Hindi Page 1024

ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਚੀਨੈ ਕੋਈ ॥
गुरमुखि विरला चीनै कोई ॥
कोई विरला गुरुमुख ही रहस्य को पहचानता था।

ਦੁਇ ਪਗ ਧਰਮੁ ਧਰੇ ਧਰਣੀਧਰ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਤਿਥਾਈ ਹੇ ॥੮॥
दुइ पग धरमु धरे धरणीधर गुरमुखि साचु तिथाई हे ॥८॥
पृथ्वी को धारण कृरने वाला अब धर्म रूपी बैल दो पैरों पर खड़ा था और गुरु से ही सत्य की प्राप्ति होती थी।॥८॥

ਰਾਜੇ ਧਰਮੁ ਕਰਹਿ ਪਰਥਾਏ ॥
राजे धरमु करहि परथाए ॥
बड़े-बड़े राजा अपने किसी मनोरथ के लिए धर्म-कर्म कर रहे थे,

ਆਸਾ ਬੰਧੇ ਦਾਨੁ ਕਰਾਏ ॥
आसा बंधे दानु कराए ॥
वे किसी आशा में बँधकर दान-पुण्य करते थे।

ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਥਾਕੇ ਕਰਮ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੯॥
राम नाम बिनु मुकति न होई थाके करम कमाई हे ॥९॥
वे अनेक धर्म-कर्म करके थक गए लेकिन राम-नाम के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती॥ ६॥

ਕਰਮ ਧਰਮ ਕਰਿ ਮੁਕਤਿ ਮੰਗਾਹੀ ॥
करम धरम करि मुकति मंगाही ॥
लोग धर्म-कर्म करके मुक्ति की कामना कर रहे थे

ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹੀ ॥
मुकति पदारथु सबदि सलाही ॥
किन्तु ब्रह्म-शब्द की स्तुति से ही मुक्ति मिलती है।

ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਪਰਪੰਚੁ ਕਰਿ ਭਰਮਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
बिनु गुर सबदै मुकति न होई परपंचु करि भरमाई हे ॥१०॥
लोग दुनिया के परपंच में अकारथ ही भटक रहे थे, पर शब्द गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिलती॥ १०॥

ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਛੋਡੀ ਨ ਜਾਈ ॥
माइआ ममता छोडी न जाई ॥
जीवों से माया ममता छोड़ी नहीं जाती थी,

ਸੇ ਛੂਟੇ ਸਚੁ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ॥
से छूटे सचु कार कमाई ॥
लेकिन जिन्होंने सत्य की साधना की, वे बन्धनों से छूट गए।

ਅਹਿਨਿਸਿ ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਠਾਕੁਰ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੧੧॥
अहिनिसि भगति रते वीचारी ठाकुर सिउ बणि आई हे ॥११॥
महापुरुष रात-दिन भगवान की भक्ति में लीन थे और उनकी ठाकुर जी से अटूट प्रीति बनी हुई थी॥ ११॥

ਇਕਿ ਜਪ ਤਪ ਕਰਿ ਕਰਿ ਤੀਰਥ ਨਾਵਹਿ ॥
इकि जप तप करि करि तीरथ नावहि ॥
कोई मंत्रों के जप व तपस्या में लीन थे तो कोई तीर्थों में स्नान कर रहे थे।

ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਵਹਿ ॥
जिउ तुधु भावै तिवै चलावहि ॥
हे परमात्मा ! जैसा तुझे मंजूर है, तू वैसे ही जीवों को चलाता है।

ਹਠਿ ਨਿਗ੍ਰਹਿ ਅਪਤੀਜੁ ਨ ਭੀਜੈ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕਿਨਿ ਪਤਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
हठि निग्रहि अपतीजु न भीजै बिनु हरि गुर किनि पति पाई हे ॥१२॥
हठ-योग व इन्द्रियों को संयमित करने से मन आनंदित नहीं होता। गुरु (के ज्ञान) परमेश्वर (की स्तुति) के बिना किसी को भी सत्य के दरबार में यश नहीं मिला।॥ १२॥

ਕਲੀ ਕਾਲ ਮਹਿ ਇਕ ਕਲ ਰਾਖੀ ॥
कली काल महि इक कल राखी ॥
कलयुग में धर्म (रूपी बैल) की एक ही कला रह गई,

ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਿਨੈ ਨ ਭਾਖੀ ॥
बिनु गुर पूरे किनै न भाखी ॥
पूर्ण गुरु के बिना किसी ने भी सत्य की बात नहीं की है।

ਮਨਮੁਖਿ ਕੂੜੁ ਵਰਤੈ ਵਰਤਾਰਾ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
मनमुखि कूड़ु वरतै वरतारा बिनु सतिगुर भरमु न जाई हे ॥१३॥
मनमुखी जीवों का यही आचरण है की उनमे झूठ का विचरण ही रहा है पर सतगुरु के बिना भ्रम दूर नहीं होता॥ १३॥

ਸਤਿਗੁਰੁ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸਿਰੰਦਾ ॥
सतिगुरु वेपरवाहु सिरंदा ॥
सतगुरु परमेश्वर बे-परवाह एवं स्रष्टा है

ਨਾ ਜਮ ਕਾਣਿ ਨ ਛੰਦਾ ਬੰਦਾ ॥
ना जम काणि न छंदा बंदा ॥
न उसे कोई यम का भय है और न ही लोगों पर निर्भर है,

ਜੋ ਤਿਸੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾ ਤਿਸੁ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
जो तिसु सेवे सो अबिनासी ना तिसु कालु संताई हे ॥१४॥
जो उसकी भक्ति करता है, वह काल भी दुखी नहीं करता॥ १४॥

ਗੁਰ ਮਹਿ ਆਪੁ ਰਖਿਆ ਕਰਤਾਰੇ ॥
गुर महि आपु रखिआ करतारे ॥
परमेश्वर ने खुद को गुरु के हृदय में प्रगट किया हुआ है

ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਟਿ ਅਸੰਖ ਉਧਾਰੇ ॥
गुरमुखि कोटि असंख उधारे ॥
गुरु के नाम-मंत्र से करोड़ों असंख्य जीवों का उद्धार हुआ है।

ਸਰਬ ਜੀਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਨਿਰਭਉ ਮੈਲੁ ਨ ਕਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
सरब जीआ जगजीवनु दाता निरभउ मैलु न काई हे ॥१५॥
जग का जीवन परमेश्वर सब जीवों को देने वाला है, वह निर्भय एवं पवित्र-पावन है॥ १५॥

ਸਗਲੇ ਜਾਚਹਿ ਗੁਰ ਭੰਡਾਰੀ ॥
सगले जाचहि गुर भंडारी ॥
सब जीव गुरु भण्डारी से ही माँगते हैं,

ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਅਲਖ ਅਪਾਰੀ ॥
आपि निरंजनु अलख अपारी ॥
वह स्वयं मायातीत, अलक्ष्य व अपरंपार है।

ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਪ੍ਰਭ ਜਾਚੈ ਮੈ ਦੀਜੈ ਸਾਚੁ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੪॥
नानकु साचु कहै प्रभ जाचै मै दीजै साचु रजाई हे ॥१६॥४॥
नानक सत्य कहता है और प्रभु से यही माँगता है कि मुझे अपनी रज़ा में रखकर सत्य का दान दीजिए॥ १६॥ ४॥

ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
मारू महला १ ॥
मारू महला १॥

ਸਾਚੈ ਮੇਲੇ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ॥
साचै मेले सबदि मिलाए ॥
परमात्मा ने शब्द गुरु द्वारा ही अपने संग मिलाया है,

ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਣਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਏ ॥
जा तिसु भाणा सहजि समाए ॥
जब उसे मंजूर हुआ तो वे सहज स्वभाव सत्य में समा गए।

ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਧਰੀ ਪਰਮੇਸਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਭਾਈ ਹੇ ॥੧॥
त्रिभवण जोति धरी परमेसरि अवरु न दूजा भाई हे ॥१॥
तीनों लोकों में परमेश्वर ने अपनी ज्योति स्थापित की हुई है, उस जैसा बड़ा अन्य कोई नहीं है। १॥

ਜਿਸ ਕੇ ਚਾਕਰ ਤਿਸ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
जिस के चाकर तिस की सेवा ॥
जिसके हम सेवक हैं, उसकी ही भक्ति में लीन रहते हैं।

ਸਬਦਿ ਪਤੀਜੈ ਅਲਖ ਅਭੇਵਾ ॥
सबदि पतीजै अलख अभेवा ॥
वह अलख अभेद्य शब्द की स्तुति से ही प्रसन्न होता है।

ਭਗਤਾ ਕਾ ਗੁਣਕਾਰੀ ਕਰਤਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਵਡਿਆਈ ਹੇ ॥੨॥
भगता का गुणकारी करता बखसि लए वडिआई हे ॥२॥
वह भक्तजनों का कल्याण करने वाला है, यह उसका बड़प्पन है कि शरण में आए जीवों को क्षमा कर देता है॥ २॥

ਦੇਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਸਾਚੇ ॥
देदे तोटि न आवै साचे ॥
जीवों को देते देते उस सच्चे के घर में कोई कमी नहीं आती,

ਲੈ ਲੈ ਮੁਕਰਿ ਪਉਦੇ ਕਾਚੇ ॥
लै लै मुकरि पउदे काचे ॥
परन्तु झुठे एहसान-फरामोश ले लेकर भी मुकर जाते हैं।

ਮੂਲੁ ਨ ਬੂਝਹਿ ਸਾਚਿ ਨ ਰੀਝਹਿ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ਹੇ ॥੩॥
मूलु न बूझहि साचि न रीझहि दूजै भरमि भुलाई हे ॥३॥
वे अपने मूल को पहचानते नहीं, सत्य में उनकी कोई लगन नहीं लगती, इसलिए दैतभाव व भ्रम के कारण भटकते रहते हैं।॥ ३॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਦਿਨ ਰਾਤੀ ॥
गुरमुखि जागि रहे दिन राती ॥
गुरुमुख दिन-रात माया की ओर से जाग्रत रहते हैं,

ਸਾਚੇ ਕੀ ਲਿਵ ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਤੀ ॥
साचे की लिव गुरमति जाती ॥
वे गुरु-मतानुसार सत्य में ध्यान लगाने की विधि को समझ लेते हैं।

ਮਨਮੁਖ ਸੋਇ ਰਹੇ ਸੇ ਲੂਟੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਬਤੁ ਭਾਈ ਹੇ ॥੪॥
मनमुख सोइ रहे से लूटे गुरमुखि साबतु भाई हे ॥४॥
मगर मनमुख जीव अज्ञान की निद्रा में पड़े रहते हैं, इसलिए कामादिक विकार उनके शुभ गुणों को लूट लेते हैं। गुरुमुख अपने गुणों की पूँजी को बचाकर रखते हैं।॥ ४॥

ਕੂੜੇ ਆਵੈ ਕੂੜੇ ਜਾਵੈ ॥
कूड़े आवै कूड़े जावै ॥
झूठे व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं।

ਕੂੜੇ ਰਾਤੀ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ॥
कूड़े राती कूड़ु कमावै ॥
वे झूठ में रत रहकर झूठे काम ही करते रहते हैं।

ਸਬਦਿ ਮਿਲੇ ਸੇ ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੫॥
सबदि मिले से दरगह पैधे गुरमुखि सुरति समाई हे ॥५॥
जो शब्द की स्तुति में लीन रहते हैं, उन्हें ही सच्चे दरबार में शोभा हासिल होती है और गुरु के माध्यम से उनका सत्य में ही ध्यान लगा रहता है।॥ ५॥

ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਠਗੀ ਠਗਵਾੜੀ ॥ ਜਿਉ ਵਾੜੀ ਓਜਾੜਿ ਉਜਾੜੀ ॥
कूड़ि मुठी ठगी ठगवाड़ी ॥ जिउ वाड़ी ओजाड़ि उजाड़ी ॥
झूठ में रत जीव रूपी नारी की जीवन-रूपी वाटिका को कामादिक ठगों ने ऐसे उजाड़ दिया है, जैसे उजाड़ में लगी हुई वाटिका को पशु उजाड़ देते हैं।

ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕਿਛੁ ਸਾਦਿ ਨ ਲਾਗੈ ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ਹੇ ॥੬॥
नाम बिना किछु सादि न लागै हरि बिसरिऐ दुखु पाई हे ॥६॥
हरि-नाम के बिना जीवन में कुछ स्वादिष्ट नहीं लगता, भगवान को भूलने से दुख ही प्राप्त होता है। ६॥

ਭੋਜਨੁ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਆਘਾਈ ॥
भोजनु साचु मिलै आघाई ॥
यदि सत्य-नाम रूपी भोजन मिल जाए तो मन तृप्त हो जाता है।

ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਸਾਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥
नाम रतनु साची वडिआई ॥
जिसे अमूल्य नाम-रत्न मिल जाता है, उसे ही यश प्राप्त होता है।

ਚੀਨੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸੋਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੭॥
चीनै आपु पछाणै सोई जोती जोति मिलाई हे ॥७॥
जो आत्म-स्वरूप को पहचान लेता है, उसे सत्य की पहचान हो जाती है और फिर उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है ॥७॥

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