Hindi Page 1039

ਤੂ ਦਾਤਾ ਹਮ ਸੇਵਕ ਤੇਰੇ ॥
तू दाता हम सेवक तेरे ॥
तू हमारा दाता हैं और हम तेरे सेवक हैं।

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਦੀਜੈ ਗੁਰਿ ਗਿਆਨ ਰਤਨੁ ਦੀਪਾਇਆ ॥੬॥
अम्रित नामु क्रिपा करि दीजै गुरि गिआन रतनु दीपाइआ ॥६॥
कृपा करके नामामृत प्रदान करो, गुरु से ज्ञान रत्न का दीपक आलोकित किया है॥ ६॥

ਪੰਚ ਤਤੁ ਮਿਲਿ ਇਹੁ ਤਨੁ ਕੀਆ ॥
पंच ततु मिलि इहु तनु कीआ ॥
पॉच तत्वों से यह तन बनाया है,

ਆਤਮ ਰਾਮ ਪਾਏ ਸੁਖੁ ਥੀਆ ॥
आतम राम पाए सुखु थीआ ॥
उसमें आत्मा के निवास से सुख उत्पन्न हो गया है।

ਕਰਮ ਕਰਤੂਤਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਪਾਇਆ ॥੭॥
करम करतूति अम्रित फलु लागा हरि नाम रतनु मनि पाइआ ॥७॥
शुभ कमों के फलस्वरूप उसमें अमृत नाम रूपी फल लग गया है और रत्न सरीखा हरि-नाम मन में ही पा लिया है॥ ७॥

ਨਾ ਤਿਸੁ ਭੂਖ ਪਿਆਸ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ना तिसु भूख पिआस मनु मानिआ ॥
जिसका मन हरि से संतुष्ट हो गया है, उसे कोई भूख-प्यारा प्रभावित नहीं करती और

ਸਰਬ ਨਿਰੰਜਨੁ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜਾਨਿਆ ॥
सरब निरंजनु घटि घटि जानिआ ॥
उसने घट-घट में व्याप्त मायातीत ईश्वर द्वारा को जान लिया है।

ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸਿ ਰਾਤਾ ਕੇਵਲ ਬੈਰਾਗੀ ਗੁਰਮਤਿ ਭਾਇ ਸੁਭਾਇਆ ॥੮॥
अम्रित रसि राता केवल बैरागी गुरमति भाइ सुभाइआ ॥८॥
वह वैराग्यगन होकर केवल अमृत रस में ही लीन रहता है और गुरु के उपदेश शोभा का पात्र बन गया है॥ ८॥

ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
अधिआतम करम करे दिनु राती ॥
जो दिन-रात आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति का कर्म करता है,

ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਤੀ ॥
निरमल जोति निरंतरि जाती ॥
उसने निर्मल ज्योति को जान लिया है।

ਸਬਦੁ ਰਸਾਲੁ ਰਸਨ ਰਸਿ ਰਸਨਾ ਬੇਣੁ ਰਸਾਲੁ ਵਜਾਇਆ ॥੯॥
सबदु रसालु रसन रसि रसना बेणु रसालु वजाइआ ॥९॥
उसने आत्मिक रस में लीन होकर रसना से रसीले शब्द द्वारा रसीली ध्वनि वाली बाँसुरी को बजाया है॥ ९॥

ਬੇਣੁ ਰਸਾਲ ਵਜਾਵੈ ਸੋਈ ॥
बेणु रसाल वजावै सोई ॥
वही रसीली बाँसुरी बजाता है

ਜਾ ਕੀ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
जा की त्रिभवण सोझी होई ॥
जिसे तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है।

ਨਾਨਕ ਬੂਝਹੁ ਇਹ ਬਿਧਿ ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਇਆ ॥੧੦॥
नानक बूझहु इह बिधि गुरमति हरि राम नामि लिव लाइआ ॥१०॥
हे नानक ! गुरु-मतानुसार इस विधि को बूझ लो, क्योंकि इससे ही राम नाम में ध्यान लगता है।॥ १०॥

ਐਸੇ ਜਨ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ऐसे जन विरले संसारे ॥
संसार में ऐसे विरले ही व्यक्ति हैं,

ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਹਿ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰੇ ॥
गुर सबदु वीचारहि रहहि निरारे ॥
जो शब्द-गुरु का चिंतन करके निर्लिप्त रहते हैं।

ਆਪਿ ਤਰਹਿ ਸੰਗਤਿ ਕੁਲ ਤਾਰਹਿ ਤਿਨ ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਜਗਿ ਆਇਆ ॥੧੧॥
आपि तरहि संगति कुल तारहि तिन सफल जनमु जगि आइआ ॥११॥
वे स्वयं तो पार होते ही हैं, संगत में आने वालों का वंशावलि सहित उद्धार कर देते हैं और जग में उनका जन्म सफल हुआ है॥ ११॥

ਘਰੁ ਦਰੁ ਮੰਦਰੁ ਜਾਣੈ ਸੋਈ ॥
घरु दरु मंदरु जाणै सोई ॥
वही प्रभु के शरीर रूपी घर, द्वार, मन्दिर रूपी दसम द्वार को जान लेता है,”

ਜਿਸੁ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
जिसु पूरे गुर ते सोझी होई ॥
जिसे पूर्ण गुरु से ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

ਕਾਇਆ ਗੜ ਮਹਲ ਮਹਲੀ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਚਾ ਸਚੁ ਸਾਚਾ ਤਖਤੁ ਰਚਾਇਆ ॥੧੨॥
काइआ गड़ महल महली प्रभु साचा सचु साचा तखतु रचाइआ ॥१२॥
महल का मालिक शरीर रूपी गढ़ में ही रहता है और उस परम-सत्य ने हृदय को सच्चा तख्त बनाया हुआ है।॥ १२॥

ਚਤੁਰ ਦਸ ਹਾਟ ਦੀਵੇ ਦੁਇ ਸਾਖੀ ॥
चतुर दस हाट दीवे दुइ साखी ॥
चौदह भवन एवं सूर्य-चाँद रूपी दो दीये साक्षी हैं कि

ਸੇਵਕ ਪੰਚ ਨਾਹੀ ਬਿਖੁ ਚਾਖੀ ॥
सेवक पंच नाही बिखु चाखी ॥
सेवक-पंचों ने माया रूपी विष को नहीं चखा।

ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਅਨੂਪ ਨਿਰਮੋਲਕ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ॥੧੩॥
अंतरि वसतु अनूप निरमोलक गुरि मिलिऐ हरि धनु पाइआ ॥१३॥
उनके हृदय में अनुपम अमूल्य नाम-वस्तु विद्यमान है और गुरु से मिलकर उन्होंने हरिनाम रूपी धन पा लिया है॥ १३॥

ਤਖਤਿ ਬਹੈ ਤਖਤੈ ਕੀ ਲਾਇਕ ॥
तखति बहै तखतै की लाइक ॥
हृदय रूपी तख्त पर वही बैठता है जो योग्य होता है।

ਪੰਚ ਸਮਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਇਕ ॥
पंच समाए गुरमति पाइक ॥
गुरु ये सेवक पंच सत्य में ही लीन रहते हैं।

ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਹੈ ਭੀ ਹੋਸੀ ਸਹਸਾ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੧੪॥
आदि जुगादी है भी होसी सहसा भरमु चुकाइआ ॥१४॥
आदि-जुगादि से एक ईश्वर ही है, अब भी है, भविष्य में भी उसका ही अस्तित्व होगा। जिसने इस रहस्य को जान लिया है, उसका भ्रम एवं सन्देह दूर हो गया है॥ १४॥

ਤਖਤਿ ਸਲਾਮੁ ਹੋਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
तखति सलामु होवै दिनु राती ॥
हृदय रूपी तख्त पर उस विराजमान को दिन-रात नमन होता है।

ਇਹੁ ਸਾਚੁ ਵਡਾਈ ਗੁਰਮਤਿ ਲਿਵ ਜਾਤੀ ॥
इहु साचु वडाई गुरमति लिव जाती ॥
ईश्वर का यह बड़प्पन है, गुरु की शिक्षा द्वारा ध्यान लगाने से ही उसे जाना जाता है।

ਨਾਨਕ ਰਾਮੁ ਜਪਹੁ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ਹਰਿ ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥੧॥੧੮॥
नानक रामु जपहु तरु तारी हरि अंति सखाई पाइआ ॥१५॥१॥१८॥
हे नानक ! राम नाम जपने से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है और अन्त में वही सहायक साथी प्राप्त होता है॥१५॥१॥१८॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਰੇ ਜਨ ਭਾਈ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਰਹਹੁ ਸਰਣਾਈ ॥
हरि धनु संचहु रे जन भाई ॥ सतिगुर सेवि रहहु सरणाई ॥
हे मेरे भाई, भक्तजनो ! हरि-नाम धन संचय करो; सतगुरु की सेवा में तल्लीन रहो और उसकी शरण में पड़े रहो।

ਤਸਕਰੁ ਚੋਰੁ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾ ਕਉ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਸਬਦਿ ਜਗਾਇਆ ॥੧॥
तसकरु चोरु न लागै ता कउ धुनि उपजै सबदि जगाइआ ॥१॥
इस धन को कोई तस्कर अथवा चोर चुरा नहीं सकता, क्योंकि शब्द ध्वनि द्वारा मन सावधान रहता है॥ १॥

ਤੂ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਰਾਜਾ ॥
तू एकंकारु निरालमु राजा ॥
हे परमात्मा ! तू एकाकार है, मोह-माया से निर्लिप्त है, समूचे विश्व का बादशाह है।

ਤੂ ਆਪਿ ਸਵਾਰਹਿ ਜਨ ਕੇ ਕਾਜਾ ॥
तू आपि सवारहि जन के काजा ॥
तू स्वयं ही अपने भक्तजनों के कार्य संवारता है।

ਅਮਰੁ ਅਡੋਲੁ ਅਪਾਰੁ ਅਮੋਲਕੁ ਹਰਿ ਅਸਥਿਰ ਥਾਨਿ ਸੁਹਾਇਆ ॥੨॥
अमरु अडोलु अपारु अमोलकु हरि असथिर थानि सुहाइआ ॥२॥
अमर, अडोल, अपरंपार, अमूल्य ईश्वर का अटल स्थान भी बहुत सुन्दर हैं।॥२॥

ਦੇਹੀ ਨਗਰੀ ਊਤਮ ਥਾਨਾ ॥
देही नगरी ऊतम थाना ॥
शरीर रूपी नगरी उत्तम स्थान है,

ਪੰਚ ਲੋਕ ਵਸਹਿ ਪਰਧਾਨਾ ॥
पंच लोक वसहि परधाना ॥
जहाँ सत्य, संतोष, नम्रता इत्यादि पाँच लोग रहते हैं।

ਊਪਰਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਇਆ ॥੩॥
ऊपरि एकंकारु निरालमु सुंन समाधि लगाइआ ॥३॥
इन सबके ऊपर एक ओंकार निर्लिप्त होकर शून्य समाधि लगाए बैठा हुआ है॥ ३॥

ਦੇਹੀ ਨਗਰੀ ਨਉ ਦਰਵਾਜੇ ॥
देही नगरी नउ दरवाजे ॥
आँखे, कान, नाक, मुँह इत्यादि शरीर रूपी नगरी के नौ द्वार हैं,

ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਕਰਣੈਹਾਰੈ ਸਾਜੇ ॥
सिरि सिरि करणैहारै साजे ॥
सबकी रचना उस रचयिता ने की है।

ਦਸਵੈ ਪੁਰਖੁ ਅਤੀਤੁ ਨਿਰਾਲਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੪॥
दसवै पुरखु अतीतु निराला आपे अलखु लखाइआ ॥४॥
सबसे निराला एवं मायातीत प्रभु दसम द्वार में रहता है और उस परमपुरुष ने स्वयं ही अपने अदृष्ट रूप को दिखाया है॥ ४॥

ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖੁ ਸਚੇ ਦੀਵਾਨਾ ॥
पुरखु अलेखु सचे दीवाना ॥
कर्मों से रहित उस परमपुरुष का दीवान (न्यायालय) शाश्वत है,

ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ਸਚੁ ਨੀਸਾਨਾ ॥
हुकमि चलाए सचु नीसाना ॥
वह सब पर अपना हुक्म चलाता है और उसका नाम रूपी परवाना अटल है।

ਨਾਨਕ ਖੋਜਿ ਲਹਹੁ ਘਰੁ ਅਪਨਾ ਹਰਿ ਆਤਮ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ॥੫॥
नानक खोजि लहहु घरु अपना हरि आतम राम नामु पाइआ ॥५॥
हे नानक ! ह्रदय-घर में परमात्मा को खोज लो, क्योंकि आत्मा में ही राम नाम पाया जा सकता है ॥५॥

error: Content is protected !!