ਸੰਤ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਧਰਮ ਕੀ ਪਉੜੀ ਕੋ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਏ ॥
संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥
संतों का मार्ग ही धर्म की सीढ़ी है, जिसे कोई भाग्यशाली ही प्राप्त करता है।
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਨਾਸੇ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੨॥
कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥
हरि-चरणों में चित्त लगाने से करोड़ों जन्मों के किल्विष-पाप नाश हो जाते हैं।॥२॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਕਲ ਰਾਖੀ ॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
उस प्रभु की सदा ही स्तुति करो, जिसने पूर्ण कला (शक्ति) को धारण किया हुआ है।
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਭਏ ਪਵਿਤ੍ਰਾ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥੩॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥
सतगुरु का सच्चा उपदेश सुनने से सभी जीव पवित्र हो गए हैं ॥ ३॥
ਬਿਘਨ ਬਿਨਾਸਨ ਸਭਿ ਦੁਖ ਨਾਸਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
सतगुरु ने विघ्नों का विनाश करने वाला एवं समस्त दु:खों का नाश करने वाला परमात्मा का नाम मन में दृढ़ कर दिया है।
ਖੋਏ ਪਾਪ ਭਏ ਸਭਿ ਪਾਵਨ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥੪॥੩॥੫੩॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥
नानक का कथन है कि मेरे सभी पाप नाश हो गए हैं और मैं पावन होकर सुख के घर में आ गया हूँ॥ ४॥ ३॥ ५३॥
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਨੀ ਗਹੇਰਾ ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
हे मालिक ! तू गुणों की गहरा सागर है।
ਘਰੁ ਲਸਕਰੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
मेरा (हृदय) घर एवं लश्कर (इन्द्रियाँ) सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है।
ਰਖਵਾਲੇ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
गोपाल-गुरु ही मेरा रखवाला है
ਸਭਿ ਜੀਅ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ॥੧॥
सभि जीअ भए दइआला ॥१॥
जिसके फलस्वरूप सभी जीव मुझ पर दयालु हो गए हैं।॥ १॥
ਜਪਿ ਅਨਦਿ ਰਹਉ ਗੁਰ ਚਰਣਾ ॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
गुरु के चरणों का जाप करके मैं आनंदित रहता हूँ।
ਭਉ ਕਤਹਿ ਨਹੀ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
प्रभु की शरण में आने से कहीं कोई भय नहीं॥ रहाउ॥
ਤੇਰਿਆ ਦਾਸਾ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
हे मुरारि ! तू अपने सेवकों के हृदय में ही रहता है।
ਪ੍ਰਭਿ ਅਬਿਚਲ ਨੀਵ ਉਸਾਰੀ ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
प्रभु ने अविचल आधारशिला का निर्माण किया हुआ है।
ਬਲੁ ਧਨੁ ਤਕੀਆ ਤੇਰਾ ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू ही शक्ति, धन एवं सहारा है।
ਤੂ ਭਾਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥੨॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥२॥
तू ही मेरा महान् ठाकुर है॥ २॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਆ ॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
जिस-जिस ने भी साधसंगत को प्राप्त किया है,
ਸੋ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਤਰਾਇਆ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
प्रभु ने स्वयं ही उसे भवसागर से पार कर दिया है।
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮ ਰਸੁ ਦੀਆ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
उसने स्वयं ही कृपा करके नामामृत प्रदान किया है और
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਸਭ ਥੀਆ ॥੩॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥३॥
हर तरफ कुशलक्षेम है॥ ३॥
ਹੋਏ ਪ੍ਰਭੂ ਸਹਾਈ ॥
होए प्रभू सहाई ॥
प्रभु जब मेरा सहायक बन गया तो
ਸਭ ਉਠਿ ਲਾਗੀ ਪਾਈ ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सभी उठकर मेरे चरण स्पर्श करने लगे।
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਈਐ ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
नानक का कथन है कि अपने श्वास-श्वास से हमें प्रभु का ध्यान ही करना चाहिए और
ਹਰਿ ਮੰਗਲੁ ਨਾਨਕ ਗਾਈਐ ॥੪॥੪॥੫੪॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥४॥४॥५४॥
हरि की महिमा के मंगल गीत गायन करने चाहिए ॥४॥४॥५४॥
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦਾ ॥
सूख सहज आनंदा ॥
मेरे मन में सहज सुख एवं आनंद की प्राप्ति हो गई है
ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਓ ਮਨਿ ਭਾਵੰਦਾ ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
और मुझे मनभावता प्रभु मिल गया है,
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
पूर्ण गुरु ने जब मुझ पर कृपा की तो
ਤਾ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੧॥
ता गति भई हमारी ॥१॥
हमारा कल्याण हो गया ॥ १॥
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਮਨੁ ਲੀਨਾ ॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
मेरा मन हरि की प्रेम-भक्ति में लीन रहता है,
ਨਿਤ ਬਾਜੇ ਅਨਹਤ ਬੀਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
जिसके फलस्वरूप अन्तर्मन में नित्य ही अनहद वीणा बजती रहती है।रहाउ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣ ਕੀ ਓਟ ਸਤਾਣੀ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
हरि के चरणों का सहारा बड़ा मजबूत है,
ਸਭ ਚੂਕੀ ਕਾਣਿ ਲੋਕਾਣੀ ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
इसलिए मेरी संसार के लोगों पर निर्भरता सब चूक गई है।
ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਪਾਇਆ ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
मैंने जगत का जीवनदाता प्रभु पा लिया है,
ਹਰਿ ਰਸਕਿ ਰਸਕਿ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੨॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥२॥
अब मैं खुशी से मोहित होकर उसका गुणगान करता हूँ ॥२॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾਟਿਆ ਜਮ ਕਾ ਫਾਸਾ ॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
प्रभु ने मृत्यु की फांसी काट दी है और
ਮਨ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥
मन पूरन होई आसा ॥
मेरे मन की आशा पूरी हो गई है।
ਜਹ ਪੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
जह पेखा तह सोई ॥
अब मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ, उधर ही वह विद्यमान है।
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੩॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥३॥
प्रभु के सिवाय दूसरा कोई सहायक नही॥ ३॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
प्रभु ने कृपा करके मेरी रक्षा की है और
ਸਭਿ ਜਨਮ ਜਨਮ ਦੁਖ ਲਾਥੇ ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
जन्म-जन्मांतरों के सभी दु:खों से मुक्त हो गया हूँ॥
ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
हे नानक ! ईश्वर के निर्भय नाम का ध्यान करने से
ਅਟਲ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਪਾਇਆ ॥੪॥੫॥੫੫॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥४॥५॥५५॥
मुझे अटल सुख मिल गया है॥ ४॥५॥ ५५ ॥
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ਠਾਢਿ ਪਾਈ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ठाढि पाई करतारे ॥
ईश्वर ने मेरे घर में शांति कर दी है,
ਤਾਪੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ਪਰਵਾਰੇ ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
जिससे ज्वर मेरे परिवार को त्याग गया है।
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹੈ ਰਾਖੀ ॥ ਸਰਣਿ ਸਚੇ ਕੀ ਤਾਕੀ ॥੧॥
गुरि पूरै है राखी ॥ सरणि सचे की ताकी ॥१॥
पूर्ण गुरु ने मेरी रक्षा की है और अब मैंने उस परम-सत्य प्रभु की शरण ली है॥ १ ॥
ਪਰਮੇਸਰੁ ਆਪਿ ਹੋਆ ਰਖਵਾਲਾ ॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
परमेश्वर आप ही मेरा रखवाला बना है और
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਖਿਨ ਮਹਿ ਉਪਜੇ ਮਨੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਸੁਖਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
क्षण भर में ही सहज सुख एवं शांति उत्पन्न हो गए हैं और मन हमेशा के लिए सुखी हो गया है ॥ रहाउ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਦਾਰੂ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
गुरु ने मुझे हरि-नाम की औषधि दी है,
ਤਿਨਿ ਸਗਲਾ ਰੋਗੁ ਬਿਦਾਰੂ ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
जिसने सारा रोग दूर कर दिया है।
ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
अपणी किरपा धारी ॥
प्रभु ने मुझ पर अपनी कृपा की है,
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਬਾਤ ਸਵਾਰੀ ॥੨॥
तिनि सगली बात सवारी ॥२॥
जिसने मेरे समस्त कार्य संवार दिए हैं।॥ २॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨਾ ਬਿਰਦੁ ਸਮਾਰਿਆ ॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
प्रभु ने तो अपने विरद् का पालन किया है और
ਹਮਰਾ ਗੁਣੁ ਅਵਗੁਣੁ ਨ ਬੀਚਾਰਿਆ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
हमारे गुणों एवं अवगुणों की ओर विचार नहीं किया।
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਭਇਓ ਸਾਖੀ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥
गुरु का शब्द साक्षात् हुआ है,