ਲੈ ਫਾਹੇ ਉਠਿ ਧਾਵਤੇ ਸਿ ਜਾਨਿ ਮਾਰੇ ਭਗਵੰਤ ॥੧੦॥
लै फाहे उठि धावते सि जानि मारे भगवंत ॥१०॥
वे चाकू-पिस्तौल इत्यादि सामान लेकर भागते फिरते हैं परन्तु सच मानो ऐसे लोगों को ईश्वर ने ही मारा हुआ है।॥ १०॥
ਕਬੀਰ ਚੰਦਨ ਕਾ ਬਿਰਵਾ ਭਲਾ ਬੇੜ੍ਹ੍ਹਿਓ ਢਾਕ ਪਲਾਸ ॥
कबीर चंदन का बिरवा भला बेड़्हिओ ढाक पलास ॥
“[कबीर जी संत-महात्मा की तरफ संकेत करते हैं, जिनकी संगत का लोग लाभ प्राप्त करते हैंI} हे कबीर ! चन्दन का पौधा भला है, जो ढाक प्लास के पौधों से घिरा रहता है।
ਓਇ ਭੀ ਚੰਦਨੁ ਹੋਇ ਰਹੇ ਬਸੇ ਜੁ ਚੰਦਨ ਪਾਸਿ ॥੧੧॥
ओइ भी चंदनु होइ रहे बसे जु चंदन पासि ॥११॥
वस्तुतः चंदन के निकट रहने वाले पौधे भी चन्दन की तरह महकदार हो जाते हैं॥ ११॥
ਕਬੀਰ ਬਾਂਸੁ ਬਡਾਈ ਬੂਡਿਆ ਇਉ ਮਤ ਡੂਬਹੁ ਕੋਇ ॥
कबीर बांसु बडाई बूडिआ इउ मत डूबहु कोइ ॥
कबीर जी चेताते हैं कि बांस अपने (लम्बे होने के) अभिमान में डूबा रहता है, इसी तरह कोई अपने बड़े होने के अभिमान में मत डूबना।
ਚੰਦਨ ਕੈ ਨਿਕਟੇ ਬਸੈ ਬਾਂਸੁ ਸੁਗੰਧੁ ਨ ਹੋਇ ॥੧੨
चंदन कै निकटे बसै बांसु सुगंधु न होइ ॥१२॥
बांस बेशक चन्दन के निकट रहता है परन्तु सुगन्धित नहीं होता।।१२ ।।
ਕਬੀਰ ਦੀਨੁ ਗਵਾਇਆ ਦੁਨੀ ਸਿਉ ਦੁਨੀ ਨ ਚਾਲੀ ਸਾਥਿ ॥
कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ दुनी न चाली साथि ॥
हे कबीर ! दुनिया की खातिर मनुष्य अपना धर्म-ईमान छोड़ देता है परन्तु दुनिया साथ नहीं चलती
ਪਾਇ ਕੁਹਾੜਾ ਮਾਰਿਆ ਗਾਫਲਿ ਅਪੁਨੈ ਹਾਥਿ ॥੧੩॥
पाइ कुहाड़ा मारिआ गाफलि अपुनै हाथि ॥१३॥
गाफिल व्यक्ति अपने हाथ से पाँवों पर कुल्हाड़ा ही मारता है॥ १३॥
ਕਬੀਰ ਜਹ ਜਹ ਹਉ ਫਿਰਿਓ ਕਉਤਕ ਠਾਓ ਠਾਇ ॥
कबीर जह जह हउ फिरिओ कउतक ठाओ ठाइ ॥
हे कबीर ! मैं जहाँ-जहाँ घूमा हूँ हर जगह ईश्वर की लीला देखी है।
ਇਕ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ਬਾਹਰਾ ਊਜਰੁ ਮੇਰੈ ਭਾਂਇ ॥੧੪॥
इक राम सनेही बाहरा ऊजरु मेरै भांइ ॥१४॥
प्यारे प्रभु के बिना मेरे लिए सब उजाड़ है॥ १४॥
ਕਬੀਰ ਸੰਤਨ ਕੀ ਝੁੰਗੀਆ ਭਲੀ ਭਠਿ ਕੁਸਤੀ ਗਾਉ ॥
कबीर संतन की झुंगीआ भली भठि कुसती गाउ ॥
हे कबीर ! भले पुरुषों की झोंपड़ी झूठे एवं पापियों के गांव से भली है।
ਆਗਿ ਲਗਉ ਤਿਹ ਧਉਲਹਰ ਜਿਹ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਉ ॥੧੫॥
आगि लगउ तिह धउलहर जिह नाही हरि को नाउ ॥१५॥
उन बड़े-बड़े महलों-कोठियों को आग लगा देनी चाहिए, जहाँ हरिनाम का भजन नहीं होता॥ १५॥
ਕਬੀਰ ਸੰਤ ਮੂਏ ਕਿਆ ਰੋਈਐ ਜੋ ਅਪੁਨੇ ਗ੍ਰਿਹਿ ਜਾਇ ॥
कबीर संत मूए किआ रोईऐ जो अपुने ग्रिहि जाइ ॥
कबीर जी समझाते हैं कि संतों की मृत्यु पर भला क्या रोना, जो अपने सच्चे घर (प्रभु-चरणों) में चले जाते हैं।
ਰੋਵਹੁ ਸਾਕਤ ਬਾਪੁਰੇ ਜੁ ਹਾਟੈ ਹਾਟ ਬਿਕਾਇ ॥੧੬॥
रोवहु साकत बापुरे जु हाटै हाट बिकाइ ॥१६॥
दरअसल उन बदनसीब मायावी लोगों पर रोना चाहिए, जो बुरे कर्मों के कारण (जन्म-मरण के चक्र में) पुनः बिकते फिरते हैं।॥ १६॥
ਕਬੀਰ ਸਾਕਤੁ ਐਸਾ ਹੈ ਜੈਸੀ ਲਸਨ ਕੀ ਖਾਨਿ ॥
कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥
कबीर जी बतलाते हैं- जैसी लहसुन की खान होती है, ऐसा ही मायावी पुरुष होता है,
ਕੋਨੇ ਬੈਠੇ ਖਾਈਐ ਪਰਗਟ ਹੋਇ ਨਿਦਾਨਿ ॥੧੭॥
कोने बैठे खाईऐ परगट होइ निदानि ॥१७॥
ज्यों कोने में बैठकर लहसुन खाया जाए तो उसकी दुर्गन्ध आसपास आने लग जाती है, इसी तरह उसके कर्म भी ज़ाहिर हो जाते हैं ॥ १७ ॥
ਕਬੀਰ ਮਾਇਆ ਡੋਲਨੀ ਪਵਨੁ ਝਕੋਲਨਹਾਰੁ ॥
कबीर माइआ डोलनी पवनु झकोलनहारु ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं- माया मटकी के बराबर है और साँसें मथनी है।
ਸੰਤਹੁ ਮਾਖਨੁ ਖਾਇਆ ਛਾਛਿ ਪੀਐ ਸੰਸਾਰੁ ॥੧੮॥
संतहु माखनु खाइआ छाछि पीऐ संसारु ॥१८॥
संत पुरुष परमात्मा का स्मरण करके माखन खाते हैं और संसार के लोग छाछ पीते हैं॥ १८॥
ਕਬੀਰ ਮਾਇਆ ਡੋਲਨੀ ਪਵਨੁ ਵਹੈ ਹਿਵ ਧਾਰ ॥
कबीर माइआ डोलनी पवनु वहै हिव धार ॥
हे कबीर ! यह माया दूध की मटकी है, जिसमें श्वासों की ठण्डी धारा चल रही है।
ਜਿਨਿ ਬਿਲੋਇਆ ਤਿਨਿ ਖਾਇਆ ਅਵਰ ਬਿਲੋਵਨਹਾਰ ॥੧੯॥
जिनि बिलोइआ तिनि खाइआ अवर बिलोवनहार ॥१९॥
जो ठीक तरह मंथन करता है, वह माखन खाता है, अन्य लोग मंथन ही करते रहते हैं॥ १६॥
ਕਬੀਰ ਮਾਇਆ ਚੋਰਟੀ ਮੁਸਿ ਮੁਸਿ ਲਾਵੈ ਹਾਟਿ ॥
कबीर माइआ चोरटी मुसि मुसि लावै हाटि ॥
कबीर जी कहते हैं- इस माया लुटेरी ने लोगों को धोखा दे-देकर अपनी दुकान सजाई है।
ਏਕੁ ਕਬੀਰਾ ਨਾ ਮੁਸੈ ਜਿਨਿ ਕੀਨੀ ਬਾਰਹ ਬਾਟ ॥੨੦॥
एकु कबीरा ना मुसै जिनि कीनी बारह बाट ॥२०॥
यह केवल कबीर को धोखा नहीं दे सकी, जिसने इसके काट कर बारह टुकड़े कर दिए॥ २०॥
ਕਬੀਰ ਸੂਖੁ ਨ ਏਂਹ ਜੁਗਿ ਕਰਹਿ ਜੁ ਬਹੁਤੈ ਮੀਤ ॥
कबीर सूखु न एंह जुगि करहि जु बहुतै मीत ॥
कबीर जी समझाते हैं- बहुत अधिक मित्र बनाने से इस दुनिया में सुख प्राप्त नहीं होता।
ਜੋ ਚਿਤੁ ਰਾਖਹਿ ਏਕ ਸਿਉ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ਨੀਤ ॥੨੧॥
जो चितु राखहि एक सिउ ते सुखु पावहि नीत ॥२१॥
जो अपने दिल में केवल परमात्मा को बसाए रखता है, वास्तव में वह नित्य ही सुख पाता है॥ २१॥
ਕਬੀਰ ਜਿਸੁ ਮਰਨੇ ਤੇ ਜਗੁ ਡਰੈ ਮੇਰੇ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ॥
कबीर जिसु मरने ते जगु डरै मेरे मनि आनंदु ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं- जिस मौत से पूरा जगत डर रहा है, उस मौत से मेरे मन में आनंद ही आनंद हो रहा है।
ਮਰਨੇ ਹੀ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪੂਰਨੁ ਪਰਮਾਨੰਦੁ ॥੨੨॥
मरने ही ते पाईऐ पूरनु परमानंदु ॥२२॥
क्योंकेि मरने के बाद ही पूर्ण परमानंद प्राप्त होता है।॥ २२॥
ਰਾਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇ ਕੈ ਕਬੀਰਾ ਗਾਂਠਿ ਨ ਖੋਲ੍ਹ੍ਹ ॥
राम पदारथु पाइ कै कबीरा गांठि न खोल्ह ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं- परमात्मा को पाकर गाँठ मत खोल (अर्थात् लोगों को मत बता) क्योंकि
ਨਹੀ ਪਟਣੁ ਨਹੀ ਪਾਰਖੂ ਨਹੀ ਗਾਹਕੁ ਨਹੀ ਮੋਲੁ ॥੨੩॥
नही पटणु नही पारखू नही गाहकु नही मोलु ॥२३॥
न ही कोई भक्ति स्थल है, न ही पारखी है, न ही कोई भक्ति करने वाला ग्राहक है और न ही कोई महानता को समझता है॥ २३॥
ਕਬੀਰ ਤਾ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਜਾ ਕੋ ਠਾਕੁਰੁ ਰਾਮੁ ॥
कबीर ता सिउ प्रीति करि जा को ठाकुरु रामु ॥
कबीर जी उपदेश करते हैं कि हे सज्जनो ! उन संत-भक्तों से प्रेम करो, जिन्होंने राम को अपना स्वामी मान लिया है।
ਪੰਡਿਤ ਰਾਜੇ ਭੂਪਤੀ ਆਵਹਿ ਕਉਨੇ ਕਾਮ ॥੨੪॥
पंडित राजे भूपती आवहि कउने काम ॥२४॥
पण्डित, राजा-महाराजा किसी काम नहीं आने॥ २४॥
ਕਬੀਰ ਪ੍ਰੀਤਿ ਇਕ ਸਿਉ ਕੀਏ ਆਨ ਦੁਬਿਧਾ ਜਾਇ ॥
कबीर प्रीति इक सिउ कीए आन दुबिधा जाइ ॥
कबीर जी बतलाते हैं कि जब परमात्मा से प्रेम लग जाता है तो अन्य सब दुविधाएँ दूर हो जाती हैं।
ਭਾਵੈ ਲਾਂਬੇ ਕੇਸ ਕਰੁ ਭਾਵੈ ਘਰਰਿ ਮੁਡਾਇ ॥੨੫॥
भावै लांबे केस करु भावै घररि मुडाइ ॥२५॥
चाहे लम्बी जटाओं वाला साधु हो या सिर मुंडवा सन्यासी हो॥ २५॥
ਕਬੀਰ ਜਗੁ ਕਾਜਲ ਕੀ ਕੋਠਰੀ ਅੰਧ ਪਰੇ ਤਿਸ ਮਾਹਿ ॥
कबीर जगु काजल की कोठरी अंध परे तिस माहि ॥
कबीर जी कथन करते हैं कि यह जगत (मोह, माया रूपी) काजल की कोठरी है और अज्ञानांध जीव इसमें पड़े रहते हैं।
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਿਨ ਕਉ ਪੈਸਿ ਜੁ ਨੀਕਸਿ ਜਾਹਿ ॥੨੬॥
हउ बलिहारी तिन कउ पैसि जु नीकसि जाहि ॥२६॥
मैं उन सज्जनों पर कुर्बान जाता हूँ, जो कालिमा से बाहर निकल जाते हैं।॥ २६॥
ਕਬੀਰ ਇਹੁ ਤਨੁ ਜਾਇਗਾ ਸਕਹੁ ਤ ਲੇਹੁ ਬਹੋਰਿ ॥
कबीर इहु तनु जाइगा सकहु त लेहु बहोरि ॥
हे कबीर ! यह तन नाश होना ही है, इसे बचाने का बेशक कोई भी उपाय कर ली, इसे बचा नहीं सकते।
ਨਾਂਗੇ ਪਾਵਹੁ ਤੇ ਗਏ ਜਿਨ ਕੇ ਲਾਖ ਕਰੋਰਿ ॥੨੭॥
नांगे पावहु ते गए जिन के लाख करोरि ॥२७॥
जिनके पास लाखों-करोड़ों रुपए थे, वे भी नंगे पॉव चले गए हैं।॥ २७॥
ਕਬੀਰ ਇਹੁ ਤਨੁ ਜਾਇਗਾ ਕਵਨੈ ਮਾਰਗਿ ਲਾਇ ॥
कबीर इहु तनु जाइगा कवनै मारगि लाइ ॥
कबीर जी उद्बोधन करते हैं- यह तन नाशवान् है, इसे किसी अच्छे रास्ते पर जरूर लगाओ
ਕੈ ਸੰਗਤਿ ਕਰਿ ਸਾਧ ਕੀ ਕੈ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੨੮॥
कै संगति करि साध की कै हरि के गुन गाइ ॥२८॥
या तो साधु पुरुषों की संगत करो या फिर भगवान का गुणगान करो॥ २८॥
ਕਬੀਰ ਮਰਤਾ ਮਰਤਾ ਜਗੁ ਮੂਆ ਮਰਿ ਭੀ ਨ ਜਾਨਿਆ ਕੋਇ ॥
कबीर मरता मरता जगु मूआ मरि भी न जानिआ कोइ ॥
हे कबीर ! मरता-मरता संसार मर रहा है, लेकिन कोई भी मरने का भेद नहीं जानता।