ਨਾਨਕ ਲੜਿ ਲਾਇ ਉਧਾਰਿਅਨੁ ਦਯੁ ਸੇਵਿ ਅਮਿਤਾ ॥੧੯॥
नानक लड़ि लाइ उधारिअनु दयु सेवि अमिता ॥१९॥
हे नानक ! ऐसे अनन्त परमात्मा का चिन्तन कर, जो अपने साथ लगाकर तुझे (संसार सागर से) पार कर देगा ॥ १६॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਧੰਧੜੇ ਕੁਲਾਹ ਚਿਤਿ ਨ ਆਵੈ ਹੇਕੜੋ ॥
धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥
दुनिया के ऐसे धन्धे नुक्सानदायक हैं, जिनके कारण एक ईश्वर चित्त में नहीं आता।
ਨਾਨਕ ਸੇਈ ਤੰਨ ਫੁਟੰਨਿ ਜਿਨਾ ਸਾਂਈ ਵਿਸਰੈ ॥੧॥
नानक सेई तंन फुटंनि जिना सांई विसरै ॥१॥
हे नानक ! वे शरीर विकारों से नाश हो जाते हैं, जिन्हें जगत् का मालिक परमात्मा भूल जाता है॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਪਰੇਤਹੁ ਕੀਤੋਨੁ ਦੇਵਤਾ ਤਿਨਿ ਕਰਣੈਹਾਰੇ ॥
परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥
उस सृष्टि के रचयिता प्रभु ने प्रेत से देवता बना दिया है।
ਸਭੇ ਸਿਖ ਉਬਾਰਿਅਨੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕਾਜ ਸਵਾਰੇ ॥
सभे सिख उबारिअनु प्रभि काज सवारे ॥
ईश्वर ने गुरु के समस्त सिक्खों का उद्धार कर दिया है और उनके कार्य संवार दिए हैं।
ਨਿੰਦਕ ਪਕੜਿ ਪਛਾੜਿਅਨੁ ਝੂਠੇ ਦਰਬਾਰੇ ॥
निंदक पकड़ि पछाड़िअनु झूठे दरबारे ॥
झूठे निंदकों को पकड़कर ईश्वर ने धरती पर पटका कर मारा है और अपने दरबार में उनको झूठा घोषित कर दिया है।
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਵਡਾ ਹੈ ਆਪਿ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰੇ ॥੨॥
नानक का प्रभु वडा है आपि साजि सवारे ॥२॥
नानक का प्रभु महान है। वह स्वयं ही इन्सान को पैदा करता है और संवारता है॥ २ ॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਬੇਅੰਤੁ ਕਿਛੁ ਅੰਤੁ ਨਾਹਿ ਸਭੁ ਤਿਸੈ ਕਰਣਾ ॥
प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥
प्रभु अनन्त है, उसका कोई अन्त नहीं जाना जा सकता, सब कुछ वही करता है, उसने ही यह सृष्टि बनाई है।
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਸਾਹਿਬੋ ਜੀਆਂ ਕਾ ਪਰਣਾ ॥
अगम अगोचरु साहिबो जीआं का परणा ॥
अगम्य एवं अगोचर प्रभु समस्त जीवों का आधार है।
ਹਸਤ ਦੇਇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਦਾ ਭਰਣ ਪੋਖਣੁ ਕਰਣਾ ॥
हसत देइ प्रतिपालदा भरण पोखणु करणा ॥
अपना हाथ देकर वह सबकी रक्षा करता है। वह सब जीवों का भरण-पोषण करता है।
ਮਿਹਰਵਾਨੁ ਬਖਸਿੰਦੁ ਆਪਿ ਜਪਿ ਸਚੇ ਤਰਣਾ ॥
मिहरवानु बखसिंदु आपि जपि सचे तरणा ॥
वह स्वयं मेहरबान एवं क्षमाशील है। उस सच्चे मालिक का जाप करने से प्राणी (भवसागर) से पार हो जाता है।
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਭਲਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਰਣਾ ॥੨੦॥
जो तुधु भावै सो भला नानक दास सरणा ॥२०॥
नानक का कथन है, हे प्रभु! जो कुछ तुझे उपयुक्त लगता है, केवल वही भला है, हम प्राणी तेरी शरण में हैं।॥ २० ॥
ਸਲੋਕ ਮਃ ੫ ॥
सलोक मः ५ ॥
श्लोक महला ५॥
ਤਿੰਨਾ ਭੁਖ ਨ ਕਾ ਰਹੀ ਜਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭੁ ਹੈ ਸੋਇ ॥
तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥
जिस व्यक्ति का सहारा वह परमात्मा आप है, उसे कोई भूख नहीं रहती।
ਨਾਨਕ ਚਰਣੀ ਲਗਿਆ ਉਧਰੈ ਸਭੋ ਕੋਇ ॥੧॥
नानक चरणी लगिआ उधरै सभो कोइ ॥१॥
हे नानक ! भगवान के चरणों में लगने से प्रत्येक प्राणी का उद्धार हो जाता है॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५ ॥
ਜਾਚਿਕੁ ਮੰਗੈ ਨਿਤ ਨਾਮੁ ਸਾਹਿਬੁ ਕਰੇ ਕਬੂਲੁ ॥
जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥
जो पुरुष याचक बनकर प्रभु-परमेश्वर से नाम की देन माँगता है, उसकी प्रार्थना वह स्वीकार कर लेता है।
ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸਰੁ ਜਜਮਾਨੁ ਤਿਸਹਿ ਭੁਖ ਨ ਮੂਲਿ ॥੨॥
नानक परमेसरु जजमानु तिसहि भुख न मूलि ॥२॥
हे नानक ! जिस पुरुष का यजमान (स्वयं) परमात्मा है, उसे थोड़ी-सी भी भूख नहीं रहती ॥ २॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी।
ਮਨੁ ਰਤਾ ਗੋਵਿੰਦ ਸੰਗਿ ਸਚੁ ਭੋਜਨੁ ਜੋੜੇ ॥
मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥
जिस व्यक्ति का मन गोविन्द के साथ मग्न हो जाता है, उसके लिए उसका नाम ही उत्तम भोजन एवं पहरावा बन जाता है।
ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਗੀ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸਿਉ ਏ ਹਸਤੀ ਘੋੜੇ ॥
प्रीति लगी हरि नाम सिउ ए हसती घोड़े ॥
हरि के नाम के साथ उसका प्रेम बन जाता है, यही उसके लिए हाथी एवं घोड़े हैं।
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਖੁਸੀਆ ਘਣੀ ਧਿਆਇ ਮੁਖੁ ਨ ਮੋੜੇ ॥
राज मिलख खुसीआ घणी धिआइ मुखु न मोड़े ॥
उसके लिए तो सहर्ष भगवान के नाम का ध्यान ही राज्य, सम्पति एवं अनन्त प्रसन्नता होती है।
ਢਾਢੀ ਦਰਿ ਪ੍ਰਭ ਮੰਗਣਾ ਦਰੁ ਕਦੇ ਨ ਛੋੜੇ ॥
ढाढी दरि प्रभ मंगणा दरु कदे न छोड़े ॥
ढाढी ने ईश्वर के द्वार की ही याचना करनी है, जो उसने कभी नहीं त्यागना।
ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਤਨਿ ਚਾਉ ਏਹੁ ਨਿਤ ਪ੍ਰਭ ਕਉ ਲੋੜੇ ॥੨੧॥੧॥ ਸੁਧੁ ਕੀਚੇ
नानक मनि तनि चाउ एहु नित प्रभ कउ लोड़े ॥२१॥१॥ सुधु कीचे
हे नानक ! उसके मन एवं शरीर में सदैव उमंग बनी रहती है, तथा वह हमेशा ईश्वर से मिलन की ही अभिलाषा करता है॥ २१॥ १॥
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਭਗਤਾਂ ਕੀ ਬਾਣੀ
रागु गउड़ी भगतां की बाणी
रागु गउड़ी भगतां की बाणी
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਸ੍ਰੀ ਕਬੀਰ ਜੀਉ ਕੇ ਚਉਪਦੇ ੧੪ ॥
गउड़ी गुआरेरी स्री कबीर जीउ के चउपदे १४ ॥
गउड़ी गुआरेरी श्री कबीर जीउ के चउपदे १४ ॥
ਅਬ ਮੋਹਿ ਜਲਤ ਰਾਮ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ॥
अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥
अब मुझ तृष्णा में जल रहेको राम नाम रूपी अमृत (जल) मिल गया है।
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਤਨੁ ਜਲਤ ਬੁਝਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
राम उदकि तनु जलत बुझाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
राम नाम रूपी अमृत (जल) ने मेरे जलते शरीर को शीतल कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
ਮਨੁ ਮਾਰਣ ਕਾਰਣਿ ਬਨ ਜਾਈਐ ॥
मनु मारण कारणि बन जाईऐ ॥
कुछ लोग अपने मन को वश में करने के लिए वनों में जाते हैं
ਸੋ ਜਲੁ ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਨ ਪਾਈਐ ॥੧॥
सो जलु बिनु भगवंत न पाईऐ ॥१॥
परन्तु तृष्णाग्नि को बुझाने हेतु नाम रूपी अमृत (जल) भगवान के बिना नहीं मिलता ॥ १॥
ਜਿਹ ਪਾਵਕ ਸੁਰਿ ਨਰ ਹੈ ਜਾਰੇ ॥
जिह पावक सुरि नर है जारे ॥
जिस तृष्णा की अग्नि ने देवते एवं मनुष्य जला दिए हैं,”
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਜਨ ਜਲਤ ਉਬਾਰੇ ॥੨॥
राम उदकि जन जलत उबारे ॥२॥
राम नाम रूपी अमृत ने भक्तों को उस तृष्णाग्नि से बचा लिया है॥ २॥
ਭਵ ਸਾਗਰ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਮਾਹੀ ॥
भव सागर सुख सागर माही ॥
भवसागर में ही एक सुखों का सागर है।
ਪੀਵਿ ਰਹੇ ਜਲ ਨਿਖੁਟਤ ਨਾਹੀ ॥੩॥
पीवि रहे जल निखुटत नाही ॥३॥
मैं नाम रूपी अमृत पान करता जाता हूँ परन्तु अमृत समाप्त नहीं होता॥ ३॥
ਕਹਿ ਕਬੀਰ ਭਜੁ ਸਾਰਿੰਗਪਾਨੀ ॥
कहि कबीर भजु सारिंगपानी ॥
कबीर जी कहते हैं – उस भगवान का ही भजन करो चूंकि
ਰਾਮ ਉਦਕਿ ਮੇਰੀ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਨੀ ॥੪॥੧॥
राम उदकि मेरी तिखा बुझानी ॥४॥१॥
राम नाम रूपी अमृत ने मेरी तृष्णा मिटा दी है॥ ४॥ १॥
ਗਉੜੀ ਕਬੀਰ ਜੀ ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
गउड़ी कबीर जी ॥
ਮਾਧਉ ਜਲ ਕੀ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਇ ॥
माधउ जल की पिआस न जाइ ॥
हे माधव ! तेरे नाम रूपी अमृत के लिए मेरी प्यास नहीं मिटती।
ਜਲ ਮਹਿ ਅਗਨਿ ਉਠੀ ਅਧਿਕਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जल महि अगनि उठी अधिकाइ ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा नाम-अमृत पान करते हुए तीव्र लालसा उत्पन्न हो रही है॥ १॥ रहाउ॥
ਤੂੰ ਜਲਨਿਧਿ ਹਉ ਜਲ ਕਾ ਮੀਨੁ ॥
तूं जलनिधि हउ जल का मीनु ॥
हे ईश्वर ! तू जल की निधि है और मैं उस जल की एक मछली हूँ।
ਜਲ ਮਹਿ ਰਹਉ ਜਲਹਿ ਬਿਨੁ ਖੀਨੁ ॥੧॥
जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ॥१॥
मैं (मछली) जल में ही रहती हूँ और जल के बिना नाश हो जाती हूँ॥ १॥
ਤੂੰ ਪਿੰਜਰੁ ਹਉ ਸੂਅਟਾ ਤੋਰ ॥
तूं पिंजरु हउ सूअटा तोर ॥
हे भगवान ! तू मेरा पिंजरा है और मैं तेरा तोता हूँ,
ਜਮੁ ਮੰਜਾਰੁ ਕਹਾ ਕਰੈ ਮੋਰ ॥੨॥
जमु मंजारु कहा करै मोर ॥२॥
यम-रूपी विडाल मेरा क्या बिगाड़ सकता है ? ॥ २॥
ਤੂੰ ਤਰਵਰੁ ਹਉ ਪੰਖੀ ਆਹਿ ॥
तूं तरवरु हउ पंखी आहि ॥
हे प्रभु ! तू सुन्दर वृक्ष है और मैं एक पक्षी हूँ।
ਮੰਦਭਾਗੀ ਤੇਰੋ ਦਰਸਨੁ ਨਾਹਿ ॥੩॥
मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ॥३॥
(मुझ) भाग्यहीन को अब तक तेरे दर्शन नहीं हुए॥ ३॥