Hindi Page 136

ਕਾਮਿ ਕਰੋਧਿ ਨ ਮੋਹੀਐ ਬਿਨਸੈ ਲੋਭੁ ਸੁਆਨੁ ॥
कामि करोधि न मोहीऐ बिनसै लोभु सुआनु ॥
इस तरह काम-क्रोध मोहित नहीं करते और लालच का कूकर (कुत्ता) नाश हो जाता है।

ਸਚੈ ਮਾਰਗਿ ਚਲਦਿਆ ਉਸਤਤਿ ਕਰੇ ਜਹਾਨੁ ॥
सचै मारगि चलदिआ उसतति करे जहानु ॥
संसार उनकी महिमा करता है जो सद्मार्ग पर चलते हैं।

ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਸਗਲ ਪੁੰਨ ਜੀਅ ਦਇਆ ਪਰਵਾਨੁ ॥
अठसठि तीरथ सगल पुंन जीअ दइआ परवानु ॥
अठसठ तीर्थ स्थानों पर स्नान करने एवं समस्त दान-पुण्य करने से प्राणियों पर दया करना अधिकतर स्वीकार्य है।

ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਵੈ ਦਇਆ ਕਰਿ ਸੋਈ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਨੁ ॥
जिस नो देवै दइआ करि सोई पुरखु सुजानु ॥
जिस पर दया करके ईश्वर यह गुण प्रदान करता है वह बुद्धिमान पुरुष है।

ਜਿਨਾ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣਾ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
जिना मिलिआ प्रभु आपणा नानक तिन कुरबानु ॥
नानक उन पर बलिहारी (कुर्बान) जाता है जो अपने ईश्वर से मिल गए हैं।

ਮਾਘਿ ਸੁਚੇ ਸੇ ਕਾਂਢੀਅਹਿ ਜਿਨ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ॥੧੨॥
माघि सुचे से कांढीअहि जिन पूरा गुरु मिहरवानु ॥१२॥
माघ महीने में वहीं पवित्र कहे जाते हैं जिन पर पूर्ण गुरदेव जी मेहरबान हैं।॥ १२॥

ਫਲਗੁਣਿ ਅਨੰਦ ਉਪਾਰਜਨਾ ਹਰਿ ਸਜਣ ਪ੍ਰਗਟੇ ਆਇ ॥
फलगुणि अनंद उपारजना हरि सजण प्रगटे आइ ॥
फाल्गुन के महीने में केवल वही आनंद प्राप्त करते हैं, जिनके हृदय में साजन हरि प्रभु प्रकट हुआ है।

ਸੰਤ ਸਹਾਈ ਰਾਮ ਕੇ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੀਆ ਮਿਲਾਇ ॥
संत सहाई राम के करि किरपा दीआ मिलाइ ॥
संतजन राम से मिलन करवाने हेतु जीव की सहायता कहते हैं। प्रभु ने कृपा करके संतों से मिला दिया है।

ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਸਰਬ ਸੁਖ ਹੁਣਿ ਦੁਖਾ ਨਾਹੀ ਜਾਇ ॥
सेज सुहावी सरब सुख हुणि दुखा नाही जाइ ॥
उसकी हृदय रूपी शैय्या बहुत सुन्दर है, अब सर्व सुख प्राप्त हुए हैं और दुखों के लिए अब कोई स्थान नहीं।

ਇਛ ਪੁਨੀ ਵਡਭਾਗਣੀ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
इछ पुनी वडभागणी वरु पाइआ हरि राइ ॥
भाग्यशाली जीव-स्त्री की इच्छा पूरी हो गई है, उसे हरि-प्रभु वर के रूप में मिल गया है।

ਮਿਲਿ ਸਹੀਆ ਮੰਗਲੁ ਗਾਵਹੀ ਗੀਤ ਗੋਵਿੰਦ ਅਲਾਇ ॥
मिलि सहीआ मंगलु गावही गीत गोविंद अलाइ ॥
वह अपनी सत्संगी सखियों सहित मंगल गीत गायन करती है और वह गोविन्द का ही भजन करती रहती है।

ਹਰਿ ਜੇਹਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦਿਸਈ ਕੋਈ ਦੂਜਾ ਲਵੈ ਨ ਲਾਇ ॥
हरि जेहा अवरु न दिसई कोई दूजा लवै न लाइ ॥
हरि-प्रभु समान उसे अन्य कोई दिखाई नहीं देता। उस प्रभु के समान अन्य कोई नहीं है।

ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਵਾਰਿਓਨੁ ਨਿਹਚਲ ਦਿਤੀਅਨੁ ਜਾਇ ॥
हलतु पलतु सवारिओनु निहचल दितीअनु जाइ ॥
प्रभु ने उसका लोक-परलोक संवार दिया है और उसे अटल स्थान दे दिया है।

ਸੰਸਾਰ ਸਾਗਰ ਤੇ ਰਖਿਅਨੁ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜਨਮੈ ਧਾਇ ॥                                                             
संसार सागर ते रखिअनु बहुड़ि न जनमै धाइ ॥
प्रभु ने उसे भवसागर से बचा लिया है और वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं आएगी।                                               

ਜਿਹਵਾ ਏਕ ਅਨੇਕ ਗੁਣ ਤਰੇ ਨਾਨਕ ਚਰਣੀ ਪਾਇ ॥
जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक चरणी पाइ ॥
हे नानक ! मनुष्य की रसना तो एक है परन्तु प्रभु के गुण असीम हैं। मनुष्य उसके चरणों से लगकर भवसागर से पार हो जाता है।

ਫਲਗੁਣਿ ਨਿਤ ਸਲਾਹੀਐ ਜਿਸ ਨੋ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥੧੩॥
फलगुणि नित सलाहीऐ जिस नो तिलु न तमाइ ॥१३॥
हे मनुष्य ! फाल्गुन के महीने में हमें सदैव उस प्रभु की महिमा-स्तुति करनी चाहिए, जिसे तिल मात्र भी अपनी महिमा करवाने की लालसा नहीं ॥ १३ ॥

ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨ ਕੇ ਕਾਜ ਸਰੇ ॥
जिनि जिनि नामु धिआइआ तिन के काज सरे ॥
जिन-जिन प्राणियों ने भगवान का नाम-सिमरन किया है, उनके समस्त कार्य सम्पूर्ण हुए हैं।

ਹਰਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਆਰਾਧਿਆ ਦਰਗਹ ਸਚਿ ਖਰੇ ॥
हरि गुरु पूरा आराधिआ दरगह सचि खरे ॥
जो परमेश्वर स्वरूप पूर्ण गुरु का चिन्तन करते हैं, वह हरि के दरबार में सच्चे एवं शुद्ध सिद्ध हुए हैं।

ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਨਿਧਿ ਚਰਣ ਹਰਿ ਭਉਜਲੁ ਬਿਖਮੁ ਤਰੇ ॥
सरब सुखा निधि चरण हरि भउजलु बिखमु तरे ॥
ईश्वर के चरण सर्व-सुखों का भण्डार हैं। प्रभु द्वारा मनुष्य भयानक एवं विषम संसार-सागर से पार हो जाता है।

ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਤਿਨ ਪਾਈਆ ਬਿਖਿਆ ਨਾਹਿ ਜਰੇ ॥                                                                                                
प्रेम भगति तिन पाईआ बिखिआ नाहि जरे ॥
वे प्रेमा-भक्ति को प्राप्त होते हैं और विषय-वासनाओं में नहीं जलते।                                                          

ਕੂੜ ਗਏ ਦੁਬਿਧਾ ਨਸੀ ਪੂਰਨ ਸਚਿ ਭਰੇ ॥
कूड़ गए दुबिधा नसी पूरन सचि भरे ॥
उनका झूठ लुप्त हो गया है और द्वैत भाव भाग गया है और वह सत्य के साथ पूर्ण तौर पर निश्चय से भरे हुए हैं।

ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸੇਵਦੇ ਮਨ ਅੰਦਰਿ ਏਕੁ ਧਰੇ ॥
पारब्रहमु प्रभु सेवदे मन अंदरि एकु धरे ॥
वह पारब्रह्म प्रभु की भरपूर सेवा करते हैं और अद्वितीय प्रभु को अपने ह्रदय में धारण करते हैं।

ਮਾਹ ਦਿਵਸ ਮੂਰਤ ਭਲੇ ਜਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥
माह दिवस मूरत भले जिस कउ नदरि करे ॥
सारे महीने, दिवस एवं मुहूर्त उनके लिए भले हैं जिन पर प्रभु दया-दृष्टि करता है।

ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਦਰਸ ਦਾਨੁ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਹਰੇ ॥੧੪॥੧॥
नानकु मंगै दरस दानु किरपा करहु हरे ॥१४॥१॥
हे परमात्मा ! नानक तेरे दर्शनों के दान की याचना करता है। हे प्रभु ! अपनी कृपा उस पर न्यौछावर कीजिए॥ १४॥ १॥

ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ਦਿਨ ਰੈਣਿ
माझ महला ५ दिन रैणि
माझ महला ५ दिन रैणि

ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

ਸੇਵੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪਣਾ ਹਰਿ ਸਿਮਰੀ ਦਿਨ ਸਭਿ ਰੈਣ ॥
सेवी सतिगुरु आपणा हरि सिमरी दिन सभि रैण ॥
हे प्रभु ! मैं अपने सतिगुरु की सेवा करके समस्त दिन-रात्रि तेरी आराधना करता रहूँ।

ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਸਰਣੀ ਪਵਾਂ ਮੁਖਿ ਬੋਲੀ ਮਿਠੜੇ ਵੈਣ ॥
आपु तिआगि सरणी पवां मुखि बोली मिठड़े वैण ॥
अपना अहंकार त्याग कर मैं ईश्वर का आश्रय ग्रहण करूं और अपने मुख से मधुर वचन उच्चारण करूँ।

ਜਨਮ ਜਨਮ ਕਾ ਵਿਛੁੜਿਆ ਹਰਿ ਮੇਲਹੁ ਸਜਣੁ ਸੈਣ ॥                                                                                                  
जनम जनम का विछुड़िआ हरि मेलहु सजणु सैण ॥
हे मेरे मित्र एवं संबंधी प्रभु ! अनेक जन्मों से मैं तुझ से बिछुड़ा हुआ हूँ, मुझे अपने साथ मिला लो l

ਜੋ ਜੀਅ ਹਰਿ ਤੇ ਵਿਛੁੜੇ ਸੇ ਸੁਖਿ ਨ ਵਸਨਿ ਭੈਣ ॥
जो जीअ हरि ते विछुड़े से सुखि न वसनि भैण ॥
हे मेरी बहन ! जो प्राणी ईश्वर से बिछुड़े हुए हैं, वह सुख में नहीं बसते।

ਹਰਿ ਪਿਰ ਬਿਨੁ ਚੈਨੁ ਨ ਪਾਈਐ ਖੋਜਿ ਡਿਠੇ ਸਭਿ ਗੈਣ ॥
हरि पिर बिनु चैनु न पाईऐ खोजि डिठे सभि गैण ॥
मैंने समस्त मण्डल खोज कर देख लिए हैं। ईश्वर पति के अलावा सुख प्राप्त नहीं होता।

ਆਪ ਕਮਾਣੈ ਵਿਛੁੜੀ ਦੋਸੁ ਨ ਕਾਹੂ ਦੇਣ ॥
आप कमाणै विछुड़ी दोसु न काहू देण ॥
क्योंकि अपने मंदे कर्मों ने ही मुझे ईश्वर से जुदा किया है। फिर मैं किस पर दोष लगाऊँ ?

ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਹੋਰੁ ਨਾਹੀ ਕਰਣ ਕਰੇਣ ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु होरु नाही करण करेण ॥
हे नाथ ! कृपा करके मेरी रक्षा करें। तेरे सिवाय अन्य कोई भी कुछ करने एवं करवाने में समर्थ नहीं।

ਹਰਿ ਤੁਧੁ ਵਿਣੁ ਖਾਕੂ ਰੂਲਣਾ ਕਹੀਐ ਕਿਥੈ ਵੈਣ ॥
हरि तुधु विणु खाकू रूलणा कहीऐ किथै वैण ॥
हे हरि ! तेरे अलावा धूल में मिलना है। दुखों के वचन किसके समक्ष व्यक्त करूँ ?

ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀਆ ਹਰਿ ਸੁਰਜਨੁ ਦੇਖਾ ਨੈਣ ॥੧॥
नानक की बेनंतीआ हरि सुरजनु देखा नैण ॥१॥
नानक यही प्रार्थना करता है, अपने नेत्रों से मैं अपने परमात्मा के ही दर्शन करूं ॥ १॥

ਜੀਅ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਸੋ ਸੁਣੇ ਹਰਿ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥
जीअ की बिरथा सो सुणे हरि सम्रिथ पुरखु अपारु ॥
जो सर्वशक्तिमान एवं अनन्त हरि है, वही प्राणी की पीड़ा को सुनता है।

ਮਰਣਿ ਜੀਵਣਿ ਆਰਾਧਣਾ ਸਭਨਾ ਕਾ ਆਧਾਰੁ ॥
मरणि जीवणि आराधणा सभना का आधारु ॥
मृत्यु एवं जीवन में उसकी ही आराधना करनी चाहिए, जो सबका आधार है

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