ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜਨ ਭਾਈ ॥
हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥
हे भाई ! हरिनाम का जाप करो;
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮਨੁ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਵੈ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸਿ ਰਹਿਆ ਅਘਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर प्रसादि मनु असथिरु होवै अनदिनु हरि रसि रहिआ अघाई ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु की कृपा से मन स्थिर होता है और प्रतिदिन हरि-भजन में तृप्त रहता है।॥ १॥रहाउ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਇਸੁ ਜੁਗ ਕਾ ਲਾਹਾ ਭਾਈ ॥
अनदिनु भगति करहु दिनु राती इसु जुग का लाहा भाई ॥
हे भाई ! दिन-रात भगवान की भक्ति करो, इस जीवन-काल का यही लाभ है।
ਸਦਾ ਜਨ ਨਿਰਮਲ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ॥੨॥
सदा जन निरमल मैलु न लागै सचि नामि चितु लाई ॥२॥
जो परमात्मा में मन लगाता है, वह व्यक्ति सदा निर्मल रहता है और उसे पापों की मैल नहीं लगती॥ २॥
ਸੁਖੁ ਸੀਗਾਰੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ਨਾਮਿ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
सुखु सीगारु सतिगुरू दिखाइआ नामि वडी वडिआई ॥
हरिनाम की महिमा बहुत बड़ी है, सच्चे गुरु ने सुख का श्रृंगार दिखाया है।
ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰ ਭਰੇ ਕਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਸਦਾ ਹਰਿ ਸੇਵਹੁ ਭਾਈ ॥੩॥
अखुट भंडार भरे कदे तोटि न आवै सदा हरि सेवहु भाई ॥३॥
हे भाई ! हरिनाम का भण्डार अक्षय है, इसमें कभी कमी नहीं आती, इसलिए ईश्वर की अर्चना करो॥ ३॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਈ ॥
आपे करता जिस नो देवै तिसु वसै मनि आई ॥
जिसे कर्ता-परमेश्वर आप देता है, उसी के मन में नाम अवस्थित होता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਸਦਾ ਤੂ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਦਿਖਾਈ ॥੪॥੧॥
नानक नामु धिआइ सदा तू सतिगुरि दीआ दिखाई ॥४॥१॥
नानक विनती करते हैं कि सतगुरु ने प्रभु के दर्शन करवा दिए हैं, अतः हरिनाम का चिंतन करो।॥ ४॥ १॥
ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
ਨਿਰਗੁਣੀਆਰੇ ਕਉ ਬਖਸਿ ਲੈ ਸੁਆਮੀ ਆਪੇ ਲੈਹੁ ਮਿਲਾਈ ॥
निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥
हे स्वामी ! मुझ सरीखे गुणविहीन को क्षमा करके अपने साथ मिला लो।
ਤੂ ਬਿਅੰਤੁ ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ਸਬਦੇ ਦੇਹੁ ਬੁਝਾਈ ॥੧॥
तू बिअंतु तेरा अंतु न पाइआ सबदे देहु बुझाई ॥१॥
तू बे-अन्त है, तेरा रहस्य नहीं पाया जा सकता, अतः उपदेश देकर तथ्य समझा दो॥ १॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੁਧੁ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥
हरि जीउ तुधु विटहु बलि जाई ॥
हे प्रभु ! मैं तुझ पर कुर्बान जाता हूँ।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪੀ ਤੁਧੁ ਆਗੈ ਰਾਖਉ ਸਦਾ ਰਹਾਂ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तनु मनु अरपी तुधु आगै राखउ सदा रहां सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥
मैं अपना तन-मन सब कुछ सौंपकर सदा तेरी शरण में रहना चाहता हूँ॥ १॥रहाउ॥
ਆਪਣੇ ਭਾਣੇ ਵਿਚਿ ਸਦਾ ਰਖੁ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਨਾਮੋ ਦੇਹਿ ਵਡਿਆਈ ॥
आपणे भाणे विचि सदा रखु सुआमी हरि नामो देहि वडिआई ॥
हे स्वामी ! मुझे सदा अपनी रज़ा में रखना तथा हरिनाम की महिमा प्रदान करो।
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਭਾਣਾ ਜਾਪੈ ਅਨਦਿਨੁ ਸਹਜਿ ਸਮਾਈ ॥੨॥
पूरे गुर ते भाणा जापै अनदिनु सहजि समाई ॥२॥
पूर्ण गुरु से ही तेरी रज़ा का बोध होता है, इस तरह मन दिन-रात सहजावस्था में लीन रहता है।॥ २॥
ਤੇਰੈ ਭਾਣੈ ਭਗਤਿ ਜੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਈ ॥
तेरै भाणै भगति जे तुधु भावै आपे बखसि मिलाई ॥
तेरी रज़ा से भक्ति होती है, जब तुझे उपयुक्त लगता है तो स्वयं ही कृपा करके मिला लेता है।
ਤੇਰੈ ਭਾਣੈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਈ ॥੩॥
तेरै भाणै सदा सुखु पाइआ गुरि त्रिसना अगनि बुझाई ॥३॥
तेरी रज़ा से सदैव सुख प्राप्त हुआ है और गुरु ने तृष्णाग्नि बुझा दी है॥ ३॥
ਜੋ ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੁ ਹੋਵੈ ਕਰਤੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕਰਣਾ ਜਾਈ ॥
जो तू करहि सु होवै करते अवरु न करणा जाई ॥
हे परमेश्वर ! जो तू करता है, वह निश्चय होता है, तेरे सिवा अन्य कोई करने वाला नहीं।
ਨਾਨਕ ਨਾਵੈ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਦਾਤਾ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ॥੪॥੨॥
नानक नावै जेवडु अवरु न दाता पूरे गुर ते पाई ॥४॥२॥
गुरु नानक का फुरमान है कि हरिनाम सरीखा अन्य कोई दाता नहीं और पूर्ण गुरु से ही प्राप्त होता है।॥ ४॥ २॥
ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਸਾਲਾਹਿਆ ਜਿੰਨਾ ਤਿਨ ਸਲਾਹਿ ਹਰਿ ਜਾਤਾ ॥
गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥
जिन लोगों ने गुरु के माध्यम से ईश्वर का स्तुतिगान किया है, उन्होंने ही ईश-स्तुति को समझा है।
ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਹੈ ਦੂਜਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥੧॥
विचहु भरमु गइआ है दूजा गुर कै सबदि पछाता ॥१॥
गुरु के उपदेश से उनके मन से द्वैतभाव का भ्रम समाप्त हो गया है॥ १॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਤੂ ਮੇਰਾ ਇਕੁ ਸੋਈ ॥
हरि जीउ तू मेरा इकु सोई ॥
हे परमेश्वर ! केवल तू ही मेरा सर्वस्व है।
ਤੁਧੁ ਜਪੀ ਤੁਧੈ ਸਾਲਾਹੀ ਗਤਿ ਮਤਿ ਤੁਝ ਤੇ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तुधु जपी तुधै सालाही गति मति तुझ ते होई ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा जाप करता हूँ, तेरा स्तुतिगान करता हूँ और तुझ से ही मुक्ति होती है॥ १॥रहाउ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਲਾਹਨਿ ਸੇ ਸਾਦੁ ਪਾਇਨਿ ਮੀਠਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਾਰੁ ॥
गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अम्रितु सारु ॥
गुरु के द्वारा ईश्वर की सराहना करने वाले नामामृत का मीठा स्वाद प्राप्त करते हैं।
ਸਦਾ ਮੀਠਾ ਕਦੇ ਨ ਫੀਕਾ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰੁ ॥੨॥
सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥२॥
गुरु के उपदेश से बेशक चिंतन कर लो यह सदैव मीठा है, यह कभी फीका नहीं होता॥ २॥
ਜਿਨਿ ਮੀਠਾ ਲਾਇਆ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਤਿਸੁ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥
जिनि मीठा लाइआ सोई जाणै तिसु विटहु बलि जाई ॥
जिसने हरिनामामृत का मीठा स्वाद पाया है, वही जानता है और मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ।
ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਈ ॥੩॥
सबदि सलाही सदा सुखदाता विचहु आपु गवाई ॥३॥
मन में से अहम्-भाव दूर करके सुखदाता परमेश्वर की सदैव सराहना करो॥ ३॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਹੈ ਦਾਤਾ ਜੋ ਇਛੈ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
सतिगुरु मेरा सदा है दाता जो इछै सो फलु पाए ॥
मेरा सतिगुरु सदा ही देने वाला है, जो कामना होती है, वही फल प्राप्त होता है।
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਚੁ ਪਾਏ ॥੪॥੩॥
नानक नामु मिलै वडिआई गुर सबदी सचु पाए ॥४॥३॥
हे नानक ! हरि नामोच्चारण से कीर्ति प्राप्त होती है और गुरु के उपदेश से ही सत्य प्राप्त होता है।॥ ४॥ ३॥
ਪ੍ਰਭਾਤੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
प्रभाती महला ३ ॥
ਜੋ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤਿਨ ਤੂ ਰਾਖਨ ਜੋਗੁ ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥
हे ईश्वर ! जो तेरी शरण में आता है, उसे तू बचाने में समर्थ है।
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਸੂਝੈ ਨਾ ਕੋ ਹੋਆ ਨ ਹੋਗੁ ॥੧॥
तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥१॥
तेरे जैसा शक्तिमान मुझे अन्य कोई प्रतीत नहीं होता, संसार में न कोई हुआ है और न ही कभी होगा॥ १॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਦਾ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
हरि जीउ सदा तेरी सरणाई ॥
अतः हे प्रभु ! मैं सदैव तेरी शरण में हूँ,
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖਹੁ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਏਹ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु मेरे सुआमी एह तेरी वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥
हे मेरे स्वामी ! जैसा तुझे ठीक लगता है, वैसे ही रखो, यह तेरा बड़प्पन है॥ १॥रहाउ॥
ਜੋ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ਹਰਿ ਜੀਉ ਤਿਨ ਕੀ ਕਰਹਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन की करहि प्रतिपाल ॥
जो तेरी शरण लेते हैं, उनकी तुम्ही हिफाजत करते हो।