Hindi Page 261

ਓਰੈ ਕਛੂ ਨ ਕਿਨਹੂ ਕੀਆ ॥
ओरै कछू न किनहू कीआ ॥
यहाँ (इहलोक में) किसी ने कुछ भी स्वयं सम्पूर्ण नहीं किया।

ਨਾਨਕ ਸਭੁ ਕਛੁ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੂਆ ॥੫੧॥
नानक सभु कछु प्रभ ते हूआ ॥५१॥
हे नानक ! प्रभु ने ही यह सृष्टि रचना की हुई है॥ ५१॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक॥

ਲੇਖੈ ਕਤਹਿ ਨ ਛੂਟੀਐ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਭੂਲਨਹਾਰ ॥
लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥
हे नानक ! यदि हम जीवों के कर्मों का हिसाब किया जाए तो हमें मुक्ति नहीं मिल सकती, क्योंकि हम हर समय भूल ही करते रहते हैं।

ਬਖਸਨਹਾਰ ਬਖਸਿ ਲੈ ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰ ॥੧॥
बखसनहार बखसि लै नानक पारि उतार ॥१॥
हे क्षमाशील ईश्वर ! तुम स्वयं ही हमारी भूल क्षमा करके हमें भवसागर से पार कर दो ॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਲੂਣ ਹਰਾਮੀ ਗੁਨਹਗਾਰ ਬੇਗਾਨਾ ਅਲਪ ਮਤਿ ॥
लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥
मूर्ख एवं अल्पबुद्धि वाला जीव नमकहराम एवं गुनहगार है।

ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸੁਖ ਦੀਏ ਤਾਹਿ ਨ ਜਾਨਤ ਤਤ ॥
जीउ पिंडु जिनि सुख दीए ताहि न जानत तत ॥
जिस प्रभु ने उसे यह आत्मा, शरीर एवं सुख प्रदान किया है, उससे वह अपरिचित ही रहता है, उसे पहचानता ही नहीं।

ਲਾਹਾ ਮਾਇਆ ਕਾਰਨੇ ਦਹ ਦਿਸਿ ਢੂਢਨ ਜਾਇ ॥
लाहा माइआ कारने दह दिसि ढूढन जाइ ॥
माया की खातिर वह दसों दिशाओं में खोज करने हेतु जाता है

ਦੇਵਨਹਾਰ ਦਾਤਾਰ ਪ੍ਰਭ ਨਿਮਖ ਨ ਮਨਹਿ ਬਸਾਇ ॥
देवनहार दातार प्रभ निमख न मनहि बसाइ ॥
लेकिन सब कुछ देने वाले दाता-प्रभु को वह क्षण भर के लिए भी अपने हृदय में नहीं बसाता।

ਲਾਲਚ ਝੂਠ ਬਿਕਾਰ ਮੋਹ ਇਆ ਸੰਪੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
लालच झूठ बिकार मोह इआ स्मपै मन माहि ॥
लालच, झूठ, विकार एवं सांसारिक मोह इनको वह अपने हृदय में एकत्र करता है।

ਲੰਪਟ ਚੋਰ ਨਿੰਦਕ ਮਹਾ ਤਿਨਹੂ ਸੰਗਿ ਬਿਹਾਇ ॥
ल्मपट चोर निंदक महा तिनहू संगि बिहाइ ॥
जो बड़े विषयी, तस्कर एवं निन्दक हैं, उनके साथ वह अपना जीवन व्यतीत करता है।

ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਖੋਟੇ ਸੰਗਿ ਖਰੇ ॥
तुधु भावै ता बखसि लैहि खोटे संगि खरे ॥
हे परमात्मा ! यदि तुझे उपयुक्त लगे तो तुम स्वयं ही बुरे लोगों को भले लोगों की संगति में रखकर क्षमा कर देते हो।

ਨਾਨਕ ਭਾਵੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਾਹਨ ਨੀਰਿ ਤਰੇ ॥੫੨॥
नानक भावै पारब्रहम पाहन नीरि तरे ॥५२॥
हे नानक ! यदि पारब्रह्म प्रभु को उपयुक्त लगे तो पत्थर भी जल में तैरने लग जाता है॥ ५२ ॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक ॥

ਖਾਤ ਪੀਤ ਖੇਲਤ ਹਸਤ ਭਰਮੇ ਜਨਮ ਅਨੇਕ ॥
खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥
नानक का कथन है कि हे ईश्वर ! हम प्राणी माया से संबंधित पदार्थ ही खाते-पीते एवं माया के विलासों में ही हंसते-खेलते कितनी ही योनियों में भटकते आ रहे हैं।

ਭਵਜਲ ਤੇ ਕਾਢਹੁ ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਨਕ ਤੇਰੀ ਟੇਕ ॥੧॥
भवजल ते काढहु प्रभू नानक तेरी टेक ॥१॥
हे प्रभु ! हम जीवों को भवसागर से बाहर निकाल, क्योंकि हमें तो तेरा ही सहारा है॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਖੇਲਤ ਖੇਲਤ ਆਇਓ ਅਨਿਕ ਜੋਨਿ ਦੁਖ ਪਾਇ 
खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥
जीव माया के विलासों में मन लगाता, अनगिनत योनियों से गुजरता हुआ, दु:ख सहन करता आता है।

ਖੇਦ ਮਿਟੇ ਸਾਧੂ ਮਿਲਤ ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਸਮਾਇ ॥
खेद मिटे साधू मिलत सतिगुर बचन समाइ ॥
संतों को मिलने एवं सतिगुरु के उपदेश में लीन होने से दुःख-क्लेश नष्ट हो जाते हैं।

ਖਿਮਾ ਗਹੀ ਸਚੁ ਸੰਚਿਓ ਖਾਇਓ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮ ॥
खिमा गही सचु संचिओ खाइओ अम्रितु नाम ॥
सहनशीलता को धारण करने और सत्य को एकत्र करने से मनुष्य नाम रूपी अमृत का सेवन करता है।

ਖਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਠਾਕੁਰ ਭਈ ਅਨਦ ਸੂਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
खरी क्रिपा ठाकुर भई अनद सूख बिस्राम ॥
जब प्रभु अपनी कृपा करता है तो हमें आनन्द एवं प्रसन्नता में सुख का निवास मिल जाता है।

ਖੇਪ ਨਿਬਾਹੀ ਬਹੁਤੁ ਲਾਭ ਘਰਿ ਆਏ ਪਤਿਵੰਤ ॥
खेप निबाही बहुतु लाभ घरि आए पतिवंत ॥
जिस पुरुष ने (गुरु जी से विधि सीखकर गुणस्तुति का) व्यापार समस्त आयु निभाया, उसने लाभ प्राप्त किया है, और वह (दुविधा से बचकर) आदर-सत्कार पाता है।

ਖਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ਆਇ ਮਿਲੇ ਭਗਵੰਤ ॥
खरा दिलासा गुरि दीआ आइ मिले भगवंत ॥
गुरु ने उसे भारी धैर्य प्रदान किया है और वह भगवान के चरणों में मिला है।

ਆਪਨ ਕੀਆ ਕਰਹਿ ਆਪਿ ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਆਪਿ ॥
आपन कीआ करहि आपि आगै पाछै आपि ॥
हे ईश्वर ! यह सारी लीला तूने ही रची है, अब भी तुम स्वयं ही सब कुछ कर रहे हो। लोक-परलोक में प्राणियों के रक्षक तुम स्वयं हो।

ਨਾਨਕ ਸੋਊ ਸਰਾਹੀਐ ਜਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਹਿਆ ਬਿਆਪਿ ॥੫੩॥
नानक सोऊ सराहीऐ जि घटि घटि रहिआ बिआपि ॥५३॥
हे नानक ! केवल उस भगवान की महिमा-स्तुति करते रहो, जो प्रत्येक हृदय में समाया हुआ है॥ ५३॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक ॥

ਆਏ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਾਗਤੀ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਦਇਆਲ ॥
आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥
हे कृपा के भण्डार, हे दया के घर प्रभु ! हम जीव तुम्हारी ही शरण में आए हैं।

ਏਕ ਅਖਰੁ ਹਰਿ ਮਨਿ ਬਸਤ ਨਾਨਕ ਹੋਤ ਨਿਹਾਲ ॥੧॥
एक अखरु हरि मनि बसत नानक होत निहाल ॥१॥
हे नानक ! जिस व्यक्ति के अन्तर्मन में एक अनश्वर परमात्मा मौजूद है, वह कृतार्थ हो जाता है॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥

ਅਖਰ ਮਹਿ ਤ੍ਰਿਭਵਨ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੇ ॥
अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥
तीनों लोकों की रचना ईश्वर ने अपने हुक्म में की है।

ਅਖਰ ਕਰਿ ਕਰਿ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੇ ॥
अखर करि करि बेद बीचारे ॥
ईश्वर के हुक्मानुसार वेद रचे गए और अध्ययन किए गए।

ਅਖਰ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਪੁਰਾਨਾ ॥
अखर सासत्र सिम्रिति पुराना ॥
समस्त शास्त्र, स्मृतियां एवं पुराण भगवान के हुक्म का प्रकट रूप हैं।

ਅਖਰ ਨਾਦ ਕਥਨ ਵਖੵਾਨਾ ॥
अखर नाद कथन वख्याना ॥
इन पुराणों, शास्त्रों एवं स्मृतियों के भजन, कथन एवं व्याख्या भी भगवान के हुक्म का ही प्रकाश है।

ਅਖਰ ਮੁਕਤਿ ਜੁਗਤਿ ਭੈ ਭਰਮਾ ॥
अखर मुकति जुगति भै भरमा ॥
संसार के भय एवं दुविधा से मुक्ति पाना भी भगवान के हुक्म का प्रकाश है।

ਅਖਰ ਕਰਮ ਕਿਰਤਿ ਸੁਚ ਧਰਮਾ ॥
अखर करम किरति सुच धरमा ॥
धार्मिक संस्कारों, सांसारिक कर्मो, पवित्रता एवं धर्म का वर्णन भी भगवान का हुक्म हैं।

ਦ੍ਰਿਸਟਿਮਾਨ ਅਖਰ ਹੈ ਜੇਤਾ ॥
द्रिसटिमान अखर है जेता ॥
हे नानक ! जितना भी यह दृष्टिगोचर जगत् है,

ਨਾਨਕ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰਲੇਪਾ ॥੫੪॥
नानक पारब्रहम निरलेपा ॥५४॥
इसमें अनश्वर प्रभु का हुक्म सक्रिय है, फिर भी पारब्रह्म प्रभु निर्लिप्त है॥ ५४॥

ਸਲੋਕੁ ॥
सलोकु ॥
श्लोक ॥

ਹਥਿ ਕਲੰਮ ਅਗੰਮ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਾਵਤੀ ॥
हथि कलम अगम मसतकि लिखावती ॥
उस अगम्य ईश्वर के हाथ में (हुक्म-रूपी) कलम है। वह समस्त जीवों के मस्तक पर कर्मों के अनुसार भाग्य लिख रहा है।

ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਸਭ ਸੰਗਿ ਅਨੂਪ ਰੂਪਾਵਤੀ ॥
उरझि रहिओ सभ संगि अनूप रूपावती ॥
अनूप सुन्दरता वाला प्रभु समस्त प्राणियों के साथ मिला हुआ है।

ਉਸਤਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਮੁਖਹੁ ਤੁਹਾਰੀਆ ॥
उसतति कहनु न जाइ मुखहु तुहारीआ ॥
नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तेरी महिमा मैं अपने मुख से व्यक्त नहीं कर सकता।

ਮੋਹੀ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥੧॥
मोही देखि दरसु नानक बलिहारीआ ॥१॥
तेरे दर्शन करके मैं मुग्ध हो गया हूँ और तुझ पर न्योछावर हो रहा हूँ॥ १॥

ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥

ਹੇ ਅਚੁਤ ਹੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਘਨਾਸ ॥
हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥
नानक का कथन है कि हे अच्युत ! हे परब्रह्म ! हे अविनाशी ! हे पापनाशक !

ਹੇ ਪੂਰਨ ਹੇ ਸਰਬ ਮੈ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਗੁਣਤਾਸ ॥
हे पूरन हे सरब मै दुख भंजन गुणतास ॥
हे सर्वव्यापक ! हे दुःखनाशक ! हे गुणों के भण्डार !

ਹੇ ਸੰਗੀ ਹੇ ਨਿਰੰਕਾਰ ਹੇ ਨਿਰਗੁਣ ਸਭ ਟੇਕ ॥
हे संगी हे निरंकार हे निरगुण सभ टेक ॥
हे निरंकार प्रभु ! हे निर्गुण ! हे समस्त प्राणियों के सहारे !

ਹੇ ਗੋਬਿਦ ਹੇ ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਜਾ ਕੈ ਸਦਾ ਬਿਬੇਕ ॥
हे गोबिद हे गुण निधान जा कै सदा बिबेक ॥
हे गोबिन्द ! हे गुणों के खजाने ! तेरे पास सदैव विवेक है।

ਹੇ ਅਪਰੰਪਰ ਹਰਿ ਹਰੇ ਹਹਿ ਭੀ ਹੋਵਨਹਾਰ ॥
हे अपर्मपर हरि हरे हहि भी होवनहार ॥
हे अपरम्पार प्रभु ! तुम अब भी मौजूद हो, तुम सदा सत्यस्वरूप हो।

ਹੇ ਸੰਤਹ ਕੈ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਨਿਧਾਰਾ ਆਧਾਰ ॥
हे संतह कै सदा संगि निधारा आधार ॥
हे संतों के सदा सहायक ! तू ही निराश्रितो का आश्रय है।

ਹੇ ਠਾਕੁਰ ਹਉ ਦਾਸਰੋ ਮੈ ਨਿਰਗੁਨ ਗੁਨੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥
हे ठाकुर हउ दासरो मै निरगुन गुनु नही कोइ ॥
हे ठाकुर ! मैं तेरा छोटा-सा (निम्न) सेवक हूँ। मैं गुणविहीन हूँ, मुझ में कोई भी गुण मौजूद नहीं।

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