ਨਾਰਾਇਣੁ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਇ ਤ ਸੇਵਕੁ ਨਾਮਾ ॥੩॥੧॥
नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा ॥३॥१॥
नामदेव जी कहते हैं कि यदि ईश्वर परम प्रसन्न हो जाए तो ही सेवक की सेवा सफल होती है॥ ३ ॥१॥
ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਅਤਿ ਨੀਝਰ ਬਾਜੈ ॥
लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥
हे ईश्वर ! लोभ की लहरें बहुत उछल रही हैं और
ਕਾਇਆ ਡੂਬੈ ਕੇਸਵਾ ॥੧॥
काइआ डूबै केसवा ॥१॥
यह शरीर इसमें ही डूब रहा है ॥१॥
ਸੰਸਾਰੁ ਸਮੁੰਦੇ ਤਾਰਿ ਗੋੁਬਿੰਦੇ ॥
संसारु समुंदे तारि गोबिंदे ॥
हे परमेश्वर ! इस संसार-सागर से मुझे पार उतार दो।
ਤਾਰਿ ਲੈ ਬਾਪ ਬੀਠੁਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तारि लै बाप बीठुला ॥१॥ रहाउ ॥
हे पिता परमेश्वर ! मुझे पार उतार दो ॥१॥रहाउ॥।
ਅਨਿਲ ਬੇੜਾ ਹਉ ਖੇਵਿ ਨ ਸਾਕਉ ॥
अनिल बेड़ा हउ खेवि न साकउ ॥
मेरी यह जीवन नैया तेज ऑधी में फँस गई है, जिसे मेरा चप्पू आगे ले जाने में नाकामयाब है।
ਤੇਰਾ ਪਾਰੁ ਨ ਪਾਇਆ ਬੀਠੁਲਾ ॥੨॥
तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥२॥
हे प्रभु ! तेरी कृपा बिना पार नहीं हो सकता ॥२॥
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਿ ਤੂ ਮੋ ਕਉ ॥ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ਕੇਸਵਾ ॥੩॥
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि तू मो कउ ॥ पारि उतारे केसवा ॥३॥
हे केशव ! मुझ पर दयालु होकर मुझे सतगुरु से मिला दो,” और भवसागर से पार उतर दो।
ਨਾਮਾ ਕਹੈ ਹਉ ਤਰਿ ਭੀ ਨ ਜਾਨਉ ॥
नामा कहै हउ तरि भी न जानउ ॥
नामदेव जी विनती करते हैं कि मैं तैरना भी नहीं जानता,
ਮੋ ਕਉ ਬਾਹ ਦੇਹਿ ਬਾਹ ਦੇਹਿ ਬੀਠੁਲਾ ॥੪॥੨॥
मो कउ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥४॥२॥
हे प्रभु ! बाँह देकर मुझे बचा लो ॥४॥२॥
ਸਹਜ ਅਵਲਿ ਧੂੜਿ ਮਣੀ ਗਾਡੀ ਚਾਲਤੀ ॥
सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥
पहले (पाप रूपी) धूल से भरी वस्त्रों (शरीर) की गाड़ी धीरे-धीरे चलती है और
ਪੀਛੈ ਤਿਨਕਾ ਲੈ ਕਰਿ ਹਾਂਕਤੀ ॥੧॥
पीछै तिनका लै करि हांकती ॥१॥
डंडा लेकर पीछे धोबिन उस गाड़ी को हॉकती है ॥१॥
ਜੈਸੇ ਪਨਕਤ ਥ੍ਰੂਟਿਟਿ ਹਾਂਕਤੀ ॥
जैसे पनकत थ्रूटिटि हांकती ॥
जैसे-जैसे धोबिन इस गाड़ी को धोने की तरफ आवाज देकर हॉकती है,
ਸਰਿ ਧੋਵਨ ਚਾਲੀ ਲਾਡੁਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सरि धोवन चाली लाडुली ॥१॥ रहाउ ॥
वह सिर पर गन्दे वस्त्रों को धोने के लिए ले जाती है, इसी प्रकार जीव स्त्री भी अपने कर्मों को धोने के लिए सत्संग में चल पड़ती है॥१॥रहाउ॥।
ਧੋਬੀ ਧੋਵੈ ਬਿਰਹ ਬਿਰਾਤਾ ॥
धोबी धोवै बिरह बिराता ॥
गुरु रूपी धोबी सत्संग में आई जीव-स्त्री के मन को प्रेमपूर्वक पावन कर देता है।
ਹਰਿ ਚਰਨ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥੨॥
हरि चरन मेरा मनु राता ॥२॥
मेरा मन भी ईश्वर के चरणों में ही रत है॥२॥
ਭਣਤਿ ਨਾਮਦੇਉ ਰਮਿ ਰਹਿਆ ॥
भणति नामदेउ रमि रहिआ ॥
नामदेव जी कहते हैं कि ईश्वर सबमें बसा हुआ है और
ਅਪਨੇ ਭਗਤ ਪਰ ਕਰਿ ਦਇਆ ॥੩॥੩॥
अपने भगत पर करि दइआ ॥३॥३॥
अपने भक्तों पर सदा दया करता है॥३॥ ३ ॥
ਬਸੰਤੁ ਬਾਣੀ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ
बसंतु बाणी रविदास जी की
बसंतु बाणी रविदास जी की
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਤੁਝਹਿ ਸੁਝੰਤਾ ਕਛੂ ਨਾਹਿ ॥
तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥
तुझे कुछ भी समझ नहीं आ रही,
ਪਹਿਰਾਵਾ ਦੇਖੇ ਊਭਿ ਜਾਹਿ ॥
पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥
केवल सुन्दर पहरावा देखकर गर्व कर रही हो
ਗਰਬਵਤੀ ਕਾ ਨਾਹੀ ਠਾਉ ॥
गरबवती का नाही ठाउ ॥
परन्तु अभिमानी को कहीं भी ठीर-ठिकाना प्राप्त नहीं होता,
ਤੇਰੀ ਗਰਦਨਿ ਊਪਰਿ ਲਵੈ ਕਾਉ ॥੧॥
तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥१॥
मौत रूपी कोआ तेरी गर्दन पर मंडरा रहा है॥१॥
ਤੂ ਕਾਂਇ ਗਰਬਹਿ ਬਾਵਲੀ ॥
तू कांइ गरबहि बावली ॥
अरे बावली ! तू क्यों अहंकार कर रही है।
ਜੈਸੇ ਭਾਦਉ ਖੂੰਬਰਾਜੁ ਤੂ ਤਿਸ ਤੇ ਖਰੀ ਉਤਾਵਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जैसे भादउ खू्मबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥१॥ रहाउ ॥
जिस प्रकार भादों के महीने में कुकुरमत्ता उगकर नष्ट हो जाता है, तू उससे भी अधिक उतावली हो रही है॥१॥रहाउ॥।
ਜੈਸੇ ਕੁਰੰਕ ਨਹੀ ਪਾਇਓ ਭੇਦੁ ॥
जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥
जैसे हिरण को कस्तूरी का भेद पता नहीं चलता और
ਤਨਿ ਸੁਗੰਧ ਢੂਢੈ ਪ੍ਰਦੇਸੁ ॥
तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥
अपने तन में विद्यमान सुगन्ध बाहर ढूंढता रहता है,
ਅਪ ਤਨ ਕਾ ਜੋ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
अप तन का जो करे बीचारु ॥
जो अपने शरीर के महत्व का चिंतन करता है,
ਤਿਸੁ ਨਹੀ ਜਮਕੰਕਰੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੁ ॥੨॥
तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥२॥
उसे यमदूत तंग नहीं करता ॥२॥
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਕਾ ਕਰਹਿ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥
जीव प्रिय पुत्रों एवं अपनी पत्नी का अहंकार करता है,
ਠਾਕੁਰੁ ਲੇਖਾ ਮਗਨਹਾਰੁ ॥
ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥
पर यह नहीं सोचता कि मालिक कर्मो का हिसाब मांगने वाला है।
ਫੇੜੇ ਕਾ ਦੁਖੁ ਸਹੈ ਜੀਉ ॥
फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥
जीव को अपने किए कर्मों का फल रूपी दुख भोगना पड़ता है,
ਪਾਛੇ ਕਿਸਹਿ ਪੁਕਾਰਹਿ ਪੀਉ ਪੀਉ ॥੩॥
पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥३॥
मरणोपरांत अपना प्रिय किसे पुकार पाता है॥३॥
ਸਾਧੂ ਕੀ ਜਉ ਲੇਹਿ ਓਟ ॥
साधू की जउ लेहि ओट ॥
यदि तू साधु की शरण पा ले तो
ਤੇਰੇ ਮਿਟਹਿ ਪਾਪ ਸਭ ਕੋਟਿ ਕੋਟਿ ॥
तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥
तेरे करोड़ों पाप मिट जाएंगे।
ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਜੋੁ ਜਪੈ ਨਾਮੁ ॥
कहि रविदास जो जपै नामु ॥
रविदास जी कहते हैं कि जो परमात्मा का नाम जपता है,
ਤਿਸੁ ਜਾਤਿ ਨ ਜਨਮੁ ਨ ਜੋਨਿ ਕਾਮੁ ॥੪॥੧॥
तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥४॥१॥
उसकी जाति एवं जन्म-मरण छूट जाता है और योनि से कोई नाता नहीं रह पाता॥४॥१॥
ਬਸੰਤੁ ਕਬੀਰ ਜੀਉ
बसंतु कबीर जीउ
बसंतु कबीर जीउ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਸੁਰਹ ਕੀ ਜੈਸੀ ਤੇਰੀ ਚਾਲ ॥
सुरह की जैसी तेरी चाल ॥
कबीर जी घर में आए कुत्ते को संबोधन करते हुए कहते हैं] तेरी चाल गाय जैसी है और
ਤੇਰੀ ਪੂੰਛਟ ਊਪਰਿ ਝਮਕ ਬਾਲ ॥੧॥
तेरी पूंछट ऊपरि झमक बाल ॥१॥
पूँछ पर बाल भी चमक रहे हैं।॥१॥
ਇਸ ਘਰ ਮਹਿ ਹੈ ਸੁ ਤੂ ਢੂੰਢਿ ਖਾਹਿ ॥
इस घर महि है सु तू ढूंढि खाहि ॥
इस घर में जो कुछ है, तू उसे ढूंढ कर खा ले,
ਅਉਰ ਕਿਸ ਹੀ ਕੇ ਤੂ ਮਤਿ ਹੀ ਜਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
अउर किस ही के तू मति ही जाहि ॥१॥ रहाउ ॥
तू किसी अन्य के घर में मत जाना ॥१॥रहाउ॥।
ਚਾਕੀ ਚਾਟਹਿ ਚੂਨੁ ਖਾਹਿ ॥
चाकी चाटहि चूनु खाहि ॥
चक्की का जो आटा है, उसे चाटकर खा ले,
ਚਾਕੀ ਕਾ ਚੀਥਰਾ ਕਹਾਂ ਲੈ ਜਾਹਿ ॥੨॥
चाकी का चीथरा कहां लै जाहि ॥२॥
पर यह चक्की का चिथड़ा कहां ले जा रहा है॥२॥
ਛੀਕੇ ਪਰ ਤੇਰੀ ਬਹੁਤੁ ਡੀਠਿ ॥
छीके पर तेरी बहुतु डीठि ॥
छीके पर तूने बहुत नजर टिकाई हुई है,
ਮਤੁ ਲਕਰੀ ਸੋਟਾ ਤੇਰੀ ਪਰੈ ਪੀਠਿ ॥੩॥
मतु लकरी सोटा तेरी परै पीठि ॥३॥
इस बात का ख्याल रखना कहीं लकड़ी का डण्डा तेरी पीठ पर न पड़ जाए॥३॥
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਭੋਗ ਭਲੇ ਕੀਨ ॥
कहि कबीर भोग भले कीन ॥
कबीर जी कहते हैं कि तूने अच्छी तरह से खा लिया है,
ਮਤਿ ਕੋਊ ਮਾਰੈ ਈਂਟ ਢੇਮ ॥੪॥੧॥
मति कोऊ मारै ईंट ढेम ॥४॥१॥
चुपके से चले जाओ, कहीं कोई तुझे ईट-पत्थर न मार दे ॥४॥१॥