ਸੰਕਟਿ ਨਹੀ ਪਰੈ ਜੋਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਜਾ ਕੋ ਰੇ ॥
संकटि नही परै जोनि नही आवै नामु निरंजन जा को रे ॥
हे जिज्ञासु ! सत्य यही है कि जिस भगवान का नाम निरंजन है, वह संकट में नहीं पड़ता और न ही कोई योनि धारण करता है।
ਕਬੀਰ ਕੋ ਸੁਆਮੀ ਐਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਜਾ ਕੈ ਮਾਈ ਨ ਬਾਪੋ ਰੇ ॥੨॥੧੯॥੭੦॥
कबीर को सुआमी ऐसो ठाकुरु जा कै माई न बापो रे ॥२॥१९॥७०॥
कबीर का स्वामी ऐसा ठाकुर है, जिसकी न कोई माता है और न ही पिता है ॥ २ ॥ १६॥ ७o ॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਨਿੰਦਉ ਨਿੰਦਉ ਮੋ ਕਉ ਲੋਗੁ ਨਿੰਦਉ ॥
निंदउ निंदउ मो कउ लोगु निंदउ ॥
हे निन्दा करने वाले लोगो ! तुम लोग निन्दक बनकर जितनी चाहे मेरी निन्दा करो।
ਨਿੰਦਾ ਜਨ ਕਉ ਖਰੀ ਪਿਆਰੀ ॥
निंदा जन कउ खरी पिआरी ॥
मुझ प्रभु के सेवक को निन्दा बड़ी मीठी एवं प्यारी लगती है।
ਨਿੰਦਾ ਬਾਪੁ ਨਿੰਦਾ ਮਹਤਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
निंदा बापु निंदा महतारी ॥१॥ रहाउ ॥
निन्दा मेरा पिता है और निन्दा ही मेरी माता है॥ १॥ रहाउ॥
ਨਿੰਦਾ ਹੋਇ ਤ ਬੈਕੁੰਠਿ ਜਾਈਐ ॥
निंदा होइ त बैकुंठि जाईऐ ॥
यदि लोग मेरी निन्दा करें तो ही मैं स्वर्ग जा सकता हूँ और
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਮਨਹਿ ਬਸਾਈਐ ॥
नामु पदारथु मनहि बसाईऐ ॥
प्रभु का नाम रूपी धन मेरे मन में बस सकता है।
ਰਿਦੈ ਸੁਧ ਜਉ ਨਿੰਦਾ ਹੋਇ ॥
रिदै सुध जउ निंदा होइ ॥
यदि हृदय शुद्ध होते हुए हमारी निन्दा हो तो
ਹਮਰੇ ਕਪਰੇ ਨਿੰਦਕੁ ਧੋਇ ॥੧॥
हमरे कपरे निंदकु धोइ ॥१॥
निंदक हमारे कपड़े धोता है अर्थात् हमें पवित्र करने में सहयोग देता है॥ १॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰੈ ਸੁ ਹਮਰਾ ਮੀਤੁ ॥
निंदा करै सु हमरा मीतु ॥
जो मनुष्य हमारी निन्दा करता है, वह हमारा मित्र है,
ਨਿੰਦਕ ਮਾਹਿ ਹਮਾਰਾ ਚੀਤੁ ॥
निंदक माहि हमारा चीतु ॥
क्योंकि हमारी वृति अपने निंदक पर रहती है।
ਨਿੰਦਕੁ ਸੋ ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਹੋਰੈ ॥
निंदकु सो जो निंदा होरै ॥
हमारा निंदक मनुष्य वह है जो हमारी बुराइयों को नष्ट होने से विराम लगाता है।
ਹਮਰਾ ਜੀਵਨੁ ਨਿੰਦਕੁ ਲੋਰੈ ॥੨॥
हमरा जीवनु निंदकु लोरै ॥२॥
अपितु निंदक से तो हमारा जीवन भला बनता है। २॥
ਨਿੰਦਾ ਹਮਰੀ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ॥
निंदा हमरी प्रेम पिआरु ॥
मैं उससे प्रेम एवं स्नेह करता हूँ, जो मेरी निन्दा करता है।
ਨਿੰਦਾ ਹਮਰਾ ਕਰੈ ਉਧਾਰੁ ॥
निंदा हमरा करै उधारु ॥
निन्दा हमारा उद्धार करती है।
ਜਨ ਕਬੀਰ ਕਉ ਨਿੰਦਾ ਸਾਰੁ ॥
जन कबीर कउ निंदा सारु ॥
दास कबीर के लिए तो उसके अवगुणों का नाश होना सर्वोत्तम बात है।
ਨਿੰਦਕੁ ਡੂਬਾ ਹਮ ਉਤਰੇ ਪਾਰਿ ॥੩॥੨੦॥੭੧॥
निंदकु डूबा हम उतरे पारि ॥३॥२०॥७१॥
परन्तु निंदक (दूसरों की निन्दा करता स्वयं अवगुणों में) डूब जाता है और हम (अवगुणों से सचेत होकर) बच जाते हैं।॥ ३॥ २०॥ ७१॥
ਰਾਜਾ ਰਾਮ ਤੂੰ ਐਸਾ ਨਿਰਭਉ ਤਰਨ ਤਾਰਨ ਰਾਮ ਰਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राजा राम तूं ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥१॥ रहाउ ॥
हे मेरे राजा राम ! तू बहुत ही निडर है। हे स्वामी राम ! जीवों को भवसागर से पार करवाने के लिए तू एक नैया है॥ १॥ रहाउ ॥
ਜਬ ਹਮ ਹੋਤੇ ਤਬ ਤੁਮ ਨਾਹੀ ਅਬ ਤੁਮ ਹਹੁ ਹਮ ਨਾਹੀ ॥
जब हम होते तब तुम नाही अब तुम हहु हम नाही ॥
हे प्रभु ! (तेरा कुछ अदभुत ही स्वभाव है) जब मैं अभिमानी था तुम मुझ में नहीं थे। अब जब तुम मुझ में हो, मैं अभिमानी नहीं हूँ।
ਅਬ ਹਮ ਤੁਮ ਏਕ ਭਏ ਹਹਿ ਏਕੈ ਦੇਖਤ ਮਨੁ ਪਤੀਆਹੀ ॥੧॥
अब हम तुम एक भए हहि एकै देखत मनु पतीआही ॥१॥
हे प्रभु ! अब तुम और हम एकरूप हो गए हैं, अब तुम्हें देखकर हमारा मन कृतार्थ हो गया है॥ १॥
ਜਬ ਬੁਧਿ ਹੋਤੀ ਤਬ ਬਲੁ ਕੈਸਾ ਅਬ ਬੁਧਿ ਬਲੁ ਨ ਖਟਾਈ ॥
जब बुधि होती तब बलु कैसा अब बुधि बलु न खटाई ॥
“(हे स्वामी !) जब तक हम जीवों में अपनी बुद्धि (का अभिमान) होता है, तब तक हमारे भीतर कोई आत्मिक बल नहीं होता, लेकिन अब (जब तुम स्वयं हमारे भीतर प्रकट हुए हो) तब हमारी बुद्धि एवं बल का हमें अभिमान नहीं रहा।
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਬੁਧਿ ਹਰਿ ਲਈ ਮੇਰੀ ਬੁਧਿ ਬਦਲੀ ਸਿਧਿ ਪਾਈ ॥੨॥੨੧॥੭੨॥
कहि कबीर बुधि हरि लई मेरी बुधि बदली सिधि पाई ॥२॥२१॥७२॥
कबीर जी कहते हैं – (हे राम !) तुमने मेरी (अहंकारग्रस्त) बुद्धि छीन ली है, अब वह बदल गई है और सिद्धि प्राप्त हो गई है। २॥ २१ ॥ ७२॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਖਟ ਨੇਮ ਕਰਿ ਕੋਠੜੀ ਬਾਂਧੀ ਬਸਤੁ ਅਨੂਪੁ ਬੀਚ ਪਾਈ ॥
खट नेम करि कोठड़ी बांधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥
भगवान ने षट्चक्र बनाकर (मानव शरीर-रूपी) छोटा-सा घर बना दिया है और इसमें उसने (अपनी ज्योति-रूपी) अनुपम वस्तु रख दी है!
ਕੁੰਜੀ ਕੁਲਫੁ ਪ੍ਰਾਨ ਕਰਿ ਰਾਖੇ ਕਰਤੇ ਬਾਰ ਨ ਲਾਈ ॥੧॥
कुंजी कुलफु प्रान करि राखे करते बार न लाई ॥१॥
ताला और चाबी की भाँति प्राणों को उसका रक्षक बनाया गया है। इस खेल को करने में परमात्मा ने कोई देरी नहीं की॥ १॥
ਅਬ ਮਨ ਜਾਗਤ ਰਹੁ ਰੇ ਭਾਈ ॥
अब मन जागत रहु रे भाई ॥
हे भाई ! अब तू अपनी आत्मा को जाग्रत रख।
ਗਾਫਲੁ ਹੋਇ ਕੈ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਓ ਚੋਰੁ ਮੁਸੈ ਘਰੁ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गाफलु होइ कै जनमु गवाइओ चोरु मुसै घरु जाई ॥१॥ रहाउ ॥
क्योंकि लापरवाह होकर तूने अपना अनमोल मानव-जीवन गंवा दिया है। तेरा घर विकार रूपी चोर लूटते जा रहे हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਪੰਚ ਪਹਰੂਆ ਦਰ ਮਹਿ ਰਹਤੇ ਤਿਨ ਕਾ ਨਹੀ ਪਤੀਆਰਾ ॥
पंच पहरूआ दर महि रहते तिन का नही पतीआरा ॥
पाँच प्रहरी इस घर के द्वार पर पहरेदार खड़े हैं, परन्तु उन पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।
ਚੇਤਿ ਸੁਚੇਤ ਚਿਤ ਹੋਇ ਰਹੁ ਤਉ ਲੈ ਪਰਗਾਸੁ ਉਜਾਰਾ ॥੨॥
चेति सुचेत चित होइ रहु तउ लै परगासु उजारा ॥२॥
जब तक तुम अपने सुचेत मन में जागते हो, तुझे (प्रभु का) प्रकाश एवं उजाला प्राप्त होगा ॥ २ ॥
ਨਉ ਘਰ ਦੇਖਿ ਜੁ ਕਾਮਨਿ ਭੂਲੀ ਬਸਤੁ ਅਨੂਪ ਨ ਪਾਈ ॥
नउ घर देखि जु कामनि भूली बसतु अनूप न पाई ॥
जो जीव-स्त्री शरीर के नौ घरों को देखकर भटक जाती है, उसे ईश्वर के नाम की अनूप वस्तु प्राप्त नहीं होती।
ਕਹਤੁ ਕਬੀਰ ਨਵੈ ਘਰ ਮੂਸੇ ਦਸਵੈਂ ਤਤੁ ਸਮਾਈ ॥੩॥੨੨॥੭੩॥
कहतु कबीर नवै घर मूसे दसवैं ततु समाई ॥३॥२२॥७३॥=
कबीर जी कहते हैं-जब ये नौ ही बस यश में आ जाते हैं तो परमात्मा की ज्योति दसवें घर में समा जाती है॥ ३॥ २२ ॥ ७३ ॥
ਗਉੜੀ ॥
गउड़ी ॥
गउड़ी ॥
ਮਾਈ ਮੋਹਿ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨਿਓ ਆਨਾਨਾਂ ॥
माई मोहि अवरु न जानिओ आनानां ॥
हे मेरी माता! मैं भगवान के अलावा किसी दूसरे को नहीं जानता,
ਸਿਵ ਸਨਕਾਦਿ ਜਾਸੁ ਗੁਨ ਗਾਵਹਿ ਤਾਸੁ ਬਸਹਿ ਮੋਰੇ ਪ੍ਰਾਨਾਨਾਂ ॥ ਰਹਾਉ ॥
सिव सनकादि जासु गुन गावहि तासु बसहि मोरे प्रानानां ॥ रहाउ ॥
क्योंकि मेरे प्राण तो उस (भगवान) में बस रहे हैं, जिसका यश एवं महिमा शिव और सनकादिक भी गाते हैं।॥ रहाउ॥
ਹਿਰਦੇ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਗਿਆਨ ਗੁਰ ਗੰਮਿਤ ਗਗਨ ਮੰਡਲ ਮਹਿ ਧਿਆਨਾਨਾਂ ॥
हिरदे प्रगासु गिआन गुर गमित गगन मंडल महि धिआनानां ॥
गुरु को मिलने से ज्ञान का प्रकाश मेरे हृदय में प्रवेश कर गया है और मेरा ध्यान गगन मण्डल (दसम द्वार) में स्थिर हो गया है।
ਬਿਖੈ ਰੋਗ ਭੈ ਬੰਧਨ ਭਾਗੇ ਮਨ ਨਿਜ ਘਰਿ ਸੁਖੁ ਜਾਨਾਨਾ ॥੧॥
बिखै रोग भै बंधन भागे मन निज घरि सुखु जानाना ॥१॥
पाप का रोग, भय एवं दुनेिया के बन्धन दौड़ गए हैं और मेरी आत्मा ने अपने आत्मस्वरूप में ही सुख अनुभव कर लिया है॥ १॥
ਏਕ ਸੁਮਤਿ ਰਤਿ ਜਾਨਿ ਮਾਨਿ ਪ੍ਰਭ ਦੂਸਰ ਮਨਹਿ ਨ ਆਨਾਨਾ ॥
एक सुमति रति जानि मानि प्रभ दूसर मनहि न आनाना ॥
मेरी सुमति का प्रेम एक ईश्वर में ही बन गया है। एक ईश्वर को (सहारा) समझकर और उसमें विश्वस्त होकर किसी दूसरे को अब मन में नहीं लाता ।
ਚੰਦਨ ਬਾਸੁ ਭਏ ਮਨ ਬਾਸਨ ਤਿਆਗਿ ਘਟਿਓ ਅਭਿਮਾਨਾਨਾ ॥੨॥
चंदन बासु भए मन बासन तिआगि घटिओ अभिमानाना ॥२॥
मन की तृष्णाओं को त्यागकर चन्दन की सुगन्धि पैदा हो गई है और अहंकार मिट गया है॥ २॥
ਜੋ ਜਨ ਗਾਇ ਧਿਆਇ ਜਸੁ ਠਾਕੁਰ ਤਾਸੁ ਪ੍ਰਭੂ ਹੈ ਥਾਨਾਨਾਂ ॥
जो जन गाइ धिआइ जसु ठाकुर तासु प्रभू है थानानां ॥
जो व्यक्ति ठाकुर जी का यश गाता है, उसका ध्यान करता है, उसके हृदय में ईश्वर का निवास हो जाता है।
ਤਿਹ ਬਡ ਭਾਗ ਬਸਿਓ ਮਨਿ ਜਾ ਕੈ ਕਰਮ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮਥਾਨਾਨਾ ॥੩॥
तिह बड भाग बसिओ मनि जा कै करम प्रधान मथानाना ॥३॥
जिसके हृदय में ईश्वर बस गया, उसकी किस्मत समझो, उसके माथे पर उत्तम भाग्य प्रकट हो गया॥ ३॥
ਕਾਟਿ ਸਕਤਿ ਸਿਵ ਸਹਜੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਓ ਏਕੈ ਏਕ ਸਮਾਨਾਨਾ ॥
काटि सकति सिव सहजु प्रगासिओ एकै एक समानाना ॥
शक्ति का प्रभाव दूर करके प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो गया तो सदैव पवित्र एक ईश्वर में मन लीन रहता है।