Hindi Page 369

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਘਰੁ ੮ ਕੇ ਕਾਫੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
रागु आसा घरु ८ के काफी महला ४ ॥
रागु आसा घरु ८ के काफी महला ४ ॥

ਆਇਆ ਮਰਣੁ ਧੁਰਾਹੁ ਹਉਮੈ ਰੋਈਐ ॥
आइआ मरणु धुराहु हउमै रोईऐ ॥
हे भाई ! मृत्यु तो जन्म से ही लिखी हुई है। किसी की मृत्यु पर लोग अपने अहंकार के कारण ही रोते हैं।

ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਈਐ ॥੧॥
गुरमुखि नामु धिआइ असथिरु होईऐ ॥१॥
गुरुमुख बनकर प्रभु का ध्यान करने से जीव सदैव अटल हो जाता है॥ १॥

ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਸਾਬਾਸਿ ਚਲਣੁ ਜਾਣਿਆ ॥
गुर पूरे साबासि चलणु जाणिआ ॥
पूर्ण गुरु को शाबाश है, जिनके द्वारा यह ज्ञान प्राप्त होता है कि सभी ने यहाँ से चले जांना है (अर्थात् मृत्यु अटल है)”

ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ਸਬਦਿ ਸਮਾਣਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
लाहा नामु सु सारु सबदि समाणिआ ॥१॥ रहाउ ॥
जो व्यक्ति उत्तम नाम का लाभ प्राप्त करते हैं वे ब्रह्म-शब्द में लीन हो जाते हैं। १॥ रहाउ॥

ਪੂਰਬਿ ਲਿਖੇ ਡੇਹ ਸਿ ਆਏ ਮਾਇਆ ॥
पूरबि लिखे डेह सि आए माइआ ॥
हे मेरी माता ! पूर्व जन्म के लिखे कर्मो अनुसार जिन्हें जीवन के दिन प्राप्त होते हैं वे संसार में आते हैं।

ਚਲਣੁ ਅਜੁ ਕਿ ਕਲ੍ਹ੍ਹਿ ਧੁਰਹੁ ਫੁਰਮਾਇਆ ॥੨॥
चलणु अजु कि कल्हि धुरहु फुरमाइआ ॥२॥
आज अथवा कल मनुष्य ने अवश्य ही इहलोक से चले जाना है जैसा कि आदि से परमेश्वर का हुक्म है॥ २॥

ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਤਿਨਾ ਜਿਨੑੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ॥
बिरथा जनमु तिना जिन्ही नामु विसारिआ ॥
जिन्होंने प्रभु-नाम को विस्मृत कर दिया है, उनका जन्म व्यर्थ है।

ਜੂਐ ਖੇਲਣੁ ਜਗਿ ਕਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਹਾਰਿਆ ॥੩॥
जूऐ खेलणु जगि कि इहु मनु हारिआ ॥३॥
उन्होंने संसार में जुए का खेल खेला और इस खेल में अपना मन पराजित कर दिया ॥ ३॥

ਜੀਵਣਿ ਮਰਣਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਜਿਨੑਾ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
जीवणि मरणि सुखु होइ जिन्हा गुरु पाइआ ॥
जिन मनुष्यों को गुरु प्राप्त हुआ है, वे जन्म-मरण में भी सुख की अनुभूति करते हैं।

ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੪॥੧੨॥੬੪॥
नानक सचे सचि सचि समाइआ ॥४॥१२॥६४॥
हे नानक ! सत्यवादी जीव सत्य के कारण परम सत्य में ही समा जाते हैं।॥ ४॥ १२॥ ६४॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥

ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥
जिसने बहुमूल्य मनुष्य जन्म प्राप्त करके प्रभु-नाम का ध्यान किया है,”

ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੁਝਿ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੧॥
गुर परसादी बुझि सचि समाइआ ॥१॥
गुरु की कृपा से (मनुष्य-जन्म के) मनोरथ को समझकर वह सत्य में ही समा गया है॥ १॥

ਜਿਨੑ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਤਿਨੑੀ ਨਾਮੁ ਕਮਾਇਆ ॥
जिन्ह धुरि लिखिआ लेखु तिन्ही नामु कमाइआ ॥
जिन मनुष्यों के आदि से ही मस्तक पर भाग्य लिखा हुआ है, उन्होंने प्रभु-नाम की कमाई की है।

ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
दरि सचै सचिआर महलि बुलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
उन सत्यवादियों को सच्चे परमात्मा ने अपने महल में आमंत्रित कर लिया है॥ १॥ रहाउ ॥

ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ॥
अंतरि नामु निधानु गुरमुखि पाईऐ ॥
हमारे अन्तर्मन में नाम का खजाना विद्यमान है परन्तु यह गुरु के सम्मुख होकर ही मिलता है।

ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਈਐ ॥੨॥
अनदिनु नामु धिआइ हरि गुण गाईऐ ॥२॥
रात-दिन हरि नाम का ध्यान करते रहना चाहिए और हरि का स्तुतिगान करना चाहिए॥ २॥

ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਅਨੇਕ ਮਨਮੁਖਿ ਨਹੀ ਪਾਈਐ ॥
अंतरि वसतु अनेक मनमुखि नही पाईऐ ॥
हमारी अन्तरात्मा में अनेक पदार्थ हैं परन्तु मनमुख मनुष्य को ये प्राप्त नहीं होते।

ਹਉਮੈ ਗਰਬੈ ਗਰਬੁ ਆਪਿ ਖੁਆਈਐ ॥੩॥
हउमै गरबै गरबु आपि खुआईऐ ॥३॥
अहंकार के कारण स्वेच्छाचारी मनुष्य अभिमान करता है और अपने आपको नष्ट कर लेता है॥ ३॥

ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪਿ ਖੁਆਈਐ ॥
नानक आपे आपि आपि खुआईऐ ॥
हे नानक ! अपने कर्मो के कारण मनुष्य अपने आप का नाश कर लेता है

ਗੁਰਮਤਿ ਮਨਿ ਪਰਗਾਸੁ ਸਚਾ ਪਾਈਐ ॥੪॥੧੩॥੬੫॥
गुरमति मनि परगासु सचा पाईऐ ॥४॥१३॥६५॥
लेकिन गुरु की मति से मन में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है और सत्य (परमेश्वर) मिल जाता है। ४॥ १३॥ ६५ ॥

ਰਾਗੁ ਆਸਾਵਰੀ ਘਰੁ ੧੬ ਕੇ ੨ ਮਹਲਾ ੪ ਸੁਧੰਗ
रागु आसावरी घरु १६ के २ महला ४ सुधंग
रागु आसावरी घरु १६ के २ महला ४ सुधंग

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਹਉ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕੀਰਤਨੁ ਕਰਉ ॥
हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥
मैं निशदिन हरि-नाम का भजन करता रहता हूँ।

ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੋ ਕਉ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਤਾਇਆ ਹਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सतिगुरि मो कउ हरि नामु बताइआ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुरु ने मुझे हरि-नाम (का भेद) बताया है। (इसलिए) अब मैं हरि के बिना एक क्षण अथवा पल भर भी नहीं रह सकता॥ १॥ रहाउ॥

ਹਮਰੈ ਸ੍ਰਵਣੁ ਸਿਮਰਨੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਹਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕਉ ਹਉ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ॥
हमरै स्रवणु सिमरनु हरि कीरतनु हउ हरि बिनु रहि न सकउ हउ इकु खिनु ॥
हरि का भजन सुनना और उसका सुमिरन करना ही मेरे पास है। हरि के बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता।

ਜੈਸੇ ਹੰਸੁ ਸਰਵਰ ਬਿਨੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕੈ ਤੈਸੇ ਹਰਿ ਜਨੁ ਕਿਉ ਰਹੈ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ॥੧॥
जैसे हंसु सरवर बिनु रहि न सकै तैसे हरि जनु किउ रहै हरि सेवा बिनु ॥१॥
जैसे राजहंस सरोवर के बिना नहीं रह सकता, वैसे ही हरि का भक्त हरि की भक्ति के बिना कैसे रह सकता है ?॥ १॥

ਕਿਨਹੂੰ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਰਿਦ ਧਾਰਿ ਕਿਨਹੂੰ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਮੋਹ ਅਪਮਾਨ ॥
किनहूं प्रीति लाई दूजा भाउ रिद धारि किनहूं प्रीति लाई मोह अपमान ॥
कई मनुष्य द्वैतभाव से प्रेम करते तथा इसे अपने हृदय में बसाते हैं। कई मनुष्य मोह-माया एवं अभिमान से प्रीति लगाकर रखते हैं।

ਹਰਿ ਜਨ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਹਰਿ ਨਿਰਬਾਣ ਪਦ ਨਾਨਕ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਗਵਾਨ ॥੨॥੧੪॥੬੬॥
हरि जन प्रीति लाई हरि निरबाण पद नानक सिमरत हरि हरि भगवान ॥२॥१४॥६६॥
हरि का भक्त हरि के निर्वाण पद से प्रेम लगाकर रखता है लेकिन नानक तो श्रीहरि भगवान का ही सिमरन करता रहता है॥ २ ॥ १४ ॥ ६६ ॥

ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसावरी महला ४ ॥
आसावरी महला ४ ॥

ਮਾਈ ਮੋਰੋ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਰਾਮੁ ਬਤਾਵਹੁ ਰੀ ਮਾਈ ॥
माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥
हे मेरी माता! मुझे मेरे प्रियतम राम के बारे में कुछ बताओ।

ਹਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕਉ ਜੈਸੇ ਕਰਹਲੁ ਬੇਲਿ ਰੀਝਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे करहलु बेलि रीझाई ॥१॥ रहाउ ॥
मैं वैसे ही हरि के बिना एक क्षण पल भर के लिए भी रह नहीं सकता, जैसे ऊँट बेलों को देखकर रीझता है और सदैव खुश होता है॥ १॥ रहाउ॥

ਹਮਰਾ ਮਨੁ ਬੈਰਾਗ ਬਿਰਕਤੁ ਭਇਓ ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਮੀਤ ਕੈ ਤਾਈ ॥
हमरा मनु बैराग बिरकतु भइओ हरि दरसन मीत कै ताई ॥
हरि रूपी मित्र के दर्शन हेतु मेरा मन वैरागी एवं विरक्त हो गया है।

ਜੈਸੇ ਅਲਿ ਕਮਲਾ ਬਿਨੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕੈ ਤੈਸੇ ਮੋਹਿ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
जैसे अलि कमला बिनु रहि न सकै तैसे मोहि हरि बिनु रहनु न जाई ॥१॥
जैसे भवराँ कमल के फूल बिना नहीं रह सकता वैसे ही हरि के बिना मैं भी रह नहीं सकता ॥ १॥

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