ਸਾਧ ਪਠਾਏ ਆਪਿ ਹਰਿ ਹਮ ਤੁਮ ਤੇ ਨਾਹੀ ਦੂਰਿ ॥
साध पठाए आपि हरि हम तुम ते नाही दूरि ॥
ईश्वर ने स्वयं ही यह सत्य बताने के लिए साधुओं को संसार में भेजा है कि वह तुमसे कहीं दूर नहीं।
ਨਾਨਕ ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਮਿਟਿ ਗਏ ਰਮਣ ਰਾਮ ਭਰਪੂਰਿ ॥੨॥
नानक भ्रम भै मिटि गए रमण राम भरपूरि ॥२॥
हे नानक ! सब भ्रम एवं भय मिट गए हैं, एक राग ही सब जीवों में रमण कर रहा है॥ २ ॥
ਛੰਤੁ ॥
छंतु ॥
छंद॥
ਰੁਤਿ ਸਿਸੀਅਰ ਸੀਤਲ ਹਰਿ ਪ੍ਰਗਟੇ ਮੰਘਰ ਪੋਹਿ ਜੀਉ ॥
रुति सिसीअर सीतल हरि प्रगटे मंघर पोहि जीउ ॥
मार्गशीर्ष एवं पौष के महीनों में शीतल शिशिर ऋतु आई है और प्रभु अन्तर्मन में प्रगट हो गया है।
ਜਲਨਿ ਬੁਝੀ ਦਰਸੁ ਪਾਇਆ ਬਿਨਸੇ ਮਾਇਆ ਧ੍ਰੋਹ ਜੀਉ ॥
जलनि बुझी दरसु पाइआ बिनसे माइआ ध्रोह जीउ ॥
उसके दर्शन करके सारी जलन दूर हो गई है और माया के सब बन्धन नाश हो गए हैं।
ਸਭਿ ਕਾਮ ਪੂਰੇ ਮਿਲਿ ਹਜੂਰੇ ਹਰਿ ਚਰਣ ਸੇਵਕਿ ਸੇਵਿਆ ॥
सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥
सेवक ने हरि-चरणों की सेवा की है और प्रत्यक्ष प्रभु से मिलकर सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।
ਹਾਰ ਡੋਰ ਸੀਗਾਰ ਸਭਿ ਰਸ ਗੁਣ ਗਾਉ ਅਲਖ ਅਭੇਵਿਆ ॥
हार डोर सीगार सभि रस गुण गाउ अलख अभेविआ ॥
सब ने हार श्रृंगार सहित आनंद से उस अलक्ष्य, रहस्यातीत, परमात्मा का ही गुणगान किया है।
ਭਾਉ ਭਗਤਿ ਗੋਵਿੰਦ ਬਾਂਛਤ ਜਮੁ ਨ ਸਾਕੈ ਜੋਹਿ ਜੀਉ ॥
भाउ भगति गोविंद बांछत जमु न साकै जोहि जीउ ॥
जो गोविंद की प्रेम-भक्ति की कामना करते हैं, यम भी उन्हें तंग नहीं करता।
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮੇਲੀ ਤਹ ਨ ਪ੍ਰੇਮ ਬਿਛੋਹ ਜੀਉ ॥੬॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेली तह न प्रेम बिछोह जीउ ॥६॥
नानक विनती करते हैं कि जिस जीव-स्त्री को प्रभु ने साथ मिला लिया है, उसका प्रेम वियोग नहीं होता ॥ ६॥
ਸਲੋਕ ॥
सलोक ॥
श्लोक॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਡੋਲਤ ਨਾਹੀ ਚੀਤ ॥
हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥
जिस सुहागिन ने पति-प्रभु को पा लिया है, उसका मन कभी विचलित नहीं होता।
ਸੰਤ ਸੰਜੋਗੀ ਨਾਨਕਾ ਗ੍ਰਿਹਿ ਪ੍ਰਗਟੇ ਪ੍ਰਭ ਮੀਤ ॥੧॥
संत संजोगी नानका ग्रिहि प्रगटे प्रभ मीत ॥१॥
हे नानक ! संतों के संयोग से ही मित्र-प्रभु उसके हृदय-घर में प्रगट हो गया है॥ १॥
ਨਾਦ ਬਿਨੋਦ ਅਨੰਦ ਕੋਡ ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੰਗਿ ਬਨੇ ॥
नाद बिनोद अनंद कोड प्रिअ प्रीतम संगि बने ॥
प्रियतम के संग ही आनंद, विनोद एवं संगीत इत्यादि सब खुशियां मिलती हैं।
ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਫਲ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਭਨੇ ॥੨॥
मन बांछत फल पाइआ हरि नानक नाम भने ॥२॥
हे नानक ! हरि-नाम का जाप करके मनोवांछित फल प्राप्त हो गया है॥ २ ॥
ਛੰਤੁ ॥
छंतु ॥
छंद ॥
ਹਿਮਕਰ ਰੁਤਿ ਮਨਿ ਭਾਵਤੀ ਮਾਘੁ ਫਗਣੁ ਗੁਣਵੰਤ ਜੀਉ ॥
हिमकर रुति मनि भावती माघु फगणु गुणवंत जीउ ॥
हेमंत ऋतु मन को बहुत अच्छी लगती है, माघ-फाल्गुन के महीने बड़े गुणवान् हैं।
ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਗਾਉ ਮੰਗਲੋ ਗ੍ਰਿਹਿ ਆਏ ਹਰਿ ਕੰਤ ਜੀਉ ॥
सखी सहेली गाउ मंगलो ग्रिहि आए हरि कंत जीउ ॥
हे मेरी सखी-सहेली, प्रभु हृदय-घर में आ गया है, इसलिए उसका मंगलगान करो।
ਗ੍ਰਿਹਿ ਲਾਲ ਆਏ ਮਨਿ ਧਿਆਏ ਸੇਜ ਸੁੰਦਰਿ ਸੋਹੀਆ ॥
ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥
मन में उसका ध्यान किया है और हृदय-घर में वह प्रभु जी आए हैं और मेरी हृदय रूपी सेज सुन्दर एवं सुहावनी हो गई है।
ਵਣੁ ਤ੍ਰਿਣੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਭਏ ਹਰਿਆ ਦੇਖਿ ਦਰਸਨ ਮੋਹੀਆ ॥
वणु त्रिणु त्रिभवण भए हरिआ देखि दरसन मोहीआ ॥
वन, तृण एवं तीनों लोक सब खुशहाल हो गए हैं और उसके दर्शन करके मोहित हो गई हूँ।
ਮਿਲੇ ਸੁਆਮੀ ਇਛ ਪੁੰਨੀ ਮਨਿ ਜਪਿਆ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤ ਜੀਉ ॥
मिले सुआमी इछ पुंनी मनि जपिआ निरमल मंत जीउ ॥
मेरा स्वामी मुझे मिल गया है, मेरी कामना पूरी हो गई है, चूंकि मन में उसके निर्मल नाम-मंत्र का ही जाप किया है।
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਨਿਤ ਕਰਹੁ ਰਲੀਆ ਹਰਿ ਮਿਲੇ ਸ੍ਰੀਧਰ ਕੰਤ ਜੀਉ ॥੭॥
बिनवंति नानक नित करहु रलीआ हरि मिले स्रीधर कंत जीउ ॥७॥
नानक विनती करते हैं कि नित्य आनंद प्राप्त करो, चूंकि श्रीधर हरि रूपी पति मिल गया है॥ ७ ॥
ਸਲੋਕ ॥
सलोक ॥
श्लोक ॥
ਸੰਤ ਸਹਾਈ ਜੀਅ ਕੇ ਭਵਜਲ ਤਾਰਣਹਾਰ ॥
संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥
संत ही जीवों के सहायक हैं, जो संसार-सागर से पार करवाने वाले हैं।
ਸਭ ਤੇ ਊਚੇ ਜਾਣੀਅਹਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਪਿਆਰ ॥੧॥
सभ ते ऊचे जाणीअहि नानक नाम पिआर ॥१॥
हे नानक ! जो प्रभु-नाम से प्रेम करता है, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है॥ १॥
ਜਿਨ ਜਾਨਿਆ ਸੇਈ ਤਰੇ ਸੇ ਸੂਰੇ ਸੇ ਬੀਰ ॥
जिन जानिआ सेई तरे से सूरे से बीर ॥
जिन्होंने ईश्वर को पहचान लिया है, वे संसार से मुक्त हो गए हैं, वही शूरवीर एवं पराक्रमी हैं।
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰਣੈ ਹਰਿ ਜਪਿ ਉਤਰੇ ਤੀਰ ॥੨॥
नानक तिन बलिहारणै हरि जपि उतरे तीर ॥२॥
हे नानक ! मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो भगवान का जाप करके पार हो गए हैं।॥ २॥
ਛੰਤੁ ॥
छंतु ॥
छंद॥
ਚਰਣ ਬਿਰਾਜਿਤ ਸਭ ਊਪਰੇ ਮਿਟਿਆ ਸਗਲ ਕਲੇਸੁ ਜੀਉ ॥
चरण बिराजित सभ ऊपरे मिटिआ सगल कलेसु जीउ ॥
सब के ऊपर भगवान के चरण विराजमान हैं और उनका सारा दुख-क्लेश मिट गया है।
ਆਵਣ ਜਾਵਣ ਦੁਖ ਹਰੇ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਕੀਆ ਪਰਵੇਸੁ ਜੀਉ ॥
आवण जावण दुख हरे हरि भगति कीआ परवेसु जीउ ॥
जिनके हृदय में भगवान की भक्ति का प्रवेश हो गया है, उनका आवागमन का दुख मिट गया है।
ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਹਜਿ ਮਾਤੇ ਤਿਲੁ ਨ ਮਨ ਤੇ ਬੀਸਰੈ ॥
हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥
वे हरि-रंग में लीन रहकर सहज ही मस्त रहते हैं और तिल मात्र समय के लिए भी उन्हें प्रभु मन से नहीं भूलता।
ਤਜਿ ਆਪੁ ਸਰਣੀ ਪਰੇ ਚਰਨੀ ਸਰਬ ਗੁਣ ਜਗਦੀਸਰੈ ॥
तजि आपु सरणी परे चरनी सरब गुण जगदीसरै ॥
वे अपना अहंत्व त्यागकर सर्वगुणसम्पन्न जगदीश्वर के चरणों की शरण में आ गए हैं।
ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਸ੍ਰੀਰੰਗ ਸੁਆਮੀ ਆਦਿ ਕਉ ਆਦੇਸੁ ਜੀਉ ॥
गोविंद गुण निधि स्रीरंग सुआमी आदि कउ आदेसु जीउ ॥
गुणों के भण्डार, श्रीरंग, स्वामी, सृष्टि के आदि उस गोविन्द को हमारा शत् शत् नमन है।
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਮਇਆ ਧਾਰਹੁ ਜੁਗੁ ਜੁਗੋ ਇਕ ਵੇਸੁ ਜੀਉ ॥੮॥੧॥੬॥੮॥
बिनवंति नानक मइआ धारहु जुगु जुगो इक वेसु जीउ ॥८॥१॥६॥८॥
नानक विनती करते हैं कि हे स्वामी ! मुझ पर दया करो, युगों-युगान्तरों से एक तेरा ही अस्तित्व है॥ ८॥ १॥ ६॥ ८ ॥
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ਦਖਣੀ ਓਅੰਕਾਰੁ
रामकली महला १ दखणी ओअंकारु
रामकली महला १ दखणी ओअंकारु
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਓਅੰਕਾਰਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਉਤਪਤਿ ॥
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
ऑकार से ब्रह्मा की उत्पति हुई,
ਓਅੰਕਾਰੁ ਕੀਆ ਜਿਨਿ ਚਿਤਿ ॥
ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥
जिसने चित्त में ऑकार का ही ध्यान किया,”
ਓਅੰਕਾਰਿ ਸੈਲ ਜੁਗ ਭਏ ॥
ओअंकारि सैल जुग भए ॥
अनेक पर्वत एवं युग ऑकार से पैदा हुए और
ਓਅੰਕਾਰਿ ਬੇਦ ਨਿਰਮਏ ॥
ओअंकारि बेद निरमए ॥
ऑकार ने वेदों का निर्माण किया।