ਗੁਣ ਰਮੰਤ ਦੂਖ ਨਾਸਹਿ ਰਿਦ ਭਇਅੰਤ ਸਾਂਤਿ ॥੩॥
गुण रमंत दूख नासहि रिद भइअंत सांति ॥३॥
उसका गुणानुवाद करने से दुख नाश हो जाते हैं और हृदय को शान्ति प्राप्त होती है।॥३॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤਾ ਰਸੁ ਪੀਉ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤ ॥੪॥੪॥੧੫॥
अम्रिता रसु पीउ रसना नानक हरि रंगि रात ॥४॥४॥१५॥
नानक की विनती है कि ईश्वर के रंग में लीन होकर रसना से हरिनाम रूपी अमृत रस का पान करो॥४॥४॥१५॥
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
ਸਾਜਨਾ ਸੰਤ ਆਉ ਮੇਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
साजना संत आउ मेरै ॥१॥ रहाउ ॥
हे सज्जनो, संत पुरुषो ! मेरे पास आओ॥१॥रहाउ॥
ਆਨਦਾ ਗੁਨ ਗਾਇ ਮੰਗਲ ਕਸਮਲਾ ਮਿਟਿ ਜਾਹਿ ਪਰੇਰੈ ॥੧॥
आनदा गुन गाइ मंगल कसमला मिटि जाहि परेरै ॥१॥
संतों के संग परमात्मा का गुणानुवाद करने से आनंद एवं खुशियां मिलती हैं और सब पाप-दोष मिट जाते हैं।॥१॥
ਸੰਤ ਚਰਨ ਧਰਉ ਮਾਥੈ ਚਾਂਦਨਾ ਗ੍ਰਿਹਿ ਹੋਇ ਅੰਧੇਰੈ ॥੨॥
संत चरन धरउ माथै चांदना ग्रिहि होइ अंधेरै ॥२॥
संतों के चरणों में शीश नवाने से अंधेरे घर में रोशनी हो जाती है।॥२॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕਮਲੁ ਬਿਗਸੈ ਗੋਬਿੰਦ ਭਜਉ ਪੇਖਿ ਨੇਰੈ ॥੩॥
संत प्रसादि कमलु बिगसै गोबिंद भजउ पेखि नेरै ॥३॥
संतों की कृपा से हृदय कमल खिल उठता है और ईश्वर को निकट मानकर उसका ही भजन होता है।॥३॥
ਪ੍ਰਭ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਸੰਤ ਪਾਏ ਵਾਰਿ ਵਾਰਿ ਨਾਨਕ ਉਹ ਬੇਰੈ ॥੪॥੫॥੧੬॥
प्रभ क्रिपा ते संत पाए वारि वारि नानक उह बेरै ॥४॥५॥१६॥
हे नानक ! प्रभु की कृपा से जब संतों को पाया था, उस शुभ समय पर कुर्बान जाता हूँ॥४॥५॥१६॥
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
ਚਰਨ ਸਰਨ ਗੋਪਾਲ ਤੇਰੀ ॥
चरन सरन गोपाल तेरी ॥
हे ईश्वर ! मैं तेरे चरणों की शरण में आया हूँ।
ਮੋਹ ਮਾਨ ਧੋਹ ਭਰਮ ਰਾਖਿ ਲੀਜੈ ਕਾਟਿ ਬੇਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मोह मान धोह भरम राखि लीजै काटि बेरी ॥१॥ रहाउ ॥
मोह, अभिमान, धोखे एवं भ्रम की जंजीर को काट कर मुझे बचा लो॥१॥रहाउ॥
ਬੂਡਤ ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰ ॥
बूडत संसार सागर ॥
मैं संसार-सागर में डूब रहा था लेकिन
ਉਧਰੇ ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਰਤਨਾਗਰ ॥੧॥
उधरे हरि सिमरि रतनागर ॥१॥
परमात्मा के स्मरण से संसार-समुद्र से पार हो गया हूँ॥१॥
ਸੀਤਲਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ॥
सीतला हरि नामु तेरा ॥
हे परमेश्वर ! तेरा नाम मन को शीतलता प्रदान करने वाला है,
ਪੂਰਨੋ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥੨॥
पूरनो ठाकुर प्रभु मेरा ॥२॥
तू ही मेरा पूर्ण मालिक है॥२॥
ਦੀਨ ਦਰਦ ਨਿਵਾਰਿ ਤਾਰਨ ॥
दीन दरद निवारि तारन ॥
तू दीनों का दर्द दूर करके पार उतारने वाला है।
ਹਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ॥੩॥
हरि क्रिपा निधि पतित उधारन ॥३॥
परमात्मा कृपा का भण्डार है, पतितों का उद्धार करने वाला है॥३॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਦੂਖ ਕਰਿ ਪਾਇਓ ॥
कोटि जनम दूख करि पाइओ ॥
करोड़ों जन्म दुख ही पाया था,
ਸੁਖੀ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਓ ॥੪॥੬॥੧੭॥
सुखी नानक गुरि नामु द्रिड़ाइओ ॥४॥६॥१७॥
नानक का कथन है कि जब से गुरु ने हरिनाम दृढ़ करवाया है, सुखी हूँ॥४॥६॥१७॥
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
ਧਨਿ ਉਹ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚਰਨ ਸੰਗਿ ਲਾਗੀ ॥
धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥
परमात्मा के चरणों में लगा वह प्रेम धन्य है।
ਕੋਟਿ ਜਾਪ ਤਾਪ ਸੁਖ ਪਾਏ ਆਇ ਮਿਲੇ ਪੂਰਨ ਬਡਭਾਗੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
कोटि जाप ताप सुख पाए आइ मिले पूरन बडभागी ॥१॥ रहाउ ॥
इससे करोड़ों जप, तपस्या का फल एवं सुख प्राप्त हुआ है और पूर्ण भाग्यशाली हूँ, जो प्रभु से आ मिला हूँ॥१॥रहाउ॥
ਮੋਹਿ ਅਨਾਥੁ ਦਾਸੁ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਅਵਰ ਓਟ ਸਗਲੀ ਮੋਹਿ ਤਿਆਗੀ ॥
मोहि अनाथु दासु जनु तेरा अवर ओट सगली मोहि तिआगी ॥
हे प्रभु ! मैं अनाथ तेरा दास हूँ, मैंने अन्य सब आसरे त्याग दिए हैं।
ਭੋਰ ਭਰਮ ਕਾਟੇ ਪ੍ਰਭ ਸਿਮਰਤ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨ ਮਿਲਿ ਸੋਵਤ ਜਾਗੀ ॥੧॥
भोर भरम काटे प्रभ सिमरत गिआन अंजन मिलि सोवत जागी ॥१॥
प्रभु के स्मरण से छोटा-सा भ्रम भी कट गया है और ज्ञान का अंजन लगाने से मोह-माया की नींद से जाग गया हूँ॥१॥
ਤੂ ਅਥਾਹੁ ਅਤਿ ਬਡੋ ਸੁਆਮੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਸਿੰਧੁ ਪੂਰਨ ਰਤਨਾਗੀ ॥
तू अथाहु अति बडो सुआमी क्रिपा सिंधु पूरन रतनागी ॥
तू अथाह है, बहुत बड़ा स्वामी है, कृपा का समुद्र एवं पूर्ण रत्नों की खान है।
ਨਾਨਕੁ ਜਾਚਕੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਮਾਂਗੈ ਮਸਤਕੁ ਆਨਿ ਧਰਿਓ ਪ੍ਰਭ ਪਾਗੀ ॥੨॥੭॥੧੮॥
नानकु जाचकु हरि हरि नामु मांगै मसतकु आनि धरिओ प्रभ पागी ॥२॥७॥१८॥
नानक विनती करता है कि हे प्रभु ! मैं याचक बनकर हरिनाम ही मांगता हूँ और अपना मस्तक भी तेरे चरणों में धरता हूँ॥२॥७॥१८॥
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
कानड़ा महला ५ ॥
ਕੁਚਿਲ ਕਠੋਰ ਕਪਟ ਕਾਮੀ ॥
कुचिल कठोर कपट कामी ॥
मैं मैला, कठोरदिल, धोखेबाज एवं कामी हूँ।
ਜਿਉ ਜਾਨਹਿ ਤਿਉ ਤਾਰਿ ਸੁਆਮੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
जिउ जानहि तिउ तारि सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥
हे स्वामी ! जैसे भी ठीक लगे, मुझे संसारसागर से मुक्त कर दो॥१॥रहाउ॥
ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਸਰਨਿ ਜੋਗੁ ਤੂ ਰਾਖਹਿ ਅਪਨੀ ਕਲ ਧਾਰਿ ॥੧॥
तू समरथु सरनि जोगु तू राखहि अपनी कल धारि ॥१॥
तू समर्थ है, शरण देने योग्य है, अपनी शक्ति से मुझे बचा लो॥१॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਨੇਮ ਸੁਚਿ ਸੰਜਮ ਨਾਹੀ ਇਨ ਬਿਧੇ ਛੁਟਕਾਰ ॥
जाप ताप नेम सुचि संजम नाही इन बिधे छुटकार ॥
पूजा-पाठ, तपस्या, नियम, शुद्धता एवं संयम इत्यादि इन तरीकों से छुटकारा संभव नहीं।
ਗਰਤ ਘੋਰ ਅੰਧ ਤੇ ਕਾਢਹੁ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਰਿ ॥੨॥੮॥੧੯॥
गरत घोर अंध ते काढहु प्रभ नानक नदरि निहारि ॥२॥८॥१९॥
नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मैं माया के घोर अंधेरे में गत हूँ, कृपा-दृष्टि करके बाहर निकाल लो।॥२॥८॥१६॥
ਕਾਨੜਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੪
कानड़ा महला ५ घरु ४
कानड़ा महला ५ घरु ४
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਨਾਰਾਇਨ ਨਰਪਤਿ ਨਮਸਕਾਰੈ ॥
नाराइन नरपति नमसकारै ॥
जो नारायण-स्वरूप परम परमेश्वर को प्रणाम करता है,
ਐਸੇ ਗੁਰ ਕਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਮੋਹਿ ਤਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ऐसे गुर कउ बलि बलि जाईऐ आपि मुकतु मोहि तारै ॥१॥ रहाउ ॥
ऐसे गुरु को कुर्बान जाता हूँ, जो स्वयं तो संसार के बन्धनों से मुक्त है, मुझे भी पार उतार देता है॥१॥रहाउ॥
ਕਵਨ ਕਵਨ ਕਵਨ ਗੁਨ ਕਹੀਐ ਅੰਤੁ ਨਹੀ ਕਛੁ ਪਾਰੈ ॥
कवन कवन कवन गुन कहीऐ अंतु नही कछु पारै ॥
उसके किस-किस गुण का कथन किया जाए, कोई अंत एवं आर-पार नहीं।
ਲਾਖ ਲਾਖ ਲਾਖ ਕਈ ਕੋਰੈ ਕੋ ਹੈ ਐਸੋ ਬੀਚਾਰੈ ॥੧॥
लाख लाख लाख कई कोरै को है ऐसो बीचारै ॥१॥
लाखों एवं कई करोड़ों में कौन ऐसा व्यक्ति है, जो सबका विचार करता है॥१॥