Hindi Page 366

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਘਰੁ ੨ ਮਹਲਾ ੪ ॥
रागु आसा घरु २ महला ४ ॥
रागु आसा घरु २ महला ४ ॥

ਕਿਸ ਹੀ ਧੜਾ ਕੀਆ ਮਿਤ੍ਰ ਸੁਤ ਨਾਲਿ ਭਾਈ ॥
किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥
किसी ने अपने मित्र, पुत्र अथवा भाई के साथ रिश्ता बनाया हुआ है और

ਕਿਸ ਹੀ ਧੜਾ ਕੀਆ ਕੁੜਮ ਸਕੇ ਨਾਲਿ ਜਵਾਈ ॥
किस ही धड़ा कीआ कुड़म सके नालि जवाई ॥
किसी ने अपने सगे-सम्बन्धी एवं दामाद के साथ रिश्ता बनाया हुआ है।

ਕਿਸ ਹੀ ਧੜਾ ਕੀਆ ਸਿਕਦਾਰ ਚਉਧਰੀ ਨਾਲਿ ਆਪਣੈ ਸੁਆਈ ॥
किस ही धड़ा कीआ सिकदार चउधरी नालि आपणै सुआई ॥
किसी मनुष्य ने स्वार्थपूर्ति हेतु सरदारों एवं चौधरियों से रिश्तेदारी की हुई है।

ਹਮਾਰਾ ਧੜਾ ਹਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੧॥
हमारा धड़ा हरि रहिआ समाई ॥१॥
लेकिन मेरा रिश्ता सर्वव्यापक प्रभु के साथ है॥ १॥

ਹਮ ਹਰਿ ਸਿਉ ਧੜਾ ਕੀਆ ਮੇਰੀ ਹਰਿ ਟੇਕ ॥
हम हरि सिउ धड़ा कीआ मेरी हरि टेक ॥
मैंने हरि के साथ रिश्तेदारी की है और हरि ही मेरा सहारा है।

ਮੈ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਪਖੁ ਧੜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਹਉ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਅਸੰਖ ਅਨੇਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मै हरि बिनु पखु धड़ा अवरु न कोई हउ हरि गुण गावा असंख अनेक ॥१॥ रहाउ ॥
हरि के बिना मेरा अन्य कोई भी पक्ष एवं नाता नहीं है। मैं हरि के असंख्य गुणों का ही यशोगान करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

ਜਿਨੑ ਸਿਉ ਧੜੇ ਕਰਹਿ ਸੇ ਜਾਹਿ ॥
जिन्ह सिउ धड़े करहि से जाहि ॥
जिनके साथ रिश्तेदारी की जाती है, वह मर जाते हैं।

ਝੂਠੁ ਧੜੇ ਕਰਿ ਪਛੋਤਾਹਿ ॥
झूठु धड़े करि पछोताहि ॥
झूठा नाता बनाकर मनुष्य अंत : पश्चाताप करते हैं।

ਥਿਰੁ ਨ ਰਹਹਿ ਮਨਿ ਖੋਟੁ ਕਮਾਹਿ ॥
थिरु न रहहि मनि खोटु कमाहि ॥
जो मनुष्य झूठ का आचरण करते हैं, वे स्थिर नहीं रहते।

ਹਮ ਹਰਿ ਸਿਉ ਧੜਾ ਕੀਆ ਜਿਸ ਕਾ ਕੋਈ ਸਮਰਥੁ ਨਾਹਿ ॥੨॥
हम हरि सिउ धड़ा कीआ जिस का कोई समरथु नाहि ॥२॥
मैंने हरि से नाता बनाया है, जिसके समान कोई भी समर्थशाली नहीं ॥ २॥

ਏਹ ਸਭਿ ਧੜੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰੀ ॥
एह सभि धड़े माइआ मोह पसारी ॥
यह तमाम रिश्तेदारियां माया के मोह का प्रसार है।

ਮਾਇਆ ਕਉ ਲੂਝਹਿ ਗਾਵਾਰੀ ॥
माइआ कउ लूझहि गावारी ॥
मूर्ख लोग माया के लिए लड़ते झगड़ते हैं।

ਜਨਮਿ ਮਰਹਿ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥
जनमि मरहि जूऐ बाजी हारी ॥
वह जन्म-मरण के वश में हैं और जुए में अपनी जीवन बाजी हार जाते हैं।

ਹਮਰੈ ਹਰਿ ਧੜਾ ਜਿ ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਭੁ ਸਵਾਰੀ ॥੩॥
हमरै हरि धड़ा जि हलतु पलतु सभु सवारी ॥३॥
हरि से ही मेरा नाता है, जो मेरे लोक-परलोक सब संवार देता है॥ ३॥

ਕਲਿਜੁਗ ਮਹਿ ਧੜੇ ਪੰਚ ਚੋਰ ਝਗੜਾਏ ॥
कलिजुग महि धड़े पंच चोर झगड़ाए ॥
कलियुग में जितने भी रिश्ते हैं ये पाँच विकार-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अभिमान द्वारा उत्पन्न होते हैं।

ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ਵਧਾਏ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु वधाए ॥
परिणामस्वरूप काम, क्रोध,लोभ, मोह एवं अभिमान अधिकतर बढ़ गए हैं।

ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਿਸੁ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਏ ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु सतसंगि मिलाए ॥
जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है, उसे सत्संगति में सम्मिलित कर देता है।

ਹਮਰਾ ਹਰਿ ਧੜਾ ਜਿਨਿ ਏਹ ਧੜੇ ਸਭਿ ਗਵਾਏ ॥੪॥
हमरा हरि धड़ा जिनि एह धड़े सभि गवाए ॥४॥
मैं हरि के नाते में हूँ जिसने यह तमाम रिश्ते नाश कर दिए हैं।॥ ४॥

ਮਿਥਿਆ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਧੜੇ ਬਹਿ ਪਾਵੈ ॥
मिथिआ दूजा भाउ धड़े बहि पावै ॥
झूठे सांसारिक मोह के माध्यम से लोग बैठकर गुटबन्दी करते हैं।

ਪਰਾਇਆ ਛਿਦ੍ਰੁ ਅਟਕਲੈ ਆਪਣਾ ਅਹੰਕਾਰੁ ਵਧਾਵੈ ॥
पराइआ छिद्रु अटकलै आपणा अहंकारु वधावै ॥
वह दूसरों की कमजोरियों की निन्दा करते हैं और अपना अहंकार बढ़ाते हैं।

ਜੈਸਾ ਬੀਜੈ ਤੈਸਾ ਖਾਵੈ ॥
जैसा बीजै तैसा खावै ॥
वे जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही फल खाते हैं।

ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਾ ਹਰਿ ਧੜਾ ਧਰਮੁ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਜਿਣਿ ਆਵੈ ॥੫॥੨॥੫੪॥
जन नानक का हरि धड़ा धरमु सभ स्रिसटि जिणि आवै ॥५॥२॥५४॥
नानक ने हरि से नातेदारी की है, यह धर्म का नाता समूचे जगत को जीत लेता है॥५॥२॥५४॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥

ਹਿਰਦੈ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਮਨਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਭਾਇਆ ॥
हिरदै सुणि सुणि मनि अम्रितु भाइआ ॥
हृदय में सुन-सुनकर नामामृत मेरे मन को अच्छा लगने लग गया है।

ਗੁਰਬਾਣੀ ਹਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧॥
गुरबाणी हरि अलखु लखाइआ ॥१॥
गुरुवाणी ने मुझे अदृश्य हरि के दर्शन करवा दिए हैं।॥ १॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸੁਨਹੁ ਮੇਰੀ ਭੈਨਾ ॥
गुरमुखि नामु सुनहु मेरी भैना ॥
हे मेरी सत्संगी बहनो ! गुरुमुख बनकर हरि का नाम सुनो।

ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਮੁਖਿ ਬੋਲਹੁ ਗੁਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬੈਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
एको रवि रहिआ घट अंतरि मुखि बोलहु गुर अम्रित बैना ॥१॥ रहाउ ॥
अनन्त प्रभु प्रत्येक हृदय में समा रहा है। अपने मुख से तुम सब अमृत वचन गुरुवाणी का जाप करो ॥ १॥ रहाउ॥

ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਮਹਾ ਬੈਰਾਗੁ ॥
मै मनि तनि प्रेमु महा बैरागु ॥
मेरे मन एवं तन में प्रभु प्रेम एवं महा वैराग्य है।

ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਪਾਇਆ ਵਡਭਾਗੁ ॥੨॥
सतिगुरु पुरखु पाइआ वडभागु ॥२॥
सौभाग्य से मुझे महापुरुष सतिगुरु मिल गया है॥ २॥

ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਭਵਹਿ ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ॥ ਭਾਗਹੀਨ ਨਹੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੩॥
दूजै भाइ भवहि बिखु माइआ ॥ भागहीन नही सतिगुरु पाइआ ॥३॥
द्वैतभाव के कारण मनुष्य का मन विषैली माया के पीछे भटकता है |भाग्यहीन व्यक्ति को सतिगुरु नहीं मिलता।॥ ३॥

ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹਰਿ ਆਪਿ ਪੀਆਇਆ ॥
अम्रितु हरि रसु हरि आपि पीआइआ ॥
परमात्मा स्वयं ही मनुष्य को अमृत रूपी हरि-रस का पान करवाता है।

ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ॥੪॥੩॥੫੫॥
गुरि पूरै नानक हरि पाइआ ॥४॥३॥५५॥
हे नानक ! पूर्ण गुरु के द्वारा मैंने ईश्वर को पा लिया है॥ ४॥ ३॥५५॥

ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੪ ॥
आसा महला ४ ॥
आसा महला ४ ॥

ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰੇਮੁ ਨਾਮੁ ਆਧਾਰੁ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥
मेरे मन एवं तन में हरि नाम का ही प्रेम बना हुआ है, जो मेरे जीवन का आधार है।

ਨਾਮੁ ਜਪੀ ਨਾਮੋ ਸੁਖ ਸਾਰੁ ॥੧॥
नामु जपी नामो सुख सारु ॥१॥
मैं नाम का सुमिरन करता हूँ, क्योंकि हरि का नाम सुखों का सार-तत्व है॥ १॥

ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮੇਰੇ ਸਾਜਨ ਸੈਨਾ ॥
नामु जपहु मेरे साजन सैना ॥
हे मेरे मित्रो एवं सज्जनो ! हरि-नाम का जाप करो।

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਮੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਲੈਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
नाम बिना मै अवरु न कोई वडै भागि गुरमुखि हरि लैना ॥१॥ रहाउ ॥
हरि-नाम के बिना मेरे पास कुछ भी नहीं। बड़े सौभाग्य से मुझे गुरु के सम्मुख होकर हरि का नाम प्राप्त हुआ है॥ १॥ रहाउ॥

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਜੀਵਿਆ ਜਾਇ ॥
नाम बिना नही जीविआ जाइ ॥
नाम के बिना जीना असंभव है।

ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਪਾਇ ॥੨॥
वडै भागि गुरमुखि हरि पाइ ॥२॥
बड़े भाग्य से ही गुरु के माध्यम से ईश्वर प्राप्त होता है॥ २॥

ਨਾਮਹੀਨ ਕਾਲਖ ਮੁਖਿ ਮਾਇਆ ॥
नामहीन कालख मुखि माइआ ॥
नामहीन मनुष्य के मुख पर माया की कालिख है।

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਾਇਆ ॥੩॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु जीवाइआ ॥३॥
हरि नाम के बिना यह जीवन धिक्कार योग्य है॥ ३॥

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