Hindi Page 998

ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
सुख सागरु अम्रितु हरि नाउ ॥
हरि-नाम अमृतमय एवं सुखों का सागर है।

ਮੰਗਤ ਜਨੁ ਜਾਚੈ ਹਰਿ ਦੇਹੁ ਪਸਾਉ ॥
मंगत जनु जाचै हरि देहु पसाउ ॥
वह उसे ही देता है, जो विनम्र भावना से याचना करता है।

ਹਰਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਦਾ ਹਰਿ ਸਤਿ ਹਰਿ ਸਤਿ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਜੀਉ ॥੨॥
हरि सति सति सदा हरि सति हरि सति मेरै मनि भावै जीउ ॥२॥
ईश्वर सदैव सत्य है और वह परमसत्य ही मेरे मन को प्रिय लगता है। २॥

ਨਵੇ ਛਿਦ੍ਰ ਸ੍ਰਵਹਿ ਅਪਵਿਤ੍ਰਾ ॥
नवे छिद्र स्रवहि अपवित्रा ॥
शरीर के नो छिद्रो – आँख, कान, मुँह, नासिका, गुदा, व् लिंग द्वारा अपवित्र स्रावित होते रहते है,”

ਬੋਲਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਪਵਿਤ੍ਰ ਸਭਿ ਕਿਤਾ ॥
बोलि हरि नाम पवित्र सभि किता ॥
किन्तु हरि-नाम का स्तुतिगान करने से सब पवित्र हो जाता है।

ਜੇ ਹਰਿ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨੁ ਹੋਵੈ ਮੇਰਾ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਮਲੁ ਲਹਿ ਜਾਵੈ ਜੀਉ ॥੩॥
जे हरि सुप्रसंनु होवै मेरा सुआमी हरि सिमरत मलु लहि जावै जीउ ॥३॥
अगर ईश्वर परम-प्रसन्न हो जाए तो उसकी उपासना करने से सारी मैल उतर जाती है।॥ ३॥

ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਬਿਖਮੁ ਹੈ ਭਾਰੀ ॥
माइआ मोहु बिखमु है भारी ॥
(प्रश्न) माया-मोह रूपी सागर बड़ा कठिन है।

ਕਿਉ ਤਰੀਐ ਦੁਤਰੁ ਸੰਸਾਰੀ ॥
किउ तरीऐ दुतरु संसारी ॥
इस दुर्गम संसार-सागर से कैसे पार हुआ जा सकता है ?

ਸਤਿਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਵੈ ਜੀਉ ॥੪॥
सतिगुरु बोहिथु देइ प्रभु साचा जपि हरि हरि पारि लंघावै जीउ ॥४॥
(उत्तर) अगर सच्चा प्रभु रूपी जहाज से मिला दे तो गुरु-उपदेश से हरि-नाम जपकर जीव संसार-सागर से पार हो जाता है ।४ ।

ਤੂ ਸਰਬਤ੍ਰ ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
तू सरबत्र तेरा सभु कोई ॥
हे ईश्वर ! तू सर्वव्यापी है, सबकुछ तेरा ही पैदा किया हुआ है।

ਜੋ ਤੂ ਕਰਹਿ ਸੋਈ ਪ੍ਰਭ ਹੋਈ ॥
जो तू करहि सोई प्रभ होई ॥
जो तू करता है, जग में वही होता है।

ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਬੇਚਾਰਾ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਹਰਿ ਥਾਇ ਪਾਵੈ ਜੀਉ ॥੫॥੧॥੭॥
जनु नानकु गुण गावै बेचारा हरि भावै हरि थाइ पावै जीउ ॥५॥१॥७॥
नानक बेचारा तो तेरे ही गुण गाता रहता है, अगर तुझे मंजूर हो तो हमारी उपासना सफल हो सकती है॥ ५॥ १॥ ७॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੪ ॥
मारू महला ४ ॥
मारू महला ४॥

ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥
हे मन ! ईश्वर का ज़ाप करो,

ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੈ ਹਰਿ ਤੇਰੇ ॥
सभि किलविख काटै हरि तेरे ॥
वह तेरे सभी पाप-दोष काट देगा।

ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਖਹੁ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਹਰਿ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਸਖਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥
हरि धनु राखहु हरि धनु संचहु हरि चलदिआ नालि सखाई जीउ ॥१॥
मन में हरि-धन बसाकर रखो, हरि-धन संचित करो, यही दुनिया से चलते समय तेरा साथी बनकर साथ जाएगा॥ १॥

ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਸੋ ਧਿਆਵੈ ॥
जिस नो क्रिपा करे सो धिआवै ॥
जिस पर ईश्वर कृपा करता है, वही उसका ध्यान करता है।

ਨਿਤ ਹਰਿ ਜਪੁ ਜਾਪੈ ਜਪਿ ਹਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
नित हरि जपु जापै जपि हरि सुखु पावै ॥
वह नित्य परमेश्वर का जाप करता हुआ सुख पा लेता है।

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਰਸੁ ਆਵੈ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुर परसादी हरि रसु आवै जपि हरि हरि पारि लंघाई जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु-कृपा से ही हरि-नाम का स्वाद आता है और ईश्वर का जाप संसार सागर से पार करवाता है॥ रहाउ॥

ਨਿਰਭਉ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ॥
निरभउ निरंकारु सति नामु ॥
ईश्वर निरंकार एवं निर्भय है, उसका नाम सत्य है और

ਜਗ ਮਹਿ ਸ੍ਰੇਸਟੁ ਊਤਮ ਕਾਮੁ ॥
जग महि स्रेसटु ऊतम कामु ॥
जग में नाम-स्मरण ही उत्तम एवं श्रेष्ठ कर्म है।

ਦੁਸਮਨ ਦੂਤ ਜਮਕਾਲੁ ਠੇਹ ਮਾਰਉ ਹਰਿ ਸੇਵਕ ਨੇੜਿ ਨ ਜਾਈ ਜੀਉ ॥੨॥
दुसमन दूत जमकालु ठेह मारउ हरि सेवक नेड़ि न जाई जीउ ॥२॥
यमराज के दूत शत्रु की तरह जीवों को मार देते हैं परन्तु हरि-भक्त के निकट भी नहीं जाते। २॥

ਜਿਸੁ ਉਪਰਿ ਹਰਿ ਕਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
जिसु उपरि हरि का मनु मानिआ ॥
जिस पर भगवान् का मन प्रसन्न हो गया है,

ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਚਹੁ ਜੁਗ ਚਹੁ ਕੁੰਟ ਜਾਨਿਆ ॥
सो सेवकु चहु जुग चहु कुंट जानिआ ॥
वह भक्त चारों युगों-चारों दिशाओं में सुविख्यात हो गया है।

ਜੇ ਉਸ ਕਾ ਬੁਰਾ ਕਹੈ ਕੋਈ ਪਾਪੀ ਤਿਸੁ ਜਮਕੰਕਰੁ ਖਾਈ ਜੀਉ ॥੩॥
जे उस का बुरा कहै कोई पापी तिसु जमकंकरु खाई जीउ ॥३॥
यदि कोई पापी उसका बुरा करता अथवा चाहता है तो मृत्यु उसे अपना ग्रास बना लेती है। ३ ।

ਸਭ ਮਹਿ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨ ਕਰਤਾ ॥
सभ महि एकु निरंजन करता ॥
सब में एक मायातीत परमेश्वर ही विद्यमान है और

ਸਭਿ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਅਪਣੇ ਚਲਤਾ ॥
सभि करि करि वेखै अपणे चलता ॥
अपनी लीला करके देखता रहता है।

ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਰਾਖੈ ਤਿਸੁ ਕਉਣੁ ਮਾਰੈ ਜਿਸੁ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਛਡਾਈ ਜੀਉ ॥੪॥
जिसु हरि राखै तिसु कउणु मारै जिसु करता आपि छडाई जीउ ॥४॥
जिसकी रक्षा ईश्वर करता है, उसे भला कौन मार सकता है ? प्रभु स्वयं उसे संकटों से बचाता है। ४॥

ਹਉ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਲਈ ਕਰਤਾਰੇ ॥
हउ अनदिनु नामु लई करतारे ॥
में नित्य ईश्वर का नाम जपता रहता हूँ,

ਜਿਨਿ ਸੇਵਕ ਭਗਤ ਸਭੇ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
जिनि सेवक भगत सभे निसतारे ॥
जिसने सेवक-भक्त सबकी मुक्ति कर दी है।

ਦਸ ਅਠ ਚਾਰਿ ਵੇਦ ਸਭਿ ਪੂਛਹੁ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਛਡਾਈ ਜੀਉ ॥੫॥੨॥੮॥
दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ ॥५॥२॥८॥
हे नानक ! नि:संकोच अठारह पुराण एवं चारों वेदों का अवलोकन कर लो, उनका भी यही मानना है कि ईश्वर का नाम ही मुक्तिदाता है।५॥ २॥ ८॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੨
मारू महला ५ घरु २
मारू महला ५ घरु २

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि॥

ਡਰਪੈ ਧਰਤਿ ਅਕਾਸੁ ਨਖੵਤ੍ਰਾ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਅਮਰੁ ਕਰਾਰਾ ॥
डरपै धरति अकासु नख्यत्रा सिर ऊपरि अमरु करारा ॥
धरती, आकाश एवं नक्षत्र भी डरते हैं, सब पर ईश्वर का कठोर हुक्म चल रहा है।

ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੁ ਡਰਪੈ ਡਰਪੈ ਇੰਦ੍ਰੁ ਬਿਚਾਰਾ ॥੧॥
पउणु पाणी बैसंतरु डरपै डरपै इंद्रु बिचारा ॥१॥
पवन, पानी एवं अग्नि उसके में ही क्रियाशील है और बेचारा इंद्रदेव भी उससे डरता है।॥ १॥

ਏਕਾ ਨਿਰਭਉ ਬਾਤ ਸੁਨੀ ॥
एका निरभउ बात सुनी ॥
यही बात सुनी है कि रचयिता ईश्वर ही निर्भय है।

ਸੋ ਸੁਖੀਆ ਸੋ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲਾ ਜੋ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਗਾਇ ਗੁਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सो सुखीआ सो सदा सुहेला जो गुर मिलि गाइ गुनी ॥१॥ रहाउ ॥
जो गुरु से मिलकर उसका गुणगान करता है, वही सुखी और सदा खुश रहता है। १॥ रहाउ॥

ਦੇਹਧਾਰ ਅਰੁ ਦੇਵਾ ਡਰਪਹਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਡਰਿ ਮੁਇਆ ॥
देहधार अरु देवा डरपहि सिध साधिक डरि मुइआ ॥
देहधारी प्राणी और देवता उससे ही डर रहे हैं। बड़े-बड़े सिद्ध-साधक ईश्वर-भय से ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮਰਿ ਮਰਿ ਜਨਮੇ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੋਨੀ ਜੋਇਆ ॥੨॥
लख चउरासीह मरि मरि जनमे फिरि फिरि जोनी जोइआ ॥२॥
चौरासी लाख योनियों के सभी जीव मर-मरकर जन्मते रहते हैं और उन्हें बार-बार योनियों में धकेला जा रहा है।॥२॥

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