ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇਆ ॥
तुधु आपे आपु उपाइआ ॥
हे भगवान ! तुमने स्वयं ही सृष्टि की रचना की है
ਦੂਜਾ ਖੇਲੁ ਕਰਿ ਦਿਖਲਾਇਆ ॥
दूजा खेलु करि दिखलाइआ ॥
और जगत् रूपी खेल को साज कर प्रत्यक्ष किया है।
ਸਭੁ ਸਚੋ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੈ ਬੁਝਾਇ ਜੀਉ ॥੨੦॥
सभु सचो सचु वरतदा जिसु भावै तिसै बुझाइ जीउ ॥२०॥
समस्त स्थानों पर सत्य प्रभु के सत्य हुक्म का प्रसार हो रहा है, किन्तु उसके मूल रहस्य को वही समझता है जिसे तुम समझाते हो ॥२०॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਾਇਆ ॥
गुर परसादी पाइआ ॥
गुरु की कृपा से जिसने भगवान को पा लिया है,
ਤਿਥੈ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
तिथै माइआ मोहु चुकाइआ ॥
भगवान ने उसका माया का मोह नष्ट कर दिया है।
ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਆਪਣੀ ਆਪੇ ਲਏ ਸਮਾਇ ਜੀਉ ॥੨੧॥
किरपा करि कै आपणी आपे लए समाइ जीउ ॥२१॥
अपनी कृपा करके वह स्वयं अपने साथ मिला लेता है ॥ २१॥
ਗੋਪੀ ਨੈ ਗੋਆਲੀਆ ॥
गोपी नै गोआलीआ ॥
हे प्रभु ! तुम ही गोपी हो, तुम ही यमुना हो,
ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਗੋਇ ਉਠਾਲੀਆ ॥
तुधु आपे गोइ उठालीआ ॥
तुम ही कृष्ण हो। तूने ही कृष्ण रूप में गोवर्धन पर्वत अपनी उंगली पर उठाया था।
ਹੁਕਮੀ ਭਾਂਡੇ ਸਾਜਿਆ ਤੂੰ ਆਪੇ ਭੰਨਿ ਸਵਾਰਿ ਜੀਉ ॥੨੨॥
हुकमी भांडे साजिआ तूं आपे भंनि सवारि जीउ ॥२२॥
तूने ही अपने हृदय में जीवों के शरीर रूपी बर्तन निर्मित किए हैं। तुम स्वयं ही इन शरीर रूपी बर्तनों को नष्ट करते एवं निर्माण करते हो ॥२२॥
ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥
जिन्होंने अपना चित सतिगुरु से लगाया है,
ਤਿਨੀ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਚੁਕਾਇਆ ॥
तिनी दूजा भाउ चुकाइआ ॥
उन्होंने माया का मोह दूर कर दिया है।
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਤਿਨ ਪ੍ਰਾਣੀਆ ਓਇ ਚਲੇ ਜਨਮੁ ਸਵਾਰਿ ਜੀਉ ॥੨੩॥
निरमल जोति तिन प्राणीआ ओइ चले जनमु सवारि जीउ ॥२३॥
ऐसे प्राणियों की ज्योति निर्मल हो जाती है। वह अपने जीवन को संवार कर परलोक में जाते हैं। ॥२३॥
ਤੇਰੀਆ ਸਦਾ ਸਦਾ ਚੰਗਿਆਈਆ ॥
तेरीआ सदा सदा चंगिआईआ ॥
हे भगवान ! तुम हमेशा ही मुझ पर उपकार करते रहते हो।
ਮੈ ਰਾਤਿ ਦਿਹੈ ਵਡਿਆਈਆਂ ॥
मै राति दिहै वडिआईआं ॥
ਅਣਮੰਗਿਆ ਦਾਨੁ ਦੇਵਣਾ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਸਮਾਲਿ ਜੀਉ ॥੨੪॥੧॥
अणमंगिआ दानु देवणा कहु नानक सचु समालि जीउ ॥२४॥१॥
तू इतना दयालु है कि बिना मांगे ही जीवों को दान देता रहता है। हे नानक ! हमेशा ही भगवान का सिमरन करते रहूँ ॥२४॥१॥
ਸਿਰੀਰਾਗੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सिरीरागु महला ५ ॥
श्रीरागु महला ५ ॥
ਪੈ ਪਾਇ ਮਨਾਈ ਸੋਇ ਜੀਉ ॥
पै पाइ मनाई सोइ जीउ ॥
मैं सतिगुरु के चरणों में पड़कर मन्नत करता हूँ ,
ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖਿ ਮਿਲਾਇਆ ਤਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सतिगुर पुरखि मिलाइआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
क्योंकि महापुरुष सतिगुरु ने मुझे उस ईश्वर से मिला दिया है। उस जैसा महान् जगत् में अन्य कोई भी नहीं ॥१॥ रहाउ॥
ਗੋਸਾਈ ਮਿਹੰਡਾ ਇਠੜਾ ॥
गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥
मेरा मालिक प्रभु मुझे बहुत प्रिय है।
ਅੰਮ ਅਬੇ ਥਾਵਹੁ ਮਿਠੜਾ ॥
अम अबे थावहु मिठड़ा ॥
वह माता और पिता से बहुत मीठा लगता है।
ਭੈਣ ਭਾਈ ਸਭਿ ਸਜਣਾ ਤੁਧੁ ਜੇਹਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ਜੀਉ ॥੧॥
भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥
हे प्रभु ! बहन-भाई, मित्रादि स्वजनों में तुम्हारे जैसा अन्य कोई नहीं ॥१॥
ਤੇਰੈ ਹੁਕਮੇ ਸਾਵਣੁ ਆਇਆ ॥
भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥
हे प्रभु ! बहन-भाई, मित्रादि स्वजनों में तुम्हारे जैसा अन्य कोई नहीं ॥१॥
ਮੈ ਸਤ ਕਾ ਹਲੁ ਜੋਆਇਆ ॥
तेरै हुकमे सावणु आइआ ॥
तुम्हारे आदेश से श्रावण का महीना आया है।
ਨਾਉ ਬੀਜਣ ਲਗਾ ਆਸ ਕਰਿ ਹਰਿ ਬੋਹਲ ਬਖਸ ਜਮਾਇ ਜੀਉ ॥੨॥
मै सत का हलु जोआइआ ॥
तुम्हारी प्रसन्नता हेतु मैंने सत्य का हल जोड़ा है।
ਹਉ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਇਕੁ ਪਛਾਣਦਾ ॥
नाउ बीजण लगा आस करि हरि बोहल बखस जमाइ जीउ ॥२॥
इस आशा में कि ईश्वर, अपनी कृपा से दातों का अम्बार उत्पन्न करेगा, मैं नाम बीज बोने लगा हूँ॥२॥
ਦੁਯਾ ਕਾਗਲੁ ਚਿਤਿ ਨ ਜਾਣਦਾ ॥
दुया कागलु चिति न जाणदा ॥
मैं अपने मन के अन्दर किसी अन्य हिसाब को नहीं जानता हूँ।
ਹਰਿ ਇਕਤੈ ਕਾਰੈ ਲਾਇਓਨੁ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਂਵੈ ਨਿਬਾਹਿ ਜੀਉ ॥੩॥
हरि इकतै कारै लाइओनु जिउ भावै तिंवै निबाहि जीउ ॥३॥
ईश्वर ने एक कार्य मेरी जिम्मेदारी में लगाया है, जिस तरह उसको अच्छा लगता है, उसी तरह मैं उसको सम्पन्न करता हूँ॥३॥
ਤੁਸੀ ਭੋਗਿਹੁ ਭੁੰਚਹੁ ਭਾਈਹੋ ॥
तुसी भोगिहु भुंचहु भाईहो ॥
हे मेरे भाईयो ! आप नाम पदार्थ सेवन करो एवं आनंद मानो।
ਗੁਰਿ ਦੀਬਾਣਿ ਕਵਾਇ ਪੈਨਾਈਓ ॥
गुरि दीबाणि कवाइ पैनाईओ ॥
परमेश्वर के दरबार में गुरदेव ने मुझे भक्ति रूपी पोशाक भेंटकर प्रतिष्ठा प्रदान की है।
ਹਉ ਹੋਆ ਮਾਹਰੁ ਪਿੰਡ ਦਾ ਬੰਨਿ ਆਦੇ ਪੰਜਿ ਸਰੀਕ ਜੀਉ ॥੪॥
हउ होआ माहरु पिंड दा बंनि आदे पंजि सरीक जीउ ॥४॥
मैं शरीर रूपी गांव का स्वामी हो गया हूँ और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि अपने पांचों शरीकों को मैंने बांध लिया है॥४॥
ਹਉ ਆਇਆ ਸਾਮ੍ਹ੍ਹੈ ਤਿਹੰਡੀਆ ॥
हउ आइआ साम्है तिहंडीआ ॥
हे प्रभु ! जब से मैंने तेरी शरण ली है।
ਪੰਜਿ ਕਿਰਸਾਣ ਮੁਜੇਰੇ ਮਿਹਡਿਆ ॥
पंजि किरसाण मुजेरे मिहडिआ ॥
तब से मेरी पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ मेरे सेवकों की भाँति मेरी आज्ञा में रहती हैं।
ਕੰਨੁ ਕੋਈ ਕਢਿ ਨ ਹੰਘਈ ਨਾਨਕ ਵੁਠਾ ਘੁਘਿ ਗਿਰਾਉ ਜੀਉ ॥੫॥
कंनु कोई कढि न हंघई नानक वुठा घुघि गिराउ जीउ ॥५॥
मेरे खिलाफ अब कोई कान (सिर) उठाने का साहस नहीं कर सकता। हे नानक ! इसलिए शरीर रूपी गांव आध्यात्मिक सम्पदा की सघनता से बस गया है॥५॥
ਹਉ ਵਾਰੀ ਘੁੰਮਾ ਜਾਵਦਾ ॥
हउ वारी घुमा जावदा ॥
हे मेरे प्रभु! मैं तुझ पर बलिहार हूँ, कुर्बान हूँ,”
ਇਕ ਸਾਹਾ ਤੁਧੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥
इक साहा तुधु धिआइदा ॥
श्वास-श्वास मैं तुम्हारा ही नाम जपता हूँ।
ਉਜੜੁ ਥੇਹੁ ਵਸਾਇਓ ਹਉ ਤੁਧ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ਜੀਉ ॥੬॥
उजड़ु थेहु वसाइओ हउ तुध विटहु कुरबाणु जीउ ॥६॥
मेरा मन ऊजड़-गांव (गुण-रहित) की भाँति था, तुमने उसे बसा दिया है, इसलिए मैं तुझ पर बलिहार जाता हूँ॥६॥
ਹਰਿ ਇਠੈ ਨਿਤ ਧਿਆਇਦਾ ॥
हरि इठै नित धिआइदा ॥
हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तेरा मैं सदैव ही सिमरन करता हूँ
ਮਨਿ ਚਿੰਦੀ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇਦਾ ॥
मनि चिंदी सो फलु पाइदा ॥
और जैसी मेरी अभिलाषा थी मेरी वह कामना पूरी हो गई है।
ਸਭੇ ਕਾਜ ਸਵਾਰਿਅਨੁ ਲਾਹੀਅਨੁ ਮਨ ਕੀ ਭੁਖ ਜੀਉ ॥੭॥
सभे काज सवारिअनु लाहीअनु मन की भुख जीउ ॥७॥
तुमने मेरे समस्त कार्य संवार दिए हैं और मेरी आत्मा की भूख निवृत्त कर दी है॥७॥
ਮੈ ਛਡਿਆ ਸਭੋ ਧੰਧੜਾ ॥
मै छडिआ सभो धंधड़ा ॥
मैंने संसार के मिथ्या कार्य त्याग दिए हैं।
ਗੋਸਾਈ ਸੇਵੀ ਸਚੜਾ ॥
गोसाई सेवी सचड़ा ॥
मैं सृष्टि के स्वामी की आराधना करता हूँ।
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹਰਿ ਮੈ ਪਲੈ ਬਧਾ ਛਿਕਿ ਜੀਉ ॥੮॥
नउ निधि नामु निधानु हरि मै पलै बधा छिकि जीउ ॥८॥
नवनिधि को देने में समर्थ कल्पवृक्ष-समान हरिनाम मुझे मिला है, जिसे बड़े यत्न से मैंने अन्तर्मन में संजोया हुआ है।॥८॥
ਮੈ ਸੁਖੀ ਹੂੰ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
मै सुखी हूं सुखु पाइआ ॥
मैं बहुत सुखी हूँ चूंकि मैंने सुख प्राप्त कर लिया है।
ਗੁਰਿ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਵਸਾਇਆ ॥
गुरि अंतरि सबदु वसाइआ ॥
गुरु ने मेरे हृदय में भगवान का नाम बसा दिया है।
ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੁਰਖਿ ਵਿਖਾਲਿਆ ਮਸਤਕਿ ਧਰਿ ਕੈ ਹਥੁ ਜੀਉ ॥੯॥
सतिगुरि पुरखि विखालिआ मसतकि धरि कै हथु जीउ ॥९॥
सतिगुरु ने मेरे माथे पर हाथ रखकर अर्थात् आशीर्वाद देकर मुझे भगवान के साक्षात् दर्शन करवा दिए हैं॥९ ॥
ਮੈ ਬਧੀ ਸਚੁ ਧਰਮ ਸਾਲ ਹੈ ॥
मै बधी सचु धरम साल है ॥
मैंने सच्चाई के मन्दिर की धर्मशाला बनाई है।
ਗੁਰਸਿਖਾ ਲਹਦਾ ਭਾਲਿ ਕੈ ॥
गुरसिखा लहदा भालि कै ॥
गुरु के शिष्यों को ढूंढ कर मैं यहाँ पर लेकर आया हूँ।
ਪੈਰ ਧੋਵਾ ਪਖਾ ਫੇਰਦਾ ਤਿਸੁ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਗਾ ਪਾਇ ਜੀਉ ॥੧੦॥
पैर धोवा पखा फेरदा तिसु निवि निवि लगा पाइ जीउ ॥१०॥
मैं उनके चरण धोता हूँ, पंखा झुलाता और विनम्रतापूर्वक झुक-झुककर उनके चरण स्पर्श करता हूं॥१०॥