगवान् भी नहीं मिलता।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਹਮ ਐਸੇ ਜਾਨਿਆ ॥
कहु कबीर हम ऐसे जानिआ ॥
कबीर जी कहते हैं कि मैंने यह ज्ञान समझ लिया है कि
ਧੰਨੁ ਅਨਾਦਿ ਠਾਕੁਰ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੪॥੮॥੧੧॥
धंनु अनादि ठाकुर मनु मानिआ ॥४॥८॥११॥
अन्न धन्य है, जिसे खाने से मेरा मन ठाकुर जी के ध्यान में लीन है॥ ४॥ ८॥ ११॥
ਰਾਗੁ ਗੋਂਡ ਬਾਣੀ ਨਾਮਦੇਉ ਜੀ ਕੀ ਘਰੁ ੧
रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की घरु १
रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की घरु १
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਅਸੁਮੇਧ ਜਗਨੇ ॥
असुमेध जगने ॥
चाहे कोई अश्वमेध यज्ञ करवा ले,
ਤੁਲਾ ਪੁਰਖ ਦਾਨੇ ॥
तुला पुरख दाने ॥
चाहे अपने भार के बराबर तोलकर सोना, चाँदी एवं अनाज इत्यादि का दान करे,
ਪ੍ਰਾਗ ਇਸਨਾਨੇ ॥੧॥
प्राग इसनाने ॥१॥
चाहे प्रयागराज तीर्थ में जाकर स्नान कर ले॥ १॥
ਤਉ ਨ ਪੁਜਹਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਨਾਮਾ ॥
तउ न पुजहि हरि कीरति नामा ॥
तो भी यह सभी पुण्य कर्म ईश्वर की कीर्ति के बराबर नहीं आते।
ਅਪੁਨੇ ਰਾਮਹਿ ਭਜੁ ਰੇ ਮਨ ਆਲਸੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ ॥१॥ रहाउ ॥
हे आलसी मन, अपने राम का भजन कर ले ॥ १॥ रहाउ ॥
ਗਇਆ ਪਿੰਡੁ ਭਰਤਾ ॥
गइआ पिंडु भरता ॥
चाहे कोई गया तीर्थ पर जाकर अपने पूर्वजों के नमित्त पिण्डदान करवाता है,
ਬਨਾਰਸਿ ਅਸਿ ਬਸਤਾ ॥
बनारसि असि बसता ॥
चाहे बनारस के निकट असि नदी के तट पर जाकर बसता है,
ਮੁਖਿ ਬੇਦ ਚਤੁਰ ਪੜਤਾ ॥੨॥
मुखि बेद चतुर पड़ता ॥२॥
चाहे मुख से चार वेदों का पाठ करता है॥ २॥
ਸਗਲ ਧਰਮ ਅਛਿਤਾ ॥
सगल धरम अछिता ॥
चाहे वह सभी धर्म-कर्म निर्विघ्न करता है,
ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਇੰਦ੍ਰੀ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ॥
गुर गिआन इंद्री द्रिड़ता ॥
चाहे गुरु के दिए ज्ञान द्वारा अपनी इन्द्रियों को वशीभूत करता है,
ਖਟੁ ਕਰਮ ਸਹਿਤ ਰਹਤਾ ॥੩॥
खटु करम सहित रहता ॥३॥
चाहे छः कर्म करता हुआ अपना जीवन-व्यतीत करता है तो भी कल्याण नहीं होता ॥ ३ ॥
ਸਿਵਾ ਸਕਤਿ ਸੰਬਾਦੰ ॥ ਮਨ ਛੋਡਿ ਛੋਡਿ ਸਗਲ ਭੇਦੰ ॥
सिवा सकति स्मबादं ॥ मन छोडि छोडि सगल भेदं ॥
चाहे वह शिवा-शक्ति के संवाद में मग्न रहता है। हे मन ! इन सभी धर्म-कर्मो को छोड़ दे, क्योंकि ये सभी कर्म परमात्मा से दूर ले जाने वाले हैं।
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੋਬਿੰਦੰ ॥ ਭਜੁ ਨਾਮਾ ਤਰਸਿ ਭਵ ਸਿੰਧੰ ॥੪॥੧॥
सिमरि सिमरि गोबिंदं ॥ भजु नामा तरसि भव सिंधं ॥४॥१॥
नामदेव जी कहते हैं कि हरदम गोविंद का सिमरन करते रहो, उसका भजन करने से तू भवसागर से पार हो जाएगा॥ ४ ।१॥
ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਨਾਦ ਭ੍ਰਮੇ ਜੈਸੇ ਮਿਰਗਾਏ ॥
नाद भ्रमे जैसे मिरगाए ॥
जैसे मृग संगीत की ध्वनि को सुनकर उस ओर भागता है और
ਪ੍ਰਾਨ ਤਜੇ ਵਾ ਕੋ ਧਿਆਨੁ ਨ ਜਾਏ ॥੧॥
प्रान तजे वा को धिआनु न जाए ॥१॥
अपने प्राण गंवा देता है, परन्तु उसका ध्यान नहीं भूलता ॥ १॥
ਐਸੇ ਰਾਮਾ ਐਸੇ ਹੇਰਉ ॥
ऐसे रामा ऐसे हेरउ ॥
में भी राम की ओर ऐसे ही ध्यान लगाकर रखता हूँ और
ਰਾਮੁ ਛੋਡਿ ਚਿਤੁ ਅਨਤ ਨ ਫੇਰਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
रामु छोडि चितु अनत न फेरउ ॥१॥ रहाउ ॥
राम को छोड़कर अपना चित्त कहीं ओर नहीं लगाता॥ १॥ रहाउ॥
ਜਿਉ ਮੀਨਾ ਹੇਰੈ ਪਸੂਆਰਾ ॥
जिउ मीना हेरै पसूआरा ॥
जैसे बगुला मछलियों को देखता रहता है,
ਸੋਨਾ ਗਢਤੇ ਹਿਰੈ ਸੁਨਾਰਾ ॥੨॥
सोना गढते हिरै सुनारा ॥२॥
जैसे सुनार स्वर्ण को गढ़ता आभूषण की ओर देखता रहता है॥ २ ॥
ਜਿਉ ਬਿਖਈ ਹੇਰੈ ਪਰ ਨਾਰੀ ॥
जिउ बिखई हेरै पर नारी ॥
जैसे कामी इन्सान पराई नारी को कुदृष्टि से देखता है,
ਕਉਡਾ ਡਾਰਤ ਹਿਰੈ ਜੁਆਰੀ ॥੩॥
कउडा डारत हिरै जुआरी ॥३॥
जैसे जुआरी कौड़ियाँ फेंकते उनकी ओर देखता रहता है॥ ३॥
ਜਹ ਜਹ ਦੇਖਉ ਤਹ ਤਹ ਰਾਮਾ ॥
जह जह देखउ तह तह रामा ॥
वैसे ही मैं जिधर भी देखता हूँ, उधर ही मुझे राम नजर आता है।
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ਨਿਤ ਧਿਆਵੈ ਨਾਮਾ ॥੪॥੨॥
हरि के चरन नित धिआवै नामा ॥४॥२॥
अब नामदेव नित्य हरि के चरणों का ध्यान करता रहता है।॥ ४ ॥ २ ॥
ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਮੋ ਕਉ ਤਾਰਿ ਲੇ ਰਾਮਾ ਤਾਰਿ ਲੇ ॥
मो कउ तारि ले रामा तारि ले ॥
हे मेरे राम ! मुझे भवसागर से तार दो, मेरा उद्धार कर दो ।
ਮੈ ਅਜਾਨੁ ਜਨੁ ਤਰਿਬੇ ਨ ਜਾਨਉ ਬਾਪ ਬੀਠੁਲਾ ਬਾਹ ਦੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मै अजानु जनु तरिबे न जानउ बाप बीठुला बाह दे ॥१॥ रहाउ ॥
मैं तेरा अनजान सेवक तैरना नहीं जानता; हे परमपिता ! मुझे बाँह देकर आसरा दीजिए॥ १ ॥ रहाउ ॥
ਨਰ ਤੇ ਸੁਰ ਹੋਇ ਜਾਤ ਨਿਮਖ ਮੈ ਸਤਿਗੁਰ ਬੁਧਿ ਸਿਖਲਾਈ ॥
नर ते सुर होइ जात निमख मै सतिगुर बुधि सिखलाई ॥
सतगुरु ने मुझे ऐसी बुद्धि सिखलाई है, जिससे मानव पल में ही देवता बन जाता है।
ਨਰ ਤੇ ਉਪਜਿ ਸੁਰਗ ਕਉ ਜੀਤਿਓ ਸੋ ਅਵਖਧ ਮੈ ਪਾਈ ॥੧॥
नर ते उपजि सुरग कउ जीतिओ सो अवखध मै पाई ॥१॥
मैंने वह औषधि प्राप्त कर ली है, जिससे मानव-जन्म लेकर स्वर्ग को भी जीता जा सकता है॥ १॥
ਜਹਾ ਜਹਾ ਧੂਅ ਨਾਰਦੁ ਟੇਕੇ ਨੈਕੁ ਟਿਕਾਵਹੁ ਮੋਹਿ ॥
जहा जहा धूअ नारदु टेके नैकु टिकावहु मोहि ॥
हे परमेश्वर ! मुझे भी उस स्थान पर टिका दो, जहाँ-जहाँ तूने भक्त ध्रुव एवं नारद मुनि को टिकाया है।
ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਅਵਿਲੰਬਿ ਬਹੁਤੁ ਜਨ ਉਧਰੇ ਨਾਮੇ ਕੀ ਨਿਜ ਮਤਿ ਏਹ ॥੨॥੩॥
तेरे नाम अविल्मबि बहुतु जन उधरे नामे की निज मति एह ॥२॥३॥
नामदेव की मति यही है की तेरे नाम के अवलंब द्वारा बहुत सारे भक्तजन भवसागर से पार हो गए हैं।२॥ ३॥