ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਤੁਧੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਜਾਤਿ ਤੂ ਵਰਨਾ ਬਾਹਰਾ ॥
तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥
हे इंश्वर ! न कोई तेरा रूप-आकार है, न तेरी कोई जाति है और तू ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र इत्यादि वर्णो से भी रहित है।
ਏ ਮਾਣਸ ਜਾਣਹਿ ਦੂਰਿ ਤੂ ਵਰਤਹਿ ਜਾਹਰਾ ॥
ए माणस जाणहि दूरि तू वरतहि जाहरा ॥
ये मानव तुझे दूर ही समझते हैं मगर तू प्रत्यक्ष रूप में व्याप्त है।
ਤੂ ਸਭਿ ਘਟ ਭੋਗਹਿ ਆਪਿ ਤੁਧੁ ਲੇਪੁ ਨ ਲਾਹਰਾ ॥
तू सभि घट भोगहि आपि तुधु लेपु न लाहरा ॥
सब शरीरों को तू स्वयं ही भोगता है परन्तु तुझे कोई दोष नहीं लगता।
ਤੂ ਪੁਰਖੁ ਅਨੰਦੀ ਅਨੰਤ ਸਭ ਜੋਤਿ ਸਮਾਹਰਾ ॥
तू पुरखु अनंदी अनंत सभ जोति समाहरा ॥
तू परमपुरुष, परम आनंदी एवं अनंत है, सबमें तेरी ही ज्योति समाई हुई है।
ਤੂ ਸਭ ਦੇਵਾ ਮਹਿ ਦੇਵ ਬਿਧਾਤੇ ਨਰਹਰਾ ॥
तू सभ देवा महि देव बिधाते नरहरा ॥
हे विधाता ! तू ही देवाधिदेव है।
ਕਿਆ ਆਰਾਧੇ ਜਿਹਵਾ ਇਕ ਤੂ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਪਰਪਰਾ ॥
किआ आराधे जिहवा इक तू अबिनासी अपरपरा ॥
तू अविनाशी एवं अपरंपार है, एक जीभ तेरी क्या आराधना कर सकती है।
ਜਿਸੁ ਮੇਲਹਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪਿ ਤਿਸ ਕੇ ਸਭਿ ਕੁਲ ਤਰਾ ॥
जिसु मेलहि सतिगुरु आपि तिस के सभि कुल तरा ॥
जिसे तू सतगुरु से मिला देता है, उसकी समूची वंशावलि का उद्धार हो जाता है।
ਸੇਵਕ ਸਭਿ ਕਰਦੇ ਸੇਵ ਦਰਿ ਨਾਨਕੁ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ॥੫॥
सेवक सभि करदे सेव दरि नानकु जनु तेरा ॥५॥
सभी भक्तजन तेरी उपासना करते हैं। दास नानक भी तेरे द्वार पर तेरी शरण में आ पड़ा है॥ ५॥
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे मः ५ ॥
डखणे महला ५॥
ਗਹਡੜੜਾ ਤ੍ਰਿਣਿ ਛਾਇਆ ਗਾਫਲ ਜਲਿਓਹੁ ਭਾਹਿ ॥
गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥
आदमी का घास से बना छप्पर रूपी शरीर लापरवाही के कारण पाप-विकारों की अग्नि से जल गया है,
ਜਿਨਾ ਭਾਗ ਮਥਾਹੜੈ ਤਿਨ ਉਸਤਾਦ ਪਨਾਹਿ ॥੧॥
जिना भाग मथाहड़ै तिन उसताद पनाहि ॥१॥
जिनके माथे पर उत्तम भाग्य है, उन्हें अपने उस्ताद (गुरु-पीर) की पनाह मिल गई है॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਨਾਨਕ ਪੀਠਾ ਪਕਾ ਸਾਜਿਆ ਧਰਿਆ ਆਣਿ ਮਉਜੂਦੁ ॥
नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥
हे नानक ! किसी ने आटा गूंथा, रोटियां पका कर भोजन तैयार कर लिया और सारा भोजन लाकर श्रद्धालुओं के सामने रख दिया।
ਬਾਝਹੁ ਸਤਿਗੁਰ ਆਪਣੇ ਬੈਠਾ ਝਾਕੁ ਦਰੂਦ ॥੨॥
बाझहु सतिगुर आपणे बैठा झाकु दरूद ॥२॥
किन्तु गुरु-पीर के बिना दुआ-प्रार्थना के बगैर उसका मनोरथ पूरा नहीं हुआ, अब वह दुखी हुआ बैठा इधर-उधर झांक रहा है, क्योंकि गुरु के बिना प्रार्थना किए बगैर कैसे भोजन मिलेगा॥ २॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਨਾਨਕ ਭੁਸਰੀਆ ਪਕਾਈਆ ਪਾਈਆ ਥਾਲੈ ਮਾਹਿ ॥
नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥
हे नानक ! किसी ने गुरु वाली मीठी रोटियाँ पकाकर उन्हें थाल में परोस दिया।
ਜਿਨੀ ਗੁਰੂ ਮਨਾਇਆ ਰਜਿ ਰਜਿ ਸੇਈ ਖਾਹਿ ॥੩॥
जिनी गुरू मनाइआ रजि रजि सेई खाहि ॥३॥
जिन्होंने गुरु-पीर को प्रसन्न कर लिया, ये तृप्त होकर रोटियों खा रहे हैं।॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਤੁਧੁ ਜਗ ਮਹਿ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਆ ਵਿਚਿ ਹਉਮੈ ਪਾਈਆ ॥
तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥
हे ईश्वर ! तूने जगत् में खेल रचाया हुआ है और सब जीवों में अहम्-भावना डाल दी है।
ਏਕੁ ਮੰਦਰੁ ਪੰਚ ਚੋਰ ਹਹਿ ਨਿਤ ਕਰਹਿ ਬੁਰਿਆਈਆ ॥
एकु मंदरु पंच चोर हहि नित करहि बुरिआईआ ॥
यह मानव-शरीर एक मन्दिर है, जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी पाँच चोर नित्य ही बुरे कर्म करते हैं।
ਦਸ ਨਾਰੀ ਇਕੁ ਪੁਰਖੁ ਕਰਿ ਦਸੇ ਸਾਦਿ ਲੋੁਭਾਈਆ ॥
दस नारी इकु पुरखु करि दसे सादि लोभाईआ ॥
तूने इन्द्रिय रूपी दस नारियों एवं मन रूपी एक पुरुष को बनाकर शरीर में बसा दिया हैं, यह दसों इन्द्रियाँ विकारों के स्वाद में लीन रहती हैं।
ਏਨਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਣੀ ਮੋਹੀਆ ਨਿਤ ਫਿਰਹਿ ਭਰਮਾਈਆ ॥
एनि माइआ मोहणी मोहीआ नित फिरहि भरमाईआ ॥
माया मोहिनी ने इन्हें मोह लिया है, अतः यह नित्य ही भटकती रहती हैं।
ਹਾਠਾ ਦੋਵੈ ਕੀਤੀਓ ਸਿਵ ਸਕਤਿ ਵਰਤਾਈਆ ॥
हाठा दोवै कीतीओ सिव सकति वरताईआ ॥
तूने अपनी जगत् रूपी खेल के दो हिस्से बनाए हैं, जीव और माया को बनाया है।
ਸਿਵ ਅਗੈ ਸਕਤੀ ਹਾਰਿਆ ਏਵੈ ਹਰਿ ਭਾਈਆ ॥
सिव अगै सकती हारिआ एवै हरि भाईआ ॥
जीव माया के आगे पराजित हुआ है, ईश्वर को ऐसे ही भाया है।
ਇਕਿ ਵਿਚਹੁ ਹੀ ਤੁਧੁ ਰਖਿਆ ਜੋ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਈਆ ॥
इकि विचहु ही तुधु रखिआ जो सतसंगि मिलाईआ ॥
जिन्हें तूने सत्संग में मिलाया है, इनमें से कई जीवों को तूने बचा लिया है।
ਜਲ ਵਿਚਹੁ ਬਿੰਬੁ ਉਠਾਲਿਓ ਜਲ ਮਾਹਿ ਸਮਾਈਆ ॥੬॥
जल विचहु बि्मबु उठालिओ जल माहि समाईआ ॥६॥
जल में से उत्पन्न किया हुआ बुलबुला जल में ही विलीन हो जाता है। ६॥
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे मः ५ ॥
डखणे महला ५॥
ਆਗਾਹਾ ਕੂ ਤ੍ਰਾਘਿ ਪਿਛਾ ਫੇਰਿ ਨ ਮੁਹਡੜਾ ॥
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥
हे मानव ! तू आगे प्रभु-चरणों में पहुँचने की महत्वाकांक्षा कर और संसार की तरफ पीछे मत देख।
ਨਾਨਕ ਸਿਝਿ ਇਵੇਹਾ ਵਾਰ ਬਹੁੜਿ ਨ ਹੋਵੀ ਜਨਮੜਾ ॥੧॥
नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥१॥
हे नानक ! इस मानव-जन्म में ही अपना जीवन सफल कर लो, दोबारा तुम्हारा जन्म नहीं होगा॥ १॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਸਜਣੁ ਮੈਡਾ ਚਾਈਆ ਹਭ ਕਹੀ ਦਾ ਮਿਤੁ ॥
सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥
मेरं सज्जन प्रभु बड़ा रंगीला है, सबका प्यारा मित्र है।
ਹਭੇ ਜਾਣਨਿ ਆਪਣਾ ਕਹੀ ਨ ਠਾਹੇ ਚਿਤੁ ॥੨॥
हभे जाणनि आपणा कही न ठाहे चितु ॥२॥
सब जीव उसे अपना ही समझते हैं और वह किसी का दिल नहीं तोड़ता॥ २॥
ਮਃ ੫ ॥
मः ५ ॥
महला ५॥
ਗੁਝੜਾ ਲਧਮੁ ਲਾਲੁ ਮਥੈ ਹੀ ਪਰਗਟੁ ਥਿਆ ॥
गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥
मैंने रहस्यपूर्ण प्यारे प्रभु को ढूंढ लिया है, वह मेरे समक्ष ही प्रगट हो गया है।
ਸੋਈ ਸੁਹਾਵਾ ਥਾਨੁ ਜਿਥੈ ਪਿਰੀਏ ਨਾਨਕ ਜੀ ਤੂ ਵੁਠਿਆ ॥੩॥
सोई सुहावा थानु जिथै पिरीए नानक जी तू वुठिआ ॥३॥
नानक का कथन है कि हे प्रियतम प्रभु ! वही ह्रदय रूपी स्थान सुन्दर हो गया, जहाँ तू बस गया है॥ ३॥
ਪਉੜੀ ॥
पउड़ी ॥
पउड़ी॥
ਜਾ ਤੂ ਮੇਰੈ ਵਲਿ ਹੈ ਤਾ ਕਿਆ ਮੁਹਛੰਦਾ ॥
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥
हे ईश्वर ! जब तू मेरे साथ है तो अब मुझे किसी पर निर्भर अथवा आश्रित होने की क्या आवश्यकता है।
ਤੁਧੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਮੈਨੋ ਸਉਪਿਆ ਜਾ ਤੇਰਾ ਬੰਦਾ ॥
तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥
सच तो यही है कि तूने सब कुछ मुझे ही दे दिया है और मैं एक तेरा ही सेवक हूँ।
ਲਖਮੀ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਖਾਇ ਖਰਚਿ ਰਹੰਦਾ ॥
लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥
मैं बेशक कितना ही खाता एवं खर्च करता रहता हूँ, मगर धन-दौलत की किसी प्रकार की कमी नहीं आई।
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮੇਦਨੀ ਸਭ ਸੇਵ ਕਰੰਦਾ ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥
चौरासी लाख योनियों के सृष्टि के सब जीव तेरी ही उपासना करते हैं।
ਏਹ ਵੈਰੀ ਮਿਤ੍ਰ ਸਭਿ ਕੀਤਿਆ ਨਹ ਮੰਗਹਿ ਮੰਦਾ ॥
एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥
सब शत्रुओं को तूने मेरा मित्र बना दिया है और अब वे बिल्कुल भी मेरा बुरा नहीं चाहते।
ਲੇਖਾ ਕੋਇ ਨ ਪੁਛਈ ਜਾ ਹਰਿ ਬਖਸੰਦਾ ॥
लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥
जब परमात्मा क्षमावान् है तो फिर कर्मो का हिसाब कोई भी नहीं पूछता।
ਅਨੰਦੁ ਭਇਆ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਮਿਲਿ ਗੁਰ ਗੋਵਿੰਦਾ ॥
अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥
गोविंद गुरु को मिलकर हमने परम सुख पा लिया है और मन में आनंद ही आनंद हो गया है।
ਸਭੇ ਕਾਜ ਸਵਾਰਿਐ ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਵੰਦਾ ॥੭॥
सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥७॥
अगर तू चाहता है तो सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।॥ ७॥
ਡਖਣੇ ਮਃ ੫ ॥
डखणे मः ५ ॥
डखणे महला ५॥
ਡੇਖਣ ਕੂ ਮੁਸਤਾਕੁ ਮੁਖੁ ਕਿਜੇਹਾ ਤਉ ਧਣੀ ॥
डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥
हे मालिक ! मैं तेरे दर्शनों का आकांक्षी हूँ, तेरा मुख कैसा है, कैसे बताऊँ कि
ਫਿਰਦਾ ਕਿਤੈ ਹਾਲਿ ਜਾ ਡਿਠਮੁ ਤਾ ਮਨੁ ਧ੍ਰਾਪਿਆ ॥੧॥
फिरदा कितै हालि जा डिठमु ता मनु ध्रापिआ ॥१॥
मैं किस हाल में भटकता फिरता था, लेकिन जब तुझे देखा तो मन तृप्त हो गया॥ १॥