ਏਕੋ ਅਮਰੁ ਏਕਾ ਪਤਿਸਾਹੀ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਸਿਰਿ ਕਾਰ ਬਣਾਈ ਹੇ ॥੧॥
एको अमरु एका पतिसाही जुगु जुगु सिरि कार बणाई हे ॥१॥
केवल उसका ही हुक्म सब पर चलता है, एक उसकी ही बादशाहत है और युग-युगांतरों से सब उसकी मर्जी से ही हो रहा है॥ १॥
ਸੋ ਜਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਜਿਨਿ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ॥
सो जनु निरमलु जिनि आपु पछाता ॥
वही जीव निर्मल है, जिसने आप को पहचान लिया है और
ਆਪੇ ਆਇ ਮਿਲਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
आपे आइ मिलिआ सुखदाता ॥
सुख देने वाला ईश्वर स्वयं ही उसे आ मिला है।
ਰਸਨਾ ਸਬਦਿ ਰਤੀ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੨॥
रसना सबदि रती गुण गावै दरि साचै पति पाई हे ॥२॥
उसकी जीभ शब्द में लीन रहकर उसका ही गुणगान करती है और सत्य के द्वार पर शोभा प्राप्त करती है॥ २॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ॥
गुरमुखि नामि मिलै वडिआई ॥
गुरुमुख को नाम-स्मरण से बड़ाई मिलती है लेकिन
ਮਨਮੁਖਿ ਨਿੰਦਕਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
मनमुखि निंदकि पति गवाई ॥
निंदक मनमुखी जीव अपनी प्रतिष्ठा गॅवा देता है।
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਪਰਮ ਹੰਸ ਬੈਰਾਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
नामि रते परम हंस बैरागी निज घरि ताड़ी लाई हे ॥३॥
नाम में लीन वैराग्यवान पुरुष परमहंस है और उसने अपने सच्चे घर में ही समाधि लगाई है॥ ३॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪੂਰਾ ॥
सबदि मरै सोई जनु पूरा ॥
वही आदमी पूर्ण है, जो शब्द द्वारा अपने अहम् को मिटा देता है,”
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ਸੂਰਾ ॥
सतिगुरु आखि सुणाए सूरा ॥
शूरवीर सतिगुरु यही सत्य कहकर सुनाता है।
ਕਾਇਆ ਅੰਦਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਸਾਚਾ ਮਨੁ ਪੀਵੈ ਭਾਇ ਸੁਭਾਈ ਹੇ ॥੪॥
काइआ अंदरि अम्रित सरु साचा मनु पीवै भाइ सुभाई हे ॥४॥
शरीर में नामामृतु का सच्चा सरोवर है और मन बड़े प्रेम एवं श्रद्धा से इसका पान करता है।॥ ४॥
ਪੜਿ ਪੰਡਿਤੁ ਅਵਰਾ ਸਮਝਾਏ ॥
पड़ि पंडितु अवरा समझाए ॥
पण्डित धर्म-ग्रंथों का अध्ययन करके दूसरों को समझाता रहता है किन्तु
ਘਰ ਜਲਤੇ ਕੀ ਖਬਰਿ ਨ ਪਾਏ ॥
घर जलते की खबरि न पाए ॥
तृष्णाग्नि में जल रहे अपने हृदय-घर का उसे कोई ज्ञान नहीं होता।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਈਐ ਪੜਿ ਥਾਕੇ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਈ ਹੇ ॥੫॥
बिनु सतिगुर सेवे नामु न पाईऐ पड़ि थाके सांति न आई हे ॥५॥
सतगुरु की सेवा बिना नाम प्राप्त नहीं हो सकता, कुछ व्यक्ति ग्रंथों का अध्ययन करके थक गए हैं लेकिन उनके मन को शान्ति प्राप्त नहीं हुई॥ ५॥
ਇਕਿ ਭਸਮ ਲਗਾਇ ਫਿਰਹਿ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
इकि भसम लगाइ फिरहि भेखधारी ॥
कुछ वेषधारी साधु शरीर पर भस्म लगाकर इधर-उधर घूमते रहते हैं,”
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉਮੈ ਕਿਨਿ ਮਾਰੀ ॥
बिनु सबदै हउमै किनि मारी ॥
लेकिन शब्द के बिना किसने अपने अहंकार को समाप्त किया है।
ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਰਹਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਭਰਮਿ ਭੇਖਿ ਭਰਮਾਈ ਹੇ ॥੬॥
अनदिनु जलत रहहि दिनु राती भरमि भेखि भरमाई हे ॥६॥
वे प्रतिदिन तृष्णाग्नि में जलते रहते हैं और दिन-रात वेष बनाकर भ्रम में भटकते रहते हैं।॥ ६॥
ਇਕਿ ਗ੍ਰਿਹ ਕੁਟੰਬ ਮਹਿ ਸਦਾ ਉਦਾਸੀ ॥
इकि ग्रिह कुट्मब महि सदा उदासी ॥
कुछ लोग अपने घर परिवार में रहकर भी विरक्त रहते हैं और
ਸਬਦਿ ਮੁਏ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਨਿਵਾਸੀ ॥
सबदि मुए हरि नामि निवासी ॥
शब्द द्वारा अभिमान को मिटाकर नाम में निवास करते है
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਰਹਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਭੈ ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਚਿਤੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
अनदिनु सदा रहहि रंगि राते भै भाइ भगति चितु लाई हे ॥७॥
वे रात-दिन परमात्मा का नाम-स्मरण करते लीन रहते हैं और ईश्वर की अर्चना एवं भक्ति में चित्त लगाते हैं॥ ७॥
ਮਨਮੁਖੁ ਨਿੰਦਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵਿਗੁਤਾ ॥
मनमुखु निंदा करि करि विगुता ॥
मनमुख पराई निन्दा कर-करके समय व्यतीत करता है
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਭਉਕੈ ਜਿਸੁ ਕੁਤਾ ॥
अंतरि लोभु भउकै जिसु कुता ॥
उसके मन में लोभ रूपी कुत्ता भौंकता रहता है,”
ਜਮਕਾਲੁ ਤਿਸੁ ਕਦੇ ਨ ਛੋਡੈ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਈ ਹੇ ॥੮॥
जमकालु तिसु कदे न छोडै अंति गइआ पछुताई हे ॥८॥
यम उसे कभी नहीं छोड़ता और अन्त में वह पछताता हुआ इस दुनिया से जाता है॥ ८॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਚੀ ਪਤਿ ਹੋਈ ॥
सचै सबदि सची पति होई ॥
सच से ही सच्चे शब्द की प्राप्ती होती है परन्तु
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਵੈ ਕੋਈ ॥
बिनु नावै मुकति न पावै कोई ॥
नाम के बिना कोई भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੋ ਨਾਉ ਨ ਪਾਏ ਪ੍ਰਭਿ ਐਸੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ਹੇ ॥੯॥
बिनु सतिगुर को नाउ न पाए प्रभि ऐसी बणत बणाई हे ॥९॥
प्रभु ने ऐसी विधि बनाई है कि सतिगुरु के बिना कोई भी नाम प्राप्त नहीं कर सकता॥ ९॥
ਇਕਿ ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਬਹੁਤੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
इकि सिध साधिक बहुतु वीचारी ॥
कई सिद्ध, साधक एवं बहुत सारे चिंतक हैं,”
ਇਕਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥
इकि अहिनिसि नामि रते निरंकारी ॥
कई दिन-रात निरंकार के नाम में लीन रहते हैं,”
ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਸੋ ਬੂਝੈ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਭਉ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
जिस नो आपि मिलाए सो बूझै भगति भाइ भउ जाई हे ॥१०॥
मगर जिसे स्वयं मिलाता है वही सत्य को बूझता है और भाव-भक्ति द्वारा उसका भय दूर हो जाता है॥ १०॥
ਇਸਨਾਨੁ ਦਾਨੁ ਕਰਹਿ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ॥
इसनानु दानु करहि नही बूझहि ॥
कुछ तीर्थ-स्नान एवं दान-पुण्य करते हैं लेकिन प्रभु का रहस्य नहीं समझते।
ਇਕਿ ਮਨੂਆ ਮਾਰਿ ਮਨੈ ਸਿਉ ਲੂਝਹਿ ॥
इकि मनूआ मारि मनै सिउ लूझहि ॥
कई व्यक्ति ऐसे भी हैं, जो मन को मार कर मन से ही उलझाते रहते हैं।
ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਇਕ ਰੰਗੀ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
साचै सबदि रते इक रंगी साचै सबदि मिलाई हे ॥११॥
कई परमात्मा के रंग लीन रहते हैं और उनका मिलाप हो जाता है॥ ११॥
ਆਪੇ ਸਿਰਜੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
आपे सिरजे दे वडिआई ॥
वह स्वयं ही जीवों को पैदा करके बड़ाई है और
ਆਪੇ ਭਾਣੈ ਦੇਇ ਮਿਲਾਈ ॥
आपे भाणै देइ मिलाई ॥
स्वेच्छा से मिला लेता है।
ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਭਿ ਇਉ ਫੁਰਮਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
आपे नदरि करे मनि वसिआ मेरै प्रभि इउ फुरमाई हे ॥१२॥
वह स्वयं ही कृपा-दृष्टि करके मन में आ बसता है, मेरे प्रभु ने यही फुरमाया है॥ १२॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਸਾਚੇ ॥
सतिगुरु सेवहि से जन साचे ॥
सतिगुरु की सेवा करने वाले ही सच्चे हैं।
ਮਨਮੁਖ ਸੇਵਿ ਨ ਜਾਣਨਿ ਕਾਚੇ ॥
मनमुख सेवि न जाणनि काचे ॥
मनमुख सेवा का महत्व जानते, अतः कच्चे हैं।
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
आपे करता करि करि वेखै जिउ भावै तिउ लाई हे ॥१३॥
ईश्वर स्वयं ही लीला कर-करके देखता रहता है और जैसे उसे अच्छा लगता है, वैसे ही दुनिया को लगाता है॥ १३॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ॥
जुगि जुगि साचा एको दाता ॥
युग-युगांतर एक सच्चा दाता ईश्वर ही है
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਪਛਾਤਾ ॥
पूरै भागि गुर सबदु पछाता ॥
पूर्ण भाग्य से शब्द-गुरु द्वारा ही उसकी पहचान होती है।
ਸਬਦਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਵਿਛੁੜੇ ਨਾਹੀ ਨਦਰੀ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
सबदि मिले से विछुड़े नाही नदरी सहजि मिलाई हे ॥१४॥
जो ईश्वर से मिल जाता है, वह फिर बिछड़ता नहीं और प्रभु-कृपा से सहज ही मिलाप होता है॥ १४॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਮੈਲੁ ਕਮਾਇਆ ॥
हउमै माइआ मैलु कमाइआ ॥
अहम् एवं माया में लिप्त मलिन कर्म ही करता है और
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਦੂਜਾ ਭਾਇਆ ॥
मरि मरि जमहि दूजा भाइआ ॥
दैतभाव में मर-मर कर जन्मता रहता है।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਮਨਿ ਦੇਖਹੁ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई मनि देखहु लिव लाई हे ॥१५॥
अपने मन में ध्यान देख लो, सतिगुरु की सेवा के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती॥ १५॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸੀ ॥
जो तिसु भावै सोई करसी ॥
जो परमात्मा को मंजूर है, वह वही करेगा।