ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਗ੍ਰਿਹਿ ਸੋਭਾ ਜਾ ਕੈ ਰੇ ਨਾਹਿ ॥
ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥
जिस मनुष्य के घर में धन की शोभा नहीं है,
ਆਵਤ ਪਹੀਆ ਖੂਧੇ ਜਾਹਿ ॥
आवत पहीआ खूधे जाहि ॥
उस घर में आए गए अतिथि भूखे ही चले जाते हैं।
ਵਾ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਨਹੀ ਸੰਤੋਖੁ ॥
वा कै अंतरि नही संतोखु ॥
घर के मुखिया के मन में संतोष नहीं होता और
ਬਿਨੁ ਸੋਹਾਗਨਿ ਲਾਗੈ ਦੋਖੁ ॥੧॥
बिनु सोहागनि लागै दोखु ॥१॥
(माया रूपी) सुहागिन के बिना उस पर दोष लग जाता है ॥ १॥
ਧਨੁ ਸੋਹਾਗਨਿ ਮਹਾ ਪਵੀਤ ॥
धनु सोहागनि महा पवीत ॥
यह सुहागिन महापवित्र एवं धन्य है,
ਤਪੇ ਤਪੀਸਰ ਡੋਲੈ ਚੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तपे तपीसर डोलै चीत ॥१॥ रहाउ ॥
जिसके कारण बड़े-बड़े तपस्वियों के भी मन डगमगा जाते हैं॥ १॥ रहाउ ॥
ਸੋਹਾਗਨਿ ਕਿਰਪਨ ਕੀ ਪੂਤੀ ॥
सोहागनि किरपन की पूती ॥
यह माया रूपी सुहागिन कंजूसों की पुत्री है।
ਸੇਵਕ ਤਜਿ ਜਗਤ ਸਿਉ ਸੂਤੀ ॥
सेवक तजि जगत सिउ सूती ॥
यह भगवान के सेवकों को छोड़कर जगत के साथ लीन रहती है।
ਸਾਧੂ ਕੈ ਠਾਢੀ ਦਰਬਾਰਿ ॥
साधू कै ठाढी दरबारि ॥
यह साधु के दरबार में खड़ी होकर उनसे विनती करती है कि
ਸਰਨਿ ਤੇਰੀ ਮੋ ਕਉ ਨਿਸਤਾਰਿ ॥੨॥
सरनि तेरी मो कउ निसतारि ॥२॥
मैं आपकी शरण में आई हैं, मेरा उद्धार कर दो॥ २।
ਸੋਹਾਗਨਿ ਹੈ ਅਤਿ ਸੁੰਦਰੀ ॥
सोहागनि है अति सुंदरी ॥
यह सुहागिन अति सुन्दर है और
ਪਗ ਨੇਵਰ ਛਨਕ ਛਨਹਰੀ ॥
पग नेवर छनक छनहरी ॥
इसके पैरों की पायल छन-छन करती है।
ਜਉ ਲਗੁ ਪ੍ਰਾਨ ਤਊ ਲਗੁ ਸੰਗੇ ॥
जउ लगु प्रान तऊ लगु संगे ॥
जब तक इन्सान में प्राण है, तब तक यह उसके साथ रहती है,
ਨਾਹਿ ਤ ਚਲੀ ਬੇਗਿ ਉਠਿ ਨੰਗੇ ॥੩॥
नाहि त चली बेगि उठि नंगे ॥३॥
अन्यथा उसके प्राण पखेरू हो जाने पर तत्काल नंगे पांव ही भाग जाती है॥ ३॥
ਸੋਹਾਗਨਿ ਭਵਨ ਤ੍ਰੈ ਲੀਆ ॥
सोहागनि भवन त्रै लीआ ॥
इस माया रूपी सुहागिन ने तीनों लोकों को वशीभूत कर लिया है।
ਦਸ ਅਠ ਪੁਰਾਣ ਤੀਰਥ ਰਸ ਕੀਆ ॥
दस अठ पुराण तीरथ रस कीआ ॥
अठारह पुराण पढ़ने वाले एवं अड़सठ तीर्थ पर स्नान करने वालों ने भी इसका स्वाद लिया है।
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸਰ ਬੇਧੇ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसर बेधे ॥
इसने ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर के मन को भी भेद लिया है।
ਬਡੇ ਭੂਪਤਿ ਰਾਜੇ ਹੈ ਛੇਧੇ ॥੪॥
बडे भूपति राजे है छेधे ॥४॥
सभ राजे-महाराजे भी इसने छेद डाले हैं ॥ ४॥
ਸੋਹਾਗਨਿ ਉਰਵਾਰਿ ਨ ਪਾਰਿ ॥
सोहागनि उरवारि न पारि ॥
इस माया रूपी सुहागिन का कोई आर-पार नहीं है,
ਪਾਂਚ ਨਾਰਦ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਿਧਵਾਰਿ ॥
पांच नारद कै संगि बिधवारि ॥
यह पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ भी मिली हुई है,
ਪਾਂਚ ਨਾਰਦ ਕੇ ਮਿਟਵੇ ਫੂਟੇ ॥
पांच नारद के मिटवे फूटे ॥
जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के भेद खुल जाते हैं तो
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਛੂਟੇ ॥੫॥੫॥੮॥
कहु कबीर गुर किरपा छूटे ॥५॥५॥८॥
हे कबीर ! गुरु की कृपा से मनुष्य का छुटकारा हो जाता है॥ ५ ॥ ५ ॥८॥
ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਜੈਸੇ ਮੰਦਰ ਮਹਿ ਬਲਹਰ ਨਾ ਠਾਹਰੈ ॥
जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥
जैसे शहतीर के बिना मकान ठहर नहीं सकता,
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਪਾਰਿ ਉਤਰੈ ॥
नाम बिना कैसे पारि उतरै ॥
वैसे ही परमात्मा के नाम बिना जीव संसार-सागर में से कैसे पार हो सकता है?
ਕੁੰਭ ਬਿਨਾ ਜਲੁ ਨਾ ਟੀਕਾਵੈ ॥
कु्मभ बिना जलु ना टीकावै ॥
जैसे धड़े के बिना जल इकट्ठा नहीं हो सकता,
ਸਾਧੂ ਬਿਨੁ ਐਸੇ ਅਬਗਤੁ ਜਾਵੈ ॥੧॥
साधू बिनु ऐसे अबगतु जावै ॥१॥
वैसे ही साधु के बिना जीव की गति नहीं होती ॥ १॥
ਜਾਰਉ ਤਿਸੈ ਜੁ ਰਾਮੁ ਨ ਚੇਤੈ ॥
जारउ तिसै जु रामु न चेतै ॥
जो राम का स्मरण नहीं करता, एसों को तो जला ही देना चाहिए,
ਤਨ ਮਨ ਰਮਤ ਰਹੈ ਮਹਿ ਖੇਤੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
तन मन रमत रहै महि खेतै ॥१॥ रहाउ ॥
क्योंकि उसका तन-मन अपने शरीर रुप खेत में मग्न रहता है ॥ १॥ रहाउ॥
ਜੈਸੇ ਹਲਹਰ ਬਿਨਾ ਜਿਮੀ ਨਹੀ ਬੋਈਐ ॥
जैसे हलहर बिना जिमी नही बोईऐ ॥
जैसे कृषक के बिना जमीन नहीं बोई जा सकती,
ਸੂਤ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਮਣੀ ਪਰੋਈਐ ॥
सूत बिना कैसे मणी परोईऐ ॥
वैसे ही सूत्र के बिना माला के मोती कैसे पिरोए जा सकते हैं।
ਘੁੰਡੀ ਬਿਨੁ ਕਿਆ ਗੰਠਿ ਚੜ੍ਹਾਈਐ ॥
घुंडी बिनु किआ गंठि चड़्हाईऐ ॥
जैसे धुंडी के बिना गांठ नहीं दी जा सकती है,
ਸਾਧੂ ਬਿਨੁ ਤੈਸੇ ਅਬਗਤੁ ਜਾਈਐ ॥੨॥
साधू बिनु तैसे अबगतु जाईऐ ॥२॥
वैसे ही साधु-महात्मा के बिना जीव की गति नहीं हो सकती॥ २॥
ਜੈਸੇ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਬਿਨੁ ਬਾਲੁ ਨ ਹੋਈ ॥
जैसे मात पिता बिनु बालु न होई ॥
जैसे माता-पिता के बिना औलाद उत्पन्न नहीं होती,
ਬਿੰਬ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਕਪਰੇ ਧੋਈ ॥
बि्मब बिना कैसे कपरे धोई ॥
वैसे ही पानी के बिना कपड़े कैसे धोए जा सकते हैं ?
ਘੋਰ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਅਸਵਾਰ ॥
घोर बिना कैसे असवार ॥
जसे घोड़े के बिना कोई कैसे घुड़सवारी कर सकता है,
ਸਾਧੂ ਬਿਨੁ ਨਾਹੀ ਦਰਵਾਰ ॥੩॥
साधू बिनु नाही दरवार ॥३॥
वैसे ही साधु के बिना ईश्वर का द्वार नहीं मिल सकता ॥ ३॥
ਜੈਸੇ ਬਾਜੇ ਬਿਨੁ ਨਹੀ ਲੀਜੈ ਫੇਰੀ ॥
जैसे बाजे बिनु नही लीजै फेरी ॥
जैसे संगीत के बिना नृत्य का आनंद नहीं मिल सकता,
ਖਸਮਿ ਦੁਹਾਗਨਿ ਤਜਿ ਅਉਹੇਰੀ ॥
खसमि दुहागनि तजि अउहेरी ॥
वैसे ही दुहागिन अपने पति को छोड़कर बर्बाद होती है।
ਕਹੈ ਕਬੀਰੁ ਏਕੈ ਕਰਿ ਕਰਨਾ ॥
कहै कबीरु एकै करि करना ॥
कबीर जी कहते हैं कि एक ही करने योग्य कार्य है, सो यही कार्य करो,
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਬਹੁਰਿ ਨਹੀ ਮਰਨਾ ॥੪॥੬॥੯॥
गुरमुखि होइ बहुरि नही मरना ॥४॥६॥९॥
जो गुरुमुख बन जाता है, उसे दोबारा मरना नहीं पड़ता ॥ ४ ॥ ६ ॥९ ॥
ਗੋਂਡ ॥
गोंड ॥
गोंड ॥
ਕੂਟਨੁ ਸੋਇ ਜੁ ਮਨ ਕਉ ਕੂਟੈ ॥
कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥
वास्तव में वही दलाल है, जो मन को जोड़ता है।
ਮਨ ਕੂਟੈ ਤਉ ਜਮ ਤੇ ਛੂਟੈ ॥
मन कूटै तउ जम ते छूटै ॥
यदि मन को जोड़ा जाए तो यम से छुटकारा हो जाता है।
ਕੁਟਿ ਕੁਟਿ ਮਨੁ ਕਸਵਟੀ ਲਾਵੈ ॥
कुटि कुटि मनु कसवटी लावै ॥
जो मन को बार-बार जोड़कर कसौटी पर लगाता है,
ਸੋ ਕੂਟਨੁ ਮੁਕਤਿ ਬਹੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
सो कूटनु मुकति बहु पावै ॥१॥
ऐसा व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर लेता है। १॥
ਕੂਟਨੁ ਕਿਸੈ ਕਹਹੁ ਸੰਸਾਰ ॥
कूटनु किसै कहहु संसार ॥
हे संसार के लोगों ! कुटन (दलाल) किसे कहते हो ?
ਸਗਲ ਬੋਲਨ ਕੇ ਮਾਹਿ ਬੀਚਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सगल बोलन के माहि बीचार ॥१॥ रहाउ ॥
बोली गई सब बातों में ही अन्तर होता है। १॥ रहाउ॥
ਨਾਚਨੁ ਸੋਇ ਜੁ ਮਨ ਸਿਉ ਨਾਚੈ ॥
नाचनु सोइ जु मन सिउ नाचै ॥
नाचने वाला वही है, जो मन को नचाता है।
ਝੂਠਿ ਨ ਪਤੀਐ ਪਰਚੈ ਸਾਚੈ ॥
झूठि न पतीऐ परचै साचै ॥
वह झूठ से खुश नहीं होता अपितु सत्य में ही लीन रहता है।
ਇਸੁ ਮਨ ਆਗੇ ਪੂਰੈ ਤਾਲ ॥
इसु मन आगे पूरै ताल ॥
वह अपने इस मन के समक्ष नृत्य करता रहता है और
ਇਸੁ ਨਾਚਨ ਕੇ ਮਨ ਰਖਵਾਲ ॥੨॥
इसु नाचन के मन रखवाल ॥२॥
इस नाचने वाले के मन का रखवाला स्वयं भगवान ही है॥ २॥
ਬਜਾਰੀ ਸੋ ਜੁ ਬਜਾਰਹਿ ਸੋਧੈ ॥
बजारी सो जु बजारहि सोधै ॥
असली बाजारी वही है, जो अपने शरीर रूप बाजार का सुधार करता है।
ਪਾਂਚ ਪਲੀਤਹ ਕਉ ਪਰਬੋਧੈ ॥
पांच पलीतह कउ परबोधै ॥
वह विकारों से मलिन हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान का उपदेश देता और
ਨਉ ਨਾਇਕ ਕੀ ਭਗਤਿ ਪਛਾਨੈ ॥
नउ नाइक की भगति पछानै ॥
नवखण्डों के मालिक परमेश्वर की भक्ति को पहचान लेता है।
ਸੋ ਬਾਜਾਰੀ ਹਮ ਗੁਰ ਮਾਨੇ ॥੩॥
सो बाजारी हम गुर माने ॥३॥
हम तो ऐसे बाजारी को ही अपना गुरु मानते है।
ਤਸਕਰੁ ਸੋਇ ਜਿ ਤਾਤਿ ਨ ਕਰੈ ॥
तसकरु सोइ जि ताति न करै ॥
असली चोर वही है जो किसी से ईर्ष्या द्वेष नहीं करता और
ਇੰਦ੍ਰੀ ਕੈ ਜਤਨਿ ਨਾਮੁ ਉਚਰੈ ॥
इंद्री कै जतनि नामु उचरै ॥
अपनी ज्ञानेंद्रियों की सहायता से भगवान का नाम उच्चरित करता रहता है।
ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਹਮ ਐਸੇ ਲਖਨ ॥
कहु कबीर हम ऐसे लखन ॥
कबीर जी कहते हैं कि जिसकी कृपा से हमें ऐसे गुण हासिल हुए हैं,
ਧੰਨੁ ਗੁਰਦੇਵ ਅਤਿ ਰੂਪ ਬਿਚਖਨ ॥੪॥੭॥੧੦॥
धंनु गुरदेव अति रूप बिचखन ॥४॥७॥१०॥
मेरा वह गुरुदेव धन्य है, जिसका रूप बड़ा सुन्दर एवं विलक्षण है।॥४॥७॥१०॥