ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੪॥੧॥
नानक नामु मिलै मनु मानिआ ॥४॥१॥
हे नानक ! उसे हरि-नाम मिल गया है और उसका मन तृप्त हो गया है ॥४॥१॥
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
धनासरी महला ३ ॥
धनासरी महला ३ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
हरि नामु धनु निरमलु अति अपारा ॥
हरि-नाम का धन अत्यंत निर्मल एवं अपंरपार है और
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
गुर कै सबदि भरे भंडारा ॥
गुरु के शब्द द्वारा मैंने इस धन के भण्डार भर लिए हैं।
ਨਾਮ ਧਨ ਬਿਨੁ ਹੋਰ ਸਭ ਬਿਖੁ ਜਾਣੁ ॥
नाम धन बिनु होर सभ बिखु जाणु ॥
नाम-धन के बिना अन्य सभी धन विष रूप समझो।
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜਲੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥੧॥
माइआ मोहि जलै अभिमानु ॥१॥
मनुष्य अभिमान में आकर माया के मोह की अग्नि में ही जलता रहता है।॥१॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖੈ ਕੋਇ ॥
गुरमुखि हरि रसु चाखै कोइ ॥
गुरु के माध्यम से कोई विरला ही हरि-रस को चखता है।
ਤਿਸੁ ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਹੋਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
तिसु सदा अनंदु होवै दिनु राती पूरै भागि परापति होइ ॥ रहाउ ॥
वह दिन-रात सदैव आनंद में रहता है और पूर्ण भाग्य से ही हरि-नाम की प्राप्ति होती है॥ रहाउ॥
ਸਬਦੁ ਦੀਪਕੁ ਵਰਤੈ ਤਿਹੁ ਲੋਇ ॥
सबदु दीपकु वरतै तिहु लोइ ॥
यह ब्रह्म-शब्द रूपी दीपक आकाश, पाताल एवं पृथ्वी-इन तीनों लोकों में ज्ञान रूपी प्रकाश कर रहा है।
ਜੋ ਚਾਖੈ ਸੋ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
जो चाखै सो निरमलु होइ ॥
जो मनुष्य इस को चखता है, वह पावन हो जाता है।
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮਿ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਧੋਇ ॥
निरमल नामि हउमै मलु धोइ ॥
यह पावन नाम मन की अहंकार रूपी मैल को स्वच्छ कर देता है।
ਸਾਚੀ ਭਗਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੨॥
साची भगति सदा सुखु होइ ॥२॥
भगवान की सच्ची भक्ति से मनुष्य सदैव ही सुखी रहता है।॥२॥
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖਿਆ ਸੋ ਹਰਿ ਜਨੁ ਲੋਗੁ ॥
जिनि हरि रसु चाखिआ सो हरि जनु लोगु ॥
जिसने हरि-रस को चख लिया है, वह हरि का सेवक बन गया है।
ਤਿਸੁ ਸਦਾ ਹਰਖੁ ਨਾਹੀ ਕਦੇ ਸੋਗੁ ॥
तिसु सदा हरखु नाही कदे सोगु ॥
उसे सदैव ही हर्ष बना रहता है और उसे कभी कोई चिन्ता नही होती।
ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਅਵਰਾ ਮੁਕਤੁ ਕਰਾਵੈ ॥
आपि मुकतु अवरा मुकतु करावै ॥
वह स्वयं माया के बन्धनों से मुक्त हो जाता है और दूसरों को भी मुक्त करवा लेता है।
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਹਰਿ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੩॥
हरि नामु जपै हरि ते सुखु पावै ॥३॥
वह हरि-नाम का भजन करता है और हरि से ही सुख प्राप्त करता है ॥३॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਭ ਮੁਈ ਬਿਲਲਾਇ ॥
बिनु सतिगुर सभ मुई बिललाइ ॥
गुरु के बिना सारी दुनिया दुखी हुई विलाप करती रहती है।
ਅਨਦਿਨੁ ਦਾਝਹਿ ਸਾਤਿ ਨ ਪਾਇ ॥
अनदिनु दाझहि साति न पाइ ॥
वह रात-दिन तृष्णा अग्नि में जलती रहती है और उसे शांति प्राप्त नहीं होती।
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸਭੁ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਾਏ ॥
सतिगुरु मिलै सभु त्रिसन बुझाए ॥
यद्यपि गुरु मिल जाए तो समस्त तृष्णा मिट जाती है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਾਂਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੪॥੨॥
नानक नामि सांति सुखु पाए ॥४॥२॥
हे नानक ! नाम के द्वारा ही सुख एवं शांति की प्राप्ति होती है ॥४॥२॥
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
धनासरी महला ३ ॥
धनासरी महला ३ ॥
ਸਦਾ ਧਨੁ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲੇ ॥
सदा धनु अंतरि नामु समाले ॥
जीव उसका नाम-सिमरन करते रहते हैं और यह नाम-धन सदैव जीव के हृदय में बसता है,”
ਜੀਅ ਜੰਤ ਜਿਨਹਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੇ ॥
जीअ जंत जिनहि प्रतिपाले ॥
जिस परमात्मा ने समस्त जीवों का पालन-पोषण किया है।
ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਤਿਨ ਕਉ ਪਾਏ ॥
मुकति पदारथु तिन कउ पाए ॥
प्रभु मुक्ति पदार्थ उनके दामन में ही डालता है
ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥੧॥
हरि कै नामि रते लिव लाए ॥१॥
जो मनुष्य हरि के नाम में लीन रहते और उसमें ही ध्यान लगाकर रखते हैं ॥१॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਪਾਵੈ ॥
गुर सेवा ते हरि नामु धनु पावै ॥
प्रत्येक मनुष्य गुरु की सेवा द्वारा हरि-नाम धन को प्राप्त करता है।
ਅੰਤਰਿ ਪਰਗਾਸੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
अंतरि परगासु हरि नामु धिआवै ॥ रहाउ ॥
जो हरि-नाम का ध्यान करता है, उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है॥ रहाउ॥
ਇਹੁ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਗੂੜਾ ਧਨ ਪਿਰ ਹੋਇ ॥
इहु हरि रंगु गूड़ा धन पिर होइ ॥
यह हरि-प्रेम का गहरा रंग प्रभु-पति की उस जीव-स्त्री पर ही चढ़ता है,
ਸਾਂਤਿ ਸੀਗਾਰੁ ਰਾਵੇ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
सांति सीगारु रावे प्रभु सोइ ॥
जो शांति को अपना श्रृंगार बनाती है।
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਪ੍ਰਭੁ ਕੋਇ ਨ ਪਾਏ ॥
हउमै विचि प्रभु कोइ न पाए ॥
कोई भी मनुष्य अहंकार में प्रभु को नहीं पा सकता और
ਮੂਲਹੁ ਭੁਲਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ॥੨॥
मूलहु भुला जनमु गवाए ॥२॥
वह अपने मूल प्रभु को भुला कर अपना जन्म व्यर्थ गंवा लेता है॥ २॥
ਗੁਰ ਤੇ ਸਾਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਬਾਣੀ ॥
गुर ते साति सहज सुखु बाणी ॥
शांति, आनंद एवं सुख देने वाली वाणी गुरु से ही प्राप्त होती है।
ਸੇਵਾ ਸਾਚੀ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੀ ॥
सेवा साची नामि समाणी ॥
गुरु की सच्ची सेवा करने से मन नाम में लीन हो जाता है।
ਸਬਦਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਸਦਾ ਧਿਆਏ ॥
सबदि मिलै प्रीतमु सदा धिआए ॥
जिस व्यक्ति को शब्द की उपलब्धि हो जाती है, वह सदैव अपने प्रियतम प्रभु का ही ध्यान करता रहता है।
ਸਾਚ ਨਾਮਿ ਵਡਿਆਈ ਪਾਏ ॥੩॥
साच नामि वडिआई पाए ॥३॥
इस तरह वह सत्य-नाम द्वारा प्रभु के दरबार पर शोभा प्राप्त करता है ॥३॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸੋਇ ॥
आपे करता जुगि जुगि सोइ ॥
वह कर्ता-परमेश्वर युग-युगांतरों में विद्यमान है।
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਮੇਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥
नदरि करे मेलावा होइ ॥
यदि वह अपनी करुणा-दृष्टि करे तो जीव का उससे मिलन होता है।
ਗੁਰਬਾਣੀ ਤੇ ਹਰਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
गुरबाणी ते हरि मंनि वसाए ॥
गुरुवाणी के द्वारा मनुष्य प्रभु को अपने मन में बसा लेता है।
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥੪॥੩॥
नानक साचि रते प्रभि आपि मिलाए ॥४॥३॥
हे नानक ! जो व्यक्ति सत्य के प्रेम में मग्न हो जाते हैं, प्रभु स्वयं ही उन्हें अपने साथ मिला लेता है ॥४॥३॥
ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੩ ਤੀਜਾ ॥
धनासरी महला ३ तीजा ॥
धनासरी महला ३ तीजा ॥
ਜਗੁ ਮੈਲਾ ਮੈਲੋ ਹੋਇ ਜਾਇ ॥ ਆਵੈ ਜਾਇ ਦੂਜੈ ਲੋਭਾਇ ॥
जगु मैला मैलो होइ जाइ ॥ आवै जाइ दूजै लोभाइ ॥
यह जगत अपवित्र है और जीव भी अपवित्र होते जाते हैं। द्वैतभाव में मुग्ध हुए वे जन्मते एवं मरते रहते हैं।
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਸਭ ਪਰਜ ਵਿਗੋਈ ॥
दूजै भाइ सभ परज विगोई ॥
द्वैतभाव में फँस कर सारी दुनिया ही बर्बाद हो गई है।
ਮਨਮੁਖਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ਅਪੁਨੀ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥੧॥
मनमुखि चोटा खाइ अपुनी पति खोई ॥१॥
मनमुख व्यक्ति चोटें खाता है और अपनी इज्जत गंवा लेता है ॥१॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਜਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
गुर सेवा ते जनु निरमलु होइ ॥
गुरु की सेवा से मनुष्य निर्मल हो जाता है,
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਪਤਿ ਊਤਮ ਹੋਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
अंतरि नामु वसै पति ऊतम होइ ॥ रहाउ ॥
उसके मन में नाम का निवास हो जाता है और उसकी इज्जत उत्तम हो जाती है॥ रहाउ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ॥
गुरमुखि उबरे हरि सरणाई ॥
गुरुमुख व्यक्ति भगवान की शरण में आने से भवसागर से पार हो गए हैं।
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਰਾਤੇ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਈ ॥
राम नामि राते भगति द्रिड़ाई ॥
राम के नाम में मग्न हुए वह मन में दृढ़ता से भक्ति करते हैं।
ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਜਨੁ ਵਡਿਆਈ ਪਾਏ ॥
भगति करे जनु वडिआई पाए ॥
भक्तजन तो भगवान की भक्ति करके ही यश प्राप्त करते हैं।
ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਸੁਖ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ॥੨॥
साचि रते सुख सहजि समाए ॥२॥
वे सत्य में रत रहकर सहज सुख में ही समा जाते हैं।॥ २॥
ਸਾਚੇ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਵਿਰਲਾ ਕੋ ਜਾਣੁ ॥
साचे का गाहकु विरला को जाणु ॥
सत्य-नाम का ग्राहक किसी विरले को ही जानो।
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣੁ ॥
गुर कै सबदि आपु पछाणु ॥
गुरु के शब्द द्वारा अपने आप की पहचान कर लो।
ਸਾਚੀ ਰਾਸਿ ਸਾਚਾ ਵਾਪਾਰੁ ॥
साची रासि साचा वापारु ॥
हरि-नाम की राशि सत्य है और इसका व्यापार भी सत्य है।
ਸੋ ਧੰਨੁ ਪੁਰਖੁ ਜਿਸੁ ਨਾਮਿ ਪਿਆਰੁ ॥੩॥
सो धंनु पुरखु जिसु नामि पिआरु ॥३॥
वह पुरुष धन्य है, जो प्रभु के नाम से प्रेम करता है॥ ३॥
ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਸਾਚੈ ਇਕਿ ਸਚਿ ਲਾਏ ॥
तिनि प्रभि साचै इकि सचि लाए ॥
उस सच्चे प्रभु ने किसी को सत्य नाम में लगाया हुआ है और
ਊਤਮ ਬਾਣੀ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ऊतम बाणी सबदु सुणाए ॥
वह उत्तम वाणी एवं शब्द ही सुनाता है।