ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
बिलावलु महला १ ॥
बिलावलु महला १ ॥
ਮਨ ਕਾ ਕਹਿਆ ਮਨਸਾ ਕਰੈ ॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥
जो मन कहता है, वही संकल्प करता है।
ਇਹੁ ਮਨੁ ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਉਚਰੈ ॥
इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥
यह मन ही पाप-पुण्य की बात कहता है।
ਮਾਇਆ ਮਦਿ ਮਾਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥
माया के नशे में मस्त होकर भी इसकी तृप्ति नहीं होती।
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਮੁਕਤਿ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਭਾਵੈ ॥੧॥
त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥
यदि मन को सत्य भा जाए तो तृप्ति एवं मुक्ति हो जाती है॥ १॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਕਲਤੁ ਸਭੁ ਦੇਖੁ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥
हे जीव ! देख ले, यह तन, धन एवं सुन्दर नारी सब अभिमान ही हैं और
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभु नाम के बिना कुछ भी तेरे साथ नहीं जाना॥ १॥ रहाउ॥
ਕੀਚਹਿ ਰਸ ਭੋਗ ਖੁਸੀਆ ਮਨ ਕੇਰੀ ॥
कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥
मन की खुशी के लिए जीव कितने ही रसों का भोग करता है।
ਧਨੁ ਲੋਕਾਂ ਤਨੁ ਭਸਮੈ ਢੇਰੀ ॥
धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥
लेकिन मरणोपरांत जीव का धन अन्य लोगों का हो जाता है और तन जलकर भस्म की ढेरी बन जाता है।
ਖਾਕੂ ਖਾਕੁ ਰਲੈ ਸਭੁ ਫੈਲੁ ॥
खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥
मिट्टी का यह सारा प्रसार मिट्टी में ही मिल जाता है।
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਹੀ ਉਤਰੈ ਮੈਲੁ ॥੨॥
बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥
शब्द के बिना मन की मैल कभी नहीं उतरती ॥ २॥
ਗੀਤ ਰਾਗ ਘਨ ਤਾਲ ਸਿ ਕੂਰੇ ॥
गीत राग घन ताल सि कूरे ॥
अनेक प्रकार के गीत, राग एवं ताल इत्यादि सब झूठे हैं।
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਦੂਰੇ ॥
त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥
त्रिगुणात्मक जीव उत्पन्न होते हैं और नाश होते रहते हैं तथा यह प्रभु मिलाप से दूर ही रहते हैं।
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦਰਦੁ ਨ ਜਾਇ ॥
दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥
द्वैतभाव में मनुष्य की दुर्मति एवं दर्द दूर नहीं होता।
ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਾਰੂ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੩॥
छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥३॥
प्रभु का गुणगान रूपी औषधि से गुरुमुख छूट जाता है॥ ३॥
ਧੋਤੀ ਊਜਲ ਤਿਲਕੁ ਗਲਿ ਮਾਲਾ ॥
धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥
जो व्यक्ति उज्जवल धोती पहनता है, माथे पर तिलक लगाता है और गले में माला पहनता है,
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਪੜਹਿ ਨਾਟ ਸਾਲਾ ॥
अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥
यदि उसके मन में क्रोध है तो समझो, वह नाट्यशाला में संवाद पढ़ रहा है।
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਮਾਇਆ ਮਦੁ ਪੀਆ ॥
नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥
जिस ने नाम को भुलाकर माया रूपी मदिरा का पान किया है,
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨਾਹੀ ਸੁਖੁ ਥੀਆ ॥੪॥
बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥४॥
उसे गुरु-भक्ति के बिना सुख उपलब्ध नहीं हुआ ॥ ४॥
ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਗਰਧਭ ਮੰਜਾਰਾ ॥
सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥
वे सूअर, कुत्ते, गधे, बिल्ली,
ਪਸੂ ਮਲੇਛ ਨੀਚ ਚੰਡਾਲਾ ॥
पसू मलेछ नीच चंडाला ॥
पशु, म्लेच्छ एवं नीच चाण्डालों की योनियों में भटकते रहते हैं
ਗੁਰ ਤੇ ਮੁਹੁ ਫੇਰੇ ਤਿਨੑ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ॥
गुर ते मुहु फेरे तिन्ह जोनि भवाईऐ ॥
जो व्यक्ति गुरु से मुँह फेर लेते हैं,
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਆਈਐ ਜਾਈਐ ॥੫॥
बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥५॥
और बन्धनों में फँसकर जन्मते मरते रहते हैं।॥ ५॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਲਹੈ ਪਦਾਰਥੁ ॥
गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥
गुरु की सेवा करने से ही जीव को नाम-पदार्थ मिलता है और
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਕਿਰਤਾਰਥੁ ॥
हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥
हृदय में नाम स्थित होने से वह सदा के लिए कृतार्थ हो जाता है।
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਪੂਛ ਨ ਹੋਇ ॥
साची दरगह पूछ न होइ ॥
इस तरह सत्य के दरबार में उसके कर्मो की पूछताछ नहीं होती।
ਮਾਨੇ ਹੁਕਮੁ ਸੀਝੈ ਦਰਿ ਸੋਇ ॥੬॥
माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥६॥
जो व्यक्ति भगवान के हुक्म को मानता है, वही उसके दरबार में मंजूर हो जाता है।॥ ६॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਤਿਸ ਕਉ ਜਾਣੈ ॥
सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥
यदि मनुष्य को सतगुरु मिल जाए तो वह प्रभु को जान लेता है।
ਰਹੈ ਰਜਾਈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥
रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥
जो उसकी रज़ा में रहता है, वही उसके हुक्म को पहचान लेता है,
ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿ ਸਚੈ ਦਰਿ ਵਾਸੁ ॥
हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥
वह उसके हुक्म को पहचान कर सत्य के द्वार में निवास पा लेता है,
ਕਾਲ ਬਿਕਾਲ ਸਬਦਿ ਭਏ ਨਾਸੁ ॥੭॥
काल बिकाल सबदि भए नासु ॥७॥
शब्द द्वारा जन्म-मरण का नाश हो जाता है॥ ७ ॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਜਾਣੈ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ॥
रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥
जो जगत् से निर्लिप्त रहता है, वह सबकुछ प्रभु का ही समझता है।
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪੈ ਹੈ ਇਹੁ ਜਿਸ ਕਾ ॥
तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥
वह अपना तन-मन उसे अर्पण कर देता है, जिसने उसे बनाया है
ਨਾ ਓਹੁ ਆਵੈ ਨਾ ਓਹੁ ਜਾਇ ॥
ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥
हे नानक ! ऐसा व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से छूटकर
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥੮॥੨॥
नानक साचे साचि समाइ ॥८॥२॥
परम सत्य में ही समा जाता है॥ ८ ॥ २॥
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀ ਘਰੁ ੧੦
बिलावलु महला ३ असटपदी घरु १०
बिलावलु महला ३ असटपदी घरु १०
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਜਗੁ ਕਊਆ ਮੁਖਿ ਚੁੰਚ ਗਿਆਨੁ ॥
जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥
यह जगत् कौआ है, जो मुंह रूपी चोंच से थोड़ी ज्ञान की बात तो करता है।
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਝੂਠੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
अंतरि लोभु झूठु अभिमानु ॥
किन्तु इसके अन्तर्मन में लोभ, झूठ एवं अभिमान ही भरा हुआ है।
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਾਜੁ ਲਹਗੁ ਨਿਦਾਨਿ ॥੧॥
बिनु नावै पाजु लहगु निदानि ॥१॥
नाम के बिना इसका अंत में पाखण्ड प्रगट हो जाएगा।॥ १॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਚੀਤਿ ॥
सतिगुर सेवि नामु वसै मनि चीति ॥
सतगुरु की सेवा करने से परमात्मा का नाम मन एवं चित्त में आ बसता है।
ਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਚੇਤਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰ ਝੂਠੁ ਪਰੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गुरु भेटे हरि नामु चेतावै बिनु नावै होर झूठु परीति ॥१॥ रहाउ ॥
जिसे गुरु मिल जाता है, वह उसे हरि नाम ही याद करवाता है। नाम के बिना अन्य सब प्रेम झूठे हैं।॥ १॥ रहाउ॥
ਗੁਰਿ ਕਹਿਆ ਸਾ ਕਾਰ ਕਮਾਵਹੁ ॥
गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥
गुरु के निर्देशानुसार ही कार्य करो।
ਸਬਦੁ ਚੀਨੑਿ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ॥
सबदु चीन्हि सहज घरि आवहु ॥
शब्द को पहचान कर सहजावस्था में आ जाओ और
ਸਾਚੈ ਨਾਇ ਵਡਾਈ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
साचै नाइ वडाई पावहु ॥२॥
सत्य नाम द्वारा बड़ाई प्राप्त करो ॥ २ ॥
ਆਪਿ ਨ ਬੂਝੈ ਲੋਕ ਬੁਝਾਵੈ ॥
आपि न बूझै लोक बुझावै ॥
जो व्यक्ति स्वयं तो कुछ समझता नहीं किन्तु लोगों को समझाता रहता है,
ਮਨ ਕਾ ਅੰਧਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਵੈ ॥
मन का अंधा अंधु कमावै ॥
वह मन का अन्धा है और अन्धे काम ही करता है।
ਦਰੁ ਘਰੁ ਮਹਲੁ ਠਉਰੁ ਕੈਸੇ ਪਾਵੈ ॥੩॥
दरु घरु महलु ठउरु कैसे पावै ॥३॥
फिर ऐसा व्यक्ति प्रभु के दरबार में कैसे स्थान प्राप्त कर सकता है॥ ३॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੇਵੀਐ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
हरि जीउ सेवीऐ अंतरजामी ॥
अन्तर्यामी परमात्मा की उपासना करनी चाहिए,
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਜਿਸ ਕੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨੀ ॥
घट घट अंतरि जिस की जोति समानी ॥
जिसकी ज्योति घट-घट में समा रही है।
ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਕਿਆ ਚਲੈ ਪਹਨਾਮੀ ॥੪॥
तिसु नालि किआ चलै पहनामी ॥४॥
उससे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता ॥ ४॥